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हिमाचल प्रदेश में तेजी से पिघल रहे ग्लेशियर, 30 सालों में 5 गुना बढ़ीं खतरनाक झीलें; सतलुज और ब्यास बेसिन पर बढ़ा बाढ़ का खतराहिमाचल प्रदेश
25 अग॰ 2026, 1:09 pm (28 दिन पहले)· 2

हिमाचल प्रदेश में तेजी से पिघल रहे ग्लेशियर, 30 सालों में 5 गुना बढ़ीं खतरनाक झीलें; सतलुज और ब्यास बेसिन पर बढ़ा बाढ़ का खतरा

आईआईटी रोपड़ और सिडनी की यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी के एक संयुक्त अध्ययन में खुलासा हुआ है कि हिमाचल प्रदेश में ग्लेशियर पिघलने के कारण 1990 से 2024 के बीच ग्लेशियल झीलों की संख्या में 525 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। इससे ब्यास और सतलुज नदी घाटी में बसे 680 से अधिक ढांचों और प्रमुख पनबिजली परियोजनाओं पर ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड का बड़ा खतरा मंडरा रहा है।

हिमालयी क्षेत्र में वैश्विक तापमान वृद्धि का गहरा असर दिखाई देने लगा है, जिसके कारण हिमाचल प्रदेश के प्राकृतिक भूगोल और पर्यावरण में चिंताजनक बदलाव आ रहे हैं। उच्च हिमालयी पर्वतों पर स्थित ग्लेशियर बेहद तेज गति से पिघल रहे हैं। इस कारण पर्वतीय ढलानों पर पानी जमा होने से नई-नई अस्थिर झीलें बन रही हैं। आईआईटी रोपड़ और ऑस्ट्रेलिया की यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी सिडनी द्वारा किए गए एक संयुक्त वैज्ञानिक अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि यदि बर्फ पिघलने की यह रफ्तार बनी रही, तो राज्य की प्रमुख नदियों विशेषकर ब्यास और सतलुज के निचले इलाकों में विनाशकारी बाढ़ आ सकती है।

ग्लेशियल झीलों में 525 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी

उपग्रह डेटा और क्षेत्रीय विश्लेषण पर आधारित इस अध्ययन के अनुसार वर्ष 1990 के बाद से हिमाचल प्रदेश में ग्लेशियल झीलों के फैलाव और उनकी संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की गई है। तीन दशकों से अधिक के आंकड़ों की तुलना करने पर बेहद चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं

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  • झीलों की संख्या: वर्ष 1990 में प्रदेश भर में केवल 107 ग्लेशियल झीलें दर्ज थीं, जिनकी संख्या वर्ष 2024 तक बढ़कर 669 तक पहुंच गई है। यह कुल संख्या में 525 प्रतिशत की सीधी वृद्धि दर्शाती है।
  • कुल सतही क्षेत्रफल: इन झीलों द्वारा घेरा गया कुल भू-भाग 5.54 वर्ग किलोमीटर से बढ़कर 11.20 वर्ग किलोमीटर हो गया है, जो इनके कुल क्षेत्रफल में 102 प्रतिशत की बढ़ोतरी दिखाता है।
  • अत्यंत छोटी झीलें: 0.01 वर्ग किलोमीटर या उससे छोटे आकार की छोटी-छोटी झीलों की संख्या में भारी उछाल आया है। यह आंकड़ा 9 से बढ़कर सीधे 487 हो चुका है।
  • उच्च जोखिम वाली झीलें: 0.02 वर्ग किलोमीटर से बड़े आकार की कुल 94 झीलों की पहचान की गई है, जिनमें से 88 झीलें ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हैं।

सतलुज और ब्यास बेसिन में अरबों के बुनियादी ढांचे पर संकट

अध्ययन में तैयार किए गए बाढ़ सिमुलेशन मॉडल से संकेत मिलता है कि यदि कोई प्राकृतिक बांध टूटता है, तो पहाड़ी इलाकों से बहने वाला पानी अपने रास्ते में आने वाले बुनियादी ढांचे को तबाह कर सकता है। राज्य के दो प्रमुख नदी बेसिनों में स्थित 680 से अधिक भवन और विशाल जलविद्युत परियोजनाएं सीधे जोखिम के दायरे में हैं।

ब्यास नदी घाटी में कुल 94 महत्वपूर्ण संरचनाओं पर बाढ़ का सीधा खतरा मंडरा रहा है। इनमें रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण पंडोह बांध और उहल-III जलविद्युत स्टेशन के प्रमुख हिस्से शामिल हैं। दूसरी ओर, सतलुज नदी बेसिन में स्थिति और भी अधिक नाजुक है, जहां कम से कम 588 इमारतें खतरे के निशान में आती हैं। इस क्षेत्र में संचालित प्रमुख ऊर्जा परियोजनाएं जैसे कोलडैम प्रोजेक्ट और रामपुर हाइड्रोपावर स्टेशन सीधे बाढ़ के बहाव क्षेत्र में पड़ते हैं। यदि इन झीलों से अचानक पानी छूटता है, तो पूरे राज्य की बिजली उत्पादन क्षमता बाधित हो सकती है।

ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) के मुख्य कारण

पहाड़ों में ग्लेशियल झीलों का अचानक फटना या आउटबर्स्ट होना किसी एक वजह से नहीं होता, बल्कि इसके पीछे कई प्राकृतिक और मौसमी कारक एक साथ काम करते हैं

  • अस्थिर मोरेन बांध: ये झीलें किसी पक्के कंक्रीट बांध के पीछे नहीं बल्कि मलबे, कंकड़ और ढीली बर्फ से बने प्राकृतिक अवरोधों (मोरेन) के सहारे टिकी होती हैं। पानी का दबाव बढ़ने पर ये कमजोर दीवारें अचानक ढह जाती हैं।
  • उच्च भूकंपीय संवेदनशीलता: पूरा हिमालयी क्षेत्र भूकंपीय दृष्टि से अत्यधिक सक्रिय जोन में आता है। हल्का सा तीव्र भूकंपीय झटका भी कमजोर मोरेन बांधों को तोड़ सकता है।
  • हिमस्खलन और भूस्खलन: झील के ऊपरी हिस्से से विशालकाय बर्फ के टुकड़े (हिमस्खलन) या भारी चट्टानें गिरकर पानी में समा जाती हैं। इससे पैदा होने वाली ऊंची लहरें बांध के किनारों को तोड़ देती हैं।
  • बादल फटना और मूसलाधार बारिश: मानसून के मौसम में अचानक होने वाली अत्यधिक बारिश से झीलों का जलस्तर कुछ ही घंटों में क्षमता से बाहर हो जाता है।

बढ़ता तापमान और बदलता भू-वैज्ञानिक ढांचा

अनुसंधान में स्पष्ट किया गया है कि इस भौगोलिक बदलाव के पीछे जलवायु परिवर्तन और क्षेत्रीय भू-संरचना का बहुत बड़ा हाथ है। सर्दियों के मौसम में बर्फबारी का पैटर्न बदला है। अब बर्फबारी की जगह बारिश अधिक हो रही है और बर्फ की सुरक्षात्मक परत समय से पहले पिघल रही है। जब बर्फ की परत हट जाती है, तो ग्लेशियर सीधे सूरज की किरणों के संपर्क में आ जाते हैं।

इसके अलावा, हिमालय के कई ग्लेशियरों की सतह पर धूल और काले मलबे की मोटी परत जम जाती है। यह काला मलबा सूरज की गर्मी को ज्यादा सोखता है, जिससे अंदर की बर्फ तेजी से पिघलने लगती है। ग्लेशियर के पीछे हटने से उनके निचले हिस्से में गहरे प्राकृतिक गड्ढे बन जाते हैं, जिनमें पिघला हुआ पानी भरकर नई-नई झीलों का रूप ले लेता है।

सेंसर लगाने और अर्ली-वॉर्निंग सिस्टम की तत्काल सिफारिश

शोधकर्ताओं ने राज्य सरकार और आपदा प्रबंधन अधिकारियों को बिना किसी देरी के त्वरित सुरक्षा उपाय लागू करने का सुझाव दिया है। बांध सुरक्षा से जुड़े मौजूदा प्रोटोकॉल में GLOF के खतरे को तत्काल प्राथमिकता के साथ शामिल किया जाना चाहिए। वैज्ञानिक दल ने चेतावनी दी है कि निचले इलाकों को सुरक्षित रखने के लिए पंडोह बांध से कम से कम 25 किलोमीटर upstream (ऊपरी क्षेत्र में) और भाखड़ा नांगल बांध से 100 किलोमीटर upstream में आधुनिक अर्ली-वॉर्निंग सेंसर स्थापित किए जाने चाहिए, ताकि बाढ़ की स्थिति में पर्याप्त समय रहते अलर्ट जारी किया जा सके।

सवाल-जवाब

हिमाचल प्रदेश में 1990 से 2024 के बीच ग्लेशियल झीलों में कितनी बढ़ोतरी दर्ज की गई है?
शोध के अनुसार हिमाचल प्रदेश में ग्लेशियल झीलों की संख्या 1990 में 107 थी, जो 2024 में बढ़कर 669 हो गई। यह कुल 525 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाती है।
ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) क्या होता है?
ग्लेशियर पिघलने से बनी झील जब अपने ढीले प्राकृतिक मोरेन (मलबे व बर्फ) के बांध को तोड़कर अचानक तेजी से बह निकलती है, तो उसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड कहा जाता है।
ब्यास नदी बेसिन में कौन से प्रमुख जलविद्युत प्रोजेक्ट खतरे में हैं?
ब्यास बेसिन में रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण पंडोह बांध और उहल-III जलविद्युत स्टेशन के हिस्से बाढ़ के सीधे जोखिम में आते हैं।
सतलुज नदी बेसिन में कौन सी बिजली परियोजनाओं पर संकट मंडरा रहा है?
सतलुज बेसिन में कोलडैम प्रोजेक्ट और रामपुर हाइड्रोपावर स्टेशन समेत कम से कम 588 इमारतें और ढांचे बाढ़ के खतरे के दायरे में हैं।
शोधकर्ताओं ने बाढ़ से बचाव के लिए क्या महत्वपूर्ण सिफारिशें की हैं?
वैज्ञानिकों ने पंडोह बांध से 25 किमी ऊपर और भाखड़ा नांगल बांध से 100 किमी ऊपर अर्ली-वॉर्निंग सेंसर लगाने और बांध सुरक्षा नियमों में GLOF को शामिल करने की सलाह दी है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·27 दिन पहले

अपराध और न्याय की दृष्टि से यह पर्यावरणीय संकट अब केवल प्रकृति का प्रकोप नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और जनजीवन के लिए एक बड़ा विध्वंसकारी खतरा बन चुका है। ब्यास और सतलुज घाटियों में स्थित पनबिजली परियोजनाओं और रिहायशी इलाकों को अचानक आने वाली बाढ़ यानी जीएलओएफ (GLOF) से बचाने के लिए तुरंत आपदा प्रबंधन और सुरक्षा प्रोटोकॉल की सख्त आवश्यकता है। यदि समय रहते इन उच्च जोखिम वाली झीलों के जलस्तर को नियंत्रित नहीं किया गया, तो यह राज्य और देश की ऊर्जा आपूर्ति व बुनियादी ढांचे के लिए एक गंभीर आपराधिक लापरवाही साबित होगी, जो भारी जनहानि का कारण बन सकती है।

Rohan Verma@rohan-verma·27 दिन पहले

इस पर्यावरणीय संकट का सीधा असर उत्तर प्रदेश जैसे मैदानी और पड़ोसी राज्यों की ऊर्जा सुरक्षा और जल प्रबंधन पर भी पड़ेगा। जब हिमाचल की इन झीलों से अचानक पानी छूटेगा, तो सतलुज और ब्यास बेसिन के रास्ते मैदानी इलाकों में भारी तबाही मच सकती है। समय रहते केंद्र और राज्य सरकारों को आपसी समन्वय से एक मजबूत अंतर-राज्यीय बाढ़ चेतावनी प्रणाली और दीर्घकालिक नीतिगत सुरक्षा ढांचा तैयार करना होगा, अन्यथा यह मानव-निर्मित आपदा बड़े पैमाने पर तबाही लाएगी।

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