पारंपरिक भारतीय मंडियों और कृषि व्यापार में जब भी एक मन का जिक्र आता है, तो अमूमन लोग 40 किलोग्राम का पैमाना मानते हैं। हालांकि मखाना उत्पादन के सबसे बड़े गढ़ बिहार के पूर्णिया जिले में यह नियम पूरी तरह बदल जाता है। यहां खेतों और जलाशयों से निकाली जाने वाली मखाना की कच्ची उपज यानी 'गुड़िया' का कारोबार 40 किलो के बजाय 64 किलो प्रति मन की दर से किया जाता है। स्थानीय स्तर पर वर्षों से चला आ रहा यह गणित खेती, नमी और उपज के वास्तविक वजन के बीच तालमेल बैठाने के लिए अपनाया गया है।
कच्चे माल और पानी के वजन का समीकरण
मखाना की खेती पारंपरिक रबी या खरीफ फसलों की तरह सूखी जमीन पर नहीं होती। इसका पूरा जीवन चक्र जलजमाव वाले खेतों और तालाबों में बीतता है। पूर्णिया के हरदा इलाके के ठाड़ा गांव के अनुभवी मखाना किसान विजय कुमार सिंह के अनुसार, जब किसान पानी के भीतर से कच्ची गुड़िया को बाहर निकालते हैं, तो उसमें पानी की मात्रा काफी ज्यादा होती है। यह शुरुआती वजन किसी सूखी फसल के स्थिर वजन जैसा नहीं होता, क्योंकि इसमें काफी बड़ा हिस्सा केवल नमी और सोखे हुए पानी का होता है।
इसी वजह से जब व्यापारी और आढ़ती किसानों से कच्चा माल खरीदते हैं, तो वे 64 किलो गुड़िया को एक मन मानकर हिसाब तय करते हैं। विजय कुमार सिंह बताते हैं कि खेत या पानी से निकली मखाना की गुड़िया सीधे खाने योग्य मखाना नहीं होती। इसे पहले स्थानीय व्यापारियों और प्रसंस्करण इकाइयों तक पहुंचाया जाता है। बाद में धूप में सुखाने, फोड़ने और भूनने की कई जटिल प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद ही कुरकुरा मखाना या लावा बनता है, जिसकी खपत देश के कोने-कोने के साथ अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी होती है।
मजदूरी भुगतान में भी लागू होता है विशेष फॉर्मूला
मखाना की खेती में सिर्फ बिक्री का पैमाना ही अलग नहीं है, बल्कि खेत से गुड़िया निकालने वाले श्रमिकों की मजदूरी का फॉर्मूला भी अनूठा है। पानी के गहरे तल से गुड़िया को इकट्ठा करना बेहद श्रमसाध्य कार्य है। इस काम में जुटे मजदूरों के मेहनताने में भी नमी और वजन का संतुलन देखा जाता है।
स्थानीय व्यवस्था के तहत जब कोई मजदूर 12.5 किलो कच्ची गुड़िया निकालता है, तो उसके भुगतान की गणना 5 किलो के अनुपात पर की जाती है। यानी पानी के साथ निकले कुल वजन में से तैयार होने वाले संभावित माल का अनुपात निकालकर ही श्रमिकों को उनकी मजदूरी दी जाती है। यह व्यवस्था सुनिश्चित करती है कि पानी के अतिरिक्त वजन का नुकसान न तो किसान को उठाना पड़े और न ही कामगारों के श्रम का मूल्यांकन गलत हो।
बिहार का 'व्हाइट गोल्ड' और ग्रामीण अर्थव्यवस्था
अपनी खास रंगत, पौष्टिकता और बाजार मूल्य की वजह से मखाना को बिहार का 'व्हाइट गोल्ड' भी कहा जाता है। पूर्णिया, कटिहार, दरभंगा और आसपास के इलाकों में यह फसल ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों की आय का सबसे मजबूत जरिया बन चुकी है। कीचड़ और पानी के बीच से गुड़िया निकालने से लेकर भट्टी पर लावा तैयार करने तक हर चरण में सैकड़ों परिवारों को रोजगार मिलता है। 64 किलो का यह विशेष गणित इसी जमीनी हकीकत को दर्शाता है कि खेत से बाजार तक पहुंचने में पानी की हर बूंद का हिसाब कैसे रखा जाता है।



















