केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सीएपीएफ) से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले की लिस्टिंग में प्रक्रियागत गड़बड़ी को लेकर शीर्ष अदालत में कड़ा रुख देखने को मिला है। निर्धारित बेंच को पूर्व सूचना दिए बिना केस को अचानक दैनिक कॉज लिस्ट से हटाए जाने के कदम पर संबंधित जजों ने गहरा ऐतराज जताया। अदालत ने न्यायिक प्रशासन और रजिस्ट्री के इस रवैये को कार्यप्रणाली की निष्पक्षता के खिलाफ माना। इसके साथ ही बिना विपक्षी पक्षकारों को सूचित किए सीधे चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) के सामने मामले को मेंशन करने की सरकारी वकील की कार्यशैली पर भी गंभीर टिप्पणियां की गईं।
निर्धारित सुनवाई से ठीक पहले कॉज लिस्ट से गायब हुआ मामला
विवाद की शुरुआत उस वक्त हुई जब यह मामला जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल चंद्रुकर की नियमित पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए सूचीबद्ध था। अदालत कक्ष में संबंधित पक्षों के अधिवक्ता पूरी कानूनी तैयारी के साथ उपस्थित थे। सुनवाई शुरू होने से ऐन पहले इस केस को अचानक कॉज लिस्ट से बाहर कर दिया गया। सबसे हैरान करने वाला पहलू यह रहा कि जिस नियमित बेंच को सुनवाई करनी थी, उसे इस बदलाव के संदर्भ में कोई औपचारिक जानकारी तक नहीं दी गई।
इस प्रशासनिक कदम पर पीठ ने फौरन संज्ञान लिया और रजिस्ट्री के अधिकारियों से औपचारिक स्पष्टीकरण तलब कर लिया। पीठ का स्पष्ट कहना था कि जब कोई वाद किसी तय बेंच के समक्ष लग चुका हो, तो जजों की सहमति अथवा संज्ञान के बगैर फाइलों को इधर-उधर स्थानांतरित करने का अधिकार किसी के पास नहीं है। बाद में देर शाम अदालत के आधिकारिक पोर्टल पर एक नोटिस जारी हुआ, जिसके जरिए जानकारी दी गई कि इस मामले को विशेष पीठ के समक्ष भेजा गया है।
सीक्रेट मेंशनिंग और बैकडोर प्रक्रिया पर जजों की तीखी टिप्पणी
अगले चरण में जब यह प्रकरण जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की विशेष पीठ के समक्ष आया, तो रजिस्ट्री की ओर से रखे गए पक्ष ने पूरी स्थिति को स्पष्ट किया। रजिस्ट्री ने पीठ को अवगत कराया कि सरकारी पक्ष के वकील ने सीजेआई के समक्ष इस प्रकरण को विशेष रूप से उठाया था। सरकारी पक्ष का तर्क था कि इस मामले का सीधा संबंध उस मूल कानून की संवैधानिक वैधता से है, जिस पर विशेष पीठ पहले से विचार कर रही है।
विशेष पीठ ने इस बात पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई कि विरोधी पक्षकारों को जानकारी दिए बिना यह प्रक्रिया क्यों पूरी की गई। जजों ने सवाल उठाया कि जब नियमित बेंच कार्यरत थी, तब उस पीठ को अंधेरे में रखकर इस तरह का कदम उठाना उचित नहीं था। अदालत ने दो टूक शब्दों में रेखांकित किया कि पिछले दरवाजे से बेंच बदलने जैसी गतिविधियां समूची अदालती व्यवस्था की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं।
अवमानना याचिका और मूल कानून के टकराव पर 15 अक्टूबर को सुनवाई
यह कानूनी खींचतान दरअसल सीएपीएफ मामले में दायर अवमानना याचिका और उससे जुड़े मुख्य कानून की संवैधानिकता के बीच का टकराव है। विशेष बेंच उन याचिकाओं पर गौर कर रही है, जिनका निष्कर्ष अवमानना कार्यवाही की दिशा तय करेगा। इसी कारण दोनों कार्यवाहियों को एक ही मंच पर लाने की प्रशासनिक कवायद की गई थी।
रजिस्ट्री के स्पष्टीकरण और अधिवक्ताओं के तर्कों का संज्ञान लेने के पश्चात अदालत ने इस अवमानना मामले को मूल कानून की वैधता को चुनौती देने वाली मुख्य याचिका के साथ संबद्ध कर दिया है। अब इस पूरे प्रकरण से जुड़े कानूनी बिंदुओं पर अगली विस्तृत सुनवाई 15 अक्टूबर को होगी।













