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हिमाचल प्रदेश की 9 ग्लेशियर झीलें बनीं गंभीर खतरा, नेपाल जैसी भीषण बाढ़ आपदा की IIT मंडी ने जताई आशंकाभारत
2 सित॰ 2026, 11:19 am (3 घंटे पहले)· 2

हिमाचल प्रदेश की 9 ग्लेशियर झीलें बनीं गंभीर खतरा, नेपाल जैसी भीषण बाढ़ आपदा की IIT मंडी ने जताई आशंका

आईआईटी मंडी के अध्ययन में खुलासा हुआ है कि हिमाचल प्रदेश की कई ग्लेशियर झीलों का आकार बीते दस वर्षों में 60 प्रतिशत तक बढ़ गया है, जिससे नेपाल जैसे विनाशकारी सैलाब का संकट गहरा गया है।

नेपाल में ग्लेशियर झील फटने के बाद आई भीषण तबाही को अभी एक हफ्ता ही बीता है, जहाँ मलबे के विशाल ढेर में जिंदगी की तलाश अब भी जारी है। एक हजार से ज्यादा लोगों की जान लेने और चार हजार से अधिक लोगों के लापता होने की इस विभीषिका के बीच भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मंडी (आईआईटी मंडी) के वैज्ञानिकों ने बेहद चिंताजनक चेतावनी जारी की है। संस्थान द्वारा किए गए वैज्ञानिक विश्लेषण में पाया गया है कि हिमाचल प्रदेश में मौजूद कई ग्लेशियर झीलों का क्षेत्रफल पिछले एक दशक के दौरान 30 से 60 फीसदी तक बढ़ चुका है। अध्ययन के मुताबिक, क्षेत्र की लगभग 2,000 से अधिक झीलों का बारीकी से निरीक्षण करने पर 9 से 12 झीलें ऐसी पाई गई हैं जो अत्यंत गंभीर अवस्था में पहुँच चुकी हैं। यदि इन झीलों के प्राकृतिक बाँध टूटते हैं, तो इनसे नेपाल जैसी प्रचंड तबाही की पुनरावृत्ति हो सकती है।

ग्लेशियर पिघलने की रफ्तार और बढ़ते जलभराव का गणित

आईआईटी मंडी के स्कूल ऑफ सिविल एंड एनवायर्नमेंटल इंजीनियरिंग के एसोसिएट प्रोफेसर और संस्थापक चेयरपर्सन डेरिक्स पी शुक्ला ने हिमालयी जलस्रोतों में आ रहे इस द्रुतगामी बदलाव पर प्रकाश डाला है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उच्च हिमालयी क्षेत्रों में तापमान वृद्धि के कारण बर्फ पिघलने की दर अत्यधिक तेज हो गई है। जब ग्लेशियर पीछे हटते हैं, तो उनके मुहाने पर विशाल गड्ढों में पानी भरने से ग्लेशियल लेक का निर्माण होता है। बीते दस सालों के आँकड़ों की तुलना करने पर ज्ञात हुआ है कि हिमाचल प्रदेश की कई प्रमुख झीलों का दायरा 30 प्रतिशत से लेकर 60 प्रतिशत तक विस्तृत हो गया है। जल भंडारण क्षमता में यह भारी इजाफा ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ) यानी ग्लेशियर झील फटने से आने वाली बाढ़ के जोखिम को कई गुना बढ़ा देता है।

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अनियंत्रित पर्यटन, कार्बन उत्सर्जन और बर्फ पर जमती काली परत

हिमालयी पर्यावरण के इस तेजी से होते क्षरण के पीछे केवल वैश्विक तापमान वृद्धि ही एकमात्र कारण नहीं है, बल्कि स्थानीय मानवीय गतिविधियाँ भी इसमें बड़ी भूमिका निभा रही हैं। प्रोफेसर डेरिक्स पी शुक्ला के अनुसार, पर्वतीय घाटियों में पर्यटन के बेतहाशा विस्तार और भारी वाहनों की आवाजाही से व्यापक प्रदूषण फैल रहा है। वाहनों से निकलने वाला धुएँ का कार्बन, ईंधन का काला धुआँ और निर्माण कार्यों की धूल उड़कर सीधे ग्लेशियरों की सतह पर जमा हो रही है। बर्फ की सफेद परत पर इस काले कार्बन की जमावट एक ऊष्मीय आवरण तैयार कर देती है। यह काली परत सूर्य की किरणों और सौर ऊर्जा को परावर्तित करने के बजाय अधिक मात्रा में अवशोषित करने लगती है। इस भौतिक प्रक्रिया के कारण ग्लेशियरों के पिघलने की गति असामान्य रूप से बढ़ गई है।

पर्माफ्रॉस्ट का पिघलना और पहाड़ों की आतंरिक अस्थिरता

पर्यावरण वैज्ञानिकों ने पर्माफ्रॉस्ट के क्षरण को भी इस संभावित आपदा का एक अत्यंत घातक पहलू माना है। पर्माफ्रॉस्ट दरअसल धरती की निचली सतह पर स्थित चट्टानों, मिट्टी और रेत का वह आवरण होता है जो सदियों से शून्य से नीचे के तापमान पर पूरी तरह जमे हुए रूप में रहता है। यह जमे हुए सीमेंट की तरह पहाड़ों की नींव को मजबूती से जोड़े रखता है। जब निरंतर तापमान बढ़ता है, तो यह भूमिगत पर्माफ्रॉस्ट पिघलने लगता है। पर्माफ्रॉस्ट के द्रव में बदलते ही ऊपर मौजूद पहाड़ और ढलान अपनी पकड़ खो देते हैं, जिससे भीषण भूस्खलन और लैंडस्लाइड की घटनाएँ शुरू हो जाती हैं। नेपाल में 26 अगस्त को आई आपदा के पीछे भी ग्लेशियर झील के टूटने के साथ-साथ पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने से उत्पन्न हुई पहाड़ी अस्थिरता को एक प्रमुख कारक माना गया है।

सुरंगों का जाल और बारहमासी मानवीय हस्तक्षेप का असर

पहाड़ी क्षेत्रों में कनेक्टिविटी और बुनियादी ढाँचे का विकास यद्यपि आवागमन को आसान बनाता है, परंतु इसे बेहद नियंत्रित और संतुलित तरीके से अंजाम न दिए जाने पर इसके गंभीर पर्यावरणीय दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं। पहाड़ों को काटकर बनाई जा रही सुरंगों और ऑल-वेदर सड़कों के कारण अब पर्यटकों तथा वाहनों का प्रवाह पूरे साल बना रहता है। पहले जिन संवेदनशील इलाकों में शीतकाल के दौरान मानवीय गतिविधियाँ ठप हो जाती थीं, वहाँ अब लगातार वाहनों की चहल-पहल रहती है। इस निरंतर आवाजाही से धूल और धुएँ के कण चौबीसों घंटे ग्लेशियरों तक पहुँच रहे हैं, जिससे उनकी प्राकृतिक संरचना को अपूरणीय क्षति पहुँच रही है।

एनडीएमए की चार संवेदनशील झीलें बनाम आईआईटी मंडी का व्यापक निष्कर्ष

प्राकृतिक आपदा प्रबंधन के मोर्चे पर राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) ने हिमाचल प्रदेश की चार ऐसी ग्लेशियर झीलों की पहचान की है जिन पर तत्काल निगरानी और सुरक्षात्मक उपाय लागू करने की आवश्यकता बताई गई है। इन चार झीलों में घेपन झील, वासुकी झील, काशांग झील और बास्पा नदी के निकट स्थित एक अन्य झील शामिल हैं। दूसरी ओर, आईआईटी मंडी द्वारा किए गए दोहरे वैज्ञानिक सर्वेक्षणों के निष्कर्ष अधिक व्यापक और सघन खतरे की ओर संकेत करते हैं। आईआईटी मंडी की टीम ने राज्य की 2,000 से अधिक झीलों का वैज्ञानिक अध्ययन करने के पश्चात 9 से 12 झीलों को अत्यधिक संवेदनशील और क्रिटिकल श्रेणी में वर्गीकृत किया है।

विभिन्न झीलों का जोखिम स्तर और जनआबादी पर मंडराता खतरा

अध्ययन में स्पष्ट किया गया है कि सभी संवेदनशील झीलों से आम जनता को एक समान खतरा नहीं है। शोधकर्ताओं के अनुसार, जनसामान्य के लिए सबसे ज्यादा जोखिम घेपन झील, योचे और काली कुंड से बना हुआ है। ये तीनों झीलें लगातार संरचनात्मक बदलावों से गुजर रही हैं और इनका जलग्रहण आकार हर साल तेजी से फैल रहा है। इनके निचले बहाव वाले क्षेत्रों में घनी इंसानी बस्तियाँ स्थित हैं, जिससे किसी भी अनहोनी की स्थिति में भारी जन-धन की हानि हो सकती है। इसके विपरीत, वासुकी झील के आकार में भी यद्यपि परिवर्तन हो रहा है, लेकिन राहत की बात यह है कि उसके निचले हिस्से में कई किलोमीटर के दायरे तक कोई स्थायी मानव आबादी निवास नहीं करती, जिससे उससे जुड़ा सीधा खतरा फिलहाल अपेक्षाकृत कम माना जा रहा है।

नेपाल आपदा की पूरी क्रोनोलॉजी और जलविद्युत सुरंगों की खौफनाक स्थिति

नेपाल में 26 अगस्त को घटी आपदा के वैज्ञानिक विश्लेषण से पता चलता है कि ग्लेशियर का एक विशाल टुकड़ा टूटकर अचानक ल्हेंदे खोला नदी के ऊपरी क्षेत्र में आ गिरा। इस आकस्मिक भूस्खलन और बर्फ के मलबे से नदी का स्वाभाविक प्रवाह अवरुद्ध हो गया और वहाँ एक अस्थाई कृत्रिम झील का निर्माण हो गया। जब इस अस्थाई झील का जलग्रहण दबाव सीमा से बाहर हो गया, तो इसका प्राकृतिक बाँध अचानक टूट गया। इस पानी का भयानक सैलाब ल्हेंदे खोला की सहायक नदी भोटेकोशी में समा गया, जो चीन के स्वायत्त क्षेत्र से बहती हुई नेपाल में प्रवेश करती है। भोटेकोशी नदी के उफान ने रास्ते में आने वाले बुनियादी ढाँचे को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। इस आपदा के कारण जलविद्युत परियोजनाओं की सुरंगों में गाद और मलबे का ऐसा भराव हुआ कि खोज एवं बचाव दल स्तब्ध रह गए। सुरंगों के भीतर गीली मिट्टी और गाद का दबाव इस कदर जमा हो चुका है मानो किसी टूथपेस्ट ट्यूब के अंदर पेस्ट भरा हो, जिससे बचाव कर्मियों और ड्रोन उपकरणों के लिए अंदर प्रवेश करना लगभग असंभव साबित हो रहा है।

सवाल-जवाब

आईआईटी मंडी के अध्ययन में हिमाचल प्रदेश की कितनी झीलों को खतरनाक बताया गया है?
शोधकर्ताओं ने 2,000 से अधिक झीलों के सर्वेक्षण के बाद 9 से 12 ग्लेशियर झीलों को अत्यधिक संवेदनशील और क्रिटिकल स्थिति में पाया है।
हिमाचल की इन झीलों का आकार बीते दस वर्षों में कितना बढ़ा है?
बीते एक दशक में अध्ययन की गई कई मुख्य ग्लेशियर झीलों का क्षेत्रफल 30 प्रतिशत से लेकर 60 प्रतिशत तक विस्तृत हुआ है।
आम जनता के लिए किन ग्लेशियर झीलों से सबसे अधिक खतरा है?
अध्ययन के अनुसार घेपन झील, योचे और काली कुंड से आम आबादी को सबसे ज्यादा खतरा है क्योंकि इनके निचले क्षेत्र में इंसानी बस्तियाँ स्थित हैं।
वासुकी झील का आकार बढ़ने के बावजूद उससे तुरंत खतरा कम क्यों माना जा रहा है?
वासुकी झील के निचले बहाव क्षेत्र में कई किलोमीटर तक कोई इंसानी बस्ती न होने के कारण उससे जुड़ा तात्कालिक जन-धन का जोखिम अपेक्षाकृत कम है।
ग्लेशियर पिघलने में वाहनों और पर्यटन की क्या भूमिका है?
वाहनों के धुएँ से निकलने वाला ब्लैक कार्बन बर्फ की सतह पर जमा होकर काली परत बनाता है, जो सूर्य की ऊर्जा अवशोषित कर बर्फ के पिघलने की गति तेज कर देता है।
नेपाल में 26 अगस्त को आई बाढ़ का मुख्य कारण क्या था?
नेपाल में ग्लेशियर टूटने से ल्हेंदे खोला नदी में बनी कृत्रिम झील का प्राकृतिक बाँध टूट गया, जिससे भोटेकोशी नदी में विनाशकारी सैलाब आ गया।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 1

Karan Malhotra@karan-malhotra·2 घंटे पहले

आईआईटी मंडी का यह अध्ययन प्रशासनिक और सार्वजनिक सुरक्षा के दृष्टिकोण से एक गंभीर चेतावनी है। यदि समय रहते इन संवेदनशील झीलों के आसपास निगरानी तंत्र और आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली को मजबूत नहीं किया गया, तो संभावित जीएलओएफ आपदा से भारी जनहानि और कानूनी-व्यवस्था का गंभीर संकट उत्पन्न हो सकता है।

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