गुजरात उच्च न्यायालय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शैक्षणिक योग्यता से संबंधित विवाद में दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल की अपील निरस्त कर दी है। इस अदालती निर्देश के बाद उन पर पहले अधिरोपित 25 हजार रुपये का जुर्माना पूरी तरह बरकरार रहेगा। खंडपीठ ने एकल पीठ के पूर्व आदेश में किसी भी प्रकार का दखल देने से साफ इनकार करते हुए स्पष्ट किया कि उस फैसले में कोई कानूनी खामी नजर नहीं आती है।
सूचना के अधिकार के दुरुपयोग पर अदालत की सख्त टिप्पणी
अदालत ने इस मामले की सुनवाई के दौरान आरटीआई यानी सूचना के अधिकार की विधिक प्रक्रिया के राजनीतिक उपयोग को लेकर कड़ा रुख अपनाया। उच्च न्यायालय ने टिप्पणी करते हुए कहा कि शासन व्यवस्था के महत्वपूर्ण पदों पर बैठे जनप्रतिनिधियों या राजनेताओं को अपने राजनीतिक मकसदों को पूरा करने के लिए वैधानिक प्रक्रियाओं का सहारा नहीं लेना चाहिए। पीठ के अनुसार, सांविधिक संस्थाओं और पारदर्शी कानूनों का निर्माण राजनीतिक लाभ साधने के लिए नहीं किया गया है।
मुख्य न्यायाधीश की पीठ में हुई कानूनी दलीलों की पड़ताल
इस अहम अपील पर सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सुनीता अग्रवाल और न्यायमूर्ति डीएन रे की संयुक्त खंडपीठ ने की। दोनों न्यायाधीशों ने पाया कि अपीलकर्ता की तरफ से पेश किए गए तर्कों और कानूनी आधारों से यह साबित नहीं हो सका कि एकल पीठ के पुराने निर्णय में कोई विधि सम्मत त्रुटि या अवैधता मौजूद थी। चूंकि पूर्व फैसले में कोई तकनीकी या कानूनी दोष प्रमाणित नहीं किया जा सका, इसलिए अदालत ने अपील को पूरी तरह खारिज करने का आदेश दिया। इसके साथ ही खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता पर अलग से कोई अतिरिक्त कानूनी खर्च या नया जुर्माना नहीं लगाया जाएगा।
मार्च 2023 के एकल पीठ के आदेश की पृष्ठभूमि
इस समूचे कानूनी विवाद की जड़ें केंद्रीय सूचना आयोग द्वारा वर्ष 2016 में जारी किए गए एक पुराने निर्देश से जुड़ी हैं। उस समय आयोग ने प्रधानमंत्री की उपाधि से संबंधित विवरण उपलब्ध कराने का निर्देश दिया था। इसके बाद गुजरात उच्च न्यायालय की एकल पीठ ने 31 मार्च 2023 को मामले की सुनवाई करते हुए केंद्रीय सूचना आयोग के 2016 वाले निर्देश को पूरी तरह निरस्त कर दिया था। उसी आदेश के तहत अदालत ने अरविंद केजरीवाल के आचरण पर सवाल उठाते हुए उन पर 25 हजार रुपये की जुर्माना राशि जमा करने का आदेश सुनाया था। अब दो जजों की खंडपीठ ने उसी एकल पीठ के निष्कर्ष को कानूनी तौर पर उचित पाते हुए अंतिम रूप से बरकरार रखा है।
केंद्रीय सूचना आयोग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल
अदालत ने कानूनी प्रक्रिया के दौरान केजरीवाल द्वारा आयोग के समक्ष अपनाए गए रुख की भी समीक्षा की। उच्च न्यायालय ने दर्ज किया कि जिस तरह से केंद्रीय सूचना आयोग की कार्यवाही में लिखित उत्तर देकर इस मामले को आगे बढ़ाया गया, वह तरीका स्वयं में काफी कुछ स्पष्ट कर देता है और इस पर विस्तृत टिप्पणी की आवश्यकता नहीं है। इसके साथ ही पीठ ने यह भी माना कि आयोग द्वारा अरविंद केजरीवाल को सीधे एक आवेदक का दर्जा देते हुए स्वतः संज्ञान लेकर आदेश जारी करना कानून के दायरे से बाहर था। हालांकि, आयोग के उस गलत कदम के बावजूद एकल पीठ द्वारा जुर्माने को लेकर दिए गए फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई वैधानिक आधार नहीं बनता था।















