राजस्थान के नागौर जिले में भाद्रपद कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि के अवसर पर हल षष्ठी यानी हल छठ का पर्व पारंपरिक श्रद्धा और धार्मिक उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। इस विशेष अवसर पर क्षेत्र की माताओं ने अपनी संतान की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और पूरे परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हुए कठोर व्रत रखा है। मां की अटूट ममता, कठिन तपस्या और अटूट धार्मिक आस्था का यह संगम शहर भर के मंदिरों और घरों में देखने को मिल रहा है। संतान प्राप्ति की कामना रखने वाली महिलाएं भी इस दिन पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना में लीन हैं।
बंशीवाला मंदिर में कथा और पुरुषों के प्रवेश पर प्रतिबंध
हल षष्ठी के पावन अवसर पर नागौर स्थित काठड़िया का चौक के प्रसिद्ध बंशीवाला मंदिर में विशेष धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया है। मंदिर के पुजारी नारायण और दीक्षांत पाराशर के अनुसार शाम सवा 7 बजे से लेकर चंद्रोदय तक, यानी करीब तीन घंटे तक श्रद्धालुओं को हल छठ की प्रामाणिक कथा सुनाई जाएगी। इस कथा वाचन के समय मंदिर परिसर की व्यवस्था को लेकर विशेष नियम बनाए गए हैं। कथा के दौरान परिसर में केवल महिला श्रद्धालुओं को ही प्रवेश की अनुमति दी जाएगी और पुरुषों का प्रवेश पूरी तरह बंद रहेगा। इस दौरान महिलाएं समूह में बैठकर संतान की लंबी आयु और पारिवारिक मंगल की प्रार्थना करेंगी। बाद में रात्रि आरती के समय पुरुष और महिला दोनों श्रद्धालुओं को भगवान के दर्शन करने का अवसर मिलेगा।
ध्रुव और व्याघात योग का अत्यंत शुभ संयोग
धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ इस वर्ष हल षष्ठी का दिन ज्योतिषीय दृष्टिकोण से भी बेहद फलदायी माना जा रहा है। पंचांग के विश्लेषण के अनुसार बुधवार के दिन सुबह से लेकर रात 9 बजकर 12 मिनट तक अत्यंत शुभ ध्रुव योग का निर्माण हो रहा है। इस समय अवधि के समाप्त होने के पश्चात व्याघात योग प्रारंभ होगा जो पूरी रात प्रभावी रहेगा। तिथि, वार और नक्षत्र का यह दुर्लभ संयोग पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए विशेष रूप से फलदायी बताया गया है। इसी वजह से व्रती महिलाएं सुबह से ही नियम और निष्ठा के साथ अनुष्ठान संपन्न कर रही हैं।
हल से उगाई फसलों का त्याग और भैंस के दूध का नियम
हल षष्ठी व्रत की परंपराएं सीधे तौर पर कृषि संस्कृति और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने से जुड़ी हुई हैं। यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता बलरामजी को समर्पित है, जिन्हें शेषनाग का अवतार माना जाता है। बलरामजी का प्रधान अस्त्र हल होने के कारण इस तिथि को हल षष्ठी के नाम से जाना जाता है। इस व्रत का पालन करने वाली महिलाएं हल से जोती गई या बोई गई भूमि से प्राप्त किसी भी प्रकार के अनाज, फल या सब्जियों का सेवन नहीं करती हैं। व्रत के दौरान पूरी तरह से अन्न का त्याग किया जाता है। इसके अतिरिक्त, इस व्रत में भैंस के दूध और उससे बने दही का विशेष धार्मिक महत्व है। संध्या काल में पूजा संपन्न होने के उपरांत महिलाएं भैंस के दूध से तैयार दही को ग्रहण करके ही अपना उपवास खोलती हैं।





















