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हिमाचल के दूरदराज गांव कुगती का राजमाह पहुंचा देश के बाजारों में, पर बेमौसम बारिश ने बढ़ाई किसानों की धड़कनेंहिमाचल प्रदेश
2 अक्तू॰ 2026, 2:24 pm (36 दिन पहले)· 0

हिमाचल के दूरदराज गांव कुगती का राजमाह पहुंचा देश के बाजारों में, पर बेमौसम बारिश ने बढ़ाई किसानों की धड़कनें

हिमाचल प्रदेश के चम्बा जिले के सीमांत गांव कुगती का प्राकृतिक देसी राजमाह अपनी खास बनावट और स्वाद के दम पर दिल्ली और पंजाब समेत कई राज्यों में लोकप्रिय हो रहा है, हालांकि अत्यधिक वर्षा से पैदावार पर संकट के बादल हैं.

हिमाचल प्रदेश के चम्बा जिले में भरमौर विधानसभा क्षेत्र के आखिरी छोर पर स्थित बर्फीले गांव कुगती का देसी राजमाह अपनी अनोखी पहचान बना रहा है. प्राकृतिक आबोहवा और जैविक वातावरण में पैदा होने वाले इस राजमाह के स्वाद और बेजोड़ गुणवत्ता की चर्चा अब सिर्फ पहाड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के कई प्रमुख बाजारों तक पहुंच चुकी है. दिल्ली और पंजाब जैसे राज्यों में इसकी खपत और मांग में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है. स्थानीय पहाड़ी आबादी के लिए यह पारंपरिक उपज अब मात्र भोजन की जरूरत पूरा करने का जरिया नहीं रही, बल्कि आय और आजीविका की मुख्य धुरी बन चुकी है.

पहाड़ों पर छह महीने की कड़ी तपस्या

कुगती की बर्फीली वादियों और ऊंचाई वाले दुर्गम इलाकों में खेती करना किसी अग्निपरीक्षा से कम साबित नहीं होता है. यहां कृषि योग्य मौसम काफी सीमित रहता है और भौगोलिक चुनौतियां किसानों की राह में लगातार बाधाएं खड़ी करती हैं. खेतों को तैयार करने से लेकर बुवाई और कटाई तक किसानों को बेहद कठिन शारीरिक परिश्रम से गुजरना पड़ता है. स्थानीय काश्तकार हर साल मार्च और अप्रैल के महीनों में खेतों में राजमाह के बीज बोते हैं. इसके बाद पूरे छह महीने तक फसलों की देखभाल की जाती है, जिसके बाद सितंबर और अक्टूबर में जाकर यह पैदावार कटाई के लिए पूरी तरह तैयार होती है.

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अत्यधिक नमी और बदलते मौसम से खड़ी हुई मुश्किलें

इस साल का मौसम कुगती के किसानों के लिए भारी चिंता का सबब बनकर उभरा है. इलाके में लगातार हुई मूसलाधार बारिश और जलवायु में आए अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव ने खेतों में खड़ी राजमाह की फसल को काफी प्रभावित किया है. लगातार बारिश होने की वजह से ढलानों और खेतों में लंबे समय तक अत्यधिक नमी जमा रही, जिससे दानों के विकास और कुल उत्पादन पर गहरा असर पड़ने का खतरा मंडरा रहा है. कुछ खेतों में पौधों को सीधा नुकसान भी पहुंचा है, जिसने उत्पादकों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं. इन तमाम दिक्कतों के बीच किसान अब भी आस लगाए हैं कि फसल चक्र के अंतिम दौर में मौसम साफ रहेगा और उन्हें संतोषजनक पैदावार मिल सकेगी.

प्रमुख नकदी फसल के रूप में बढ़ता दायरा

बीते कुछ वर्षों में कुगती घाटी के कृषि पैटर्न में बड़ा संरचनात्मक बदलाव देखा गया है. शोध अध्ययनों के आंकड़े बताते हैं कि इस इलाके में राजमाह की खेती का कुल रकबा लगातार बढ़ रहा है. परंपरागत अनाजों और फसलों की तुलना में राजमाह की बिक्री से किसानों को अधिक आर्थिक लाभ और बेहतर आमदनी मिल रही है, जिसके चलते यह क्षेत्र की प्रमुख नकदी फसल का रूप ले चुका है. हालांकि, अत्यधिक दुर्गम और सड़क विहीन इलाके होने के कारण तैयार फसल को बड़े शहरों की मुख्य मंडियों तक पहुंचाना आज भी किसानों के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बना हुआ है.

विपणन और परिवहन के उचित प्रबंध की दरकार

स्थानीय उत्पादकों का स्पष्ट मानना है कि यदि सरकार सुदूरवर्ती क्षेत्रों से उपज को बाहर भेजने के लिए मजबूत परिवहन साधन और व्यवस्थित सरकारी विपणन तंत्र उपलब्ध कराए, तो यह देसी राजमाह राष्ट्रीय फलक पर अपनी पहचान और मजबूत कर सकता है. मौसम की अनुकूलता के साथ-साथ सुगम बाजार मिलने पर न केवल सीमांत किसानों की आय में कई गुना इजाफा होगा, बल्कि घाटी की पारंपरिक खेती को भी एक टिकाऊ और लाभकारी भविष्य मिल सकेगा.

सवाल-जवाब

कुगती गांव हिमाचल प्रदेश के किस जिले और विधानसभा क्षेत्र में स्थित है?
कुगती गांव हिमाचल प्रदेश के चम्बा जिले के भरमौर विधानसभा क्षेत्र में स्थित सबसे अंतिम और दुर्गम गांव है.
कुगती के देसी राजमाह की मुख्य रूप से किन राज्यों में भारी मांग है?
अपने बेहतरीन स्वाद और विशिष्ट गुणवत्ता के कारण इसकी मुख्य रूप से दिल्ली और पंजाब सहित देश के विभिन्न राज्यों में अच्छी मांग है.
इस क्षेत्र में राजमाह की बुवाई और कटाई किस समय की जाती है?
कुगती में किसान मार्च-अप्रैल के महीनों में बीज की बुवाई करते हैं और सितंबर-अक्टूबर में फसल तैयार होकर कटाई की जाती है.
इस वर्ष कुगती के किसानों की चिंता किस कारण से बढ़ गई है?
इस साल अधिक बारिश होने और खेतों में लगातार नमी बने रहने से फसल खराब होने और उत्पादन गिरने की आशंका से किसान चिंतित हैं.
किसानों ने अन्य पारंपरिक फसलों की जगह राजमाह की खेती का रकबा क्यों बढ़ाया है?
पारंपरिक फसलों की तुलना में राजमाह से बेहतर आय मिलने के कारण यह एक प्रमुख नकदी फसल बन गया है और इसका रकबा लगातार बढ़ा है.
कुगती के किसानों को फसल को बड़े बाजारों तक ले जाने में क्या मुख्य समस्या आती है?
इलाका अत्यंत बर्फीला और दुर्गम होने की वजह से किसानों को तैयार फसल को बाजारों तक पहुंचाने में परिवहन संबंधी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है.
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Kavya Nair@kavya-nair·36 दिन पहले

कुगती के उस कठिन रास्ते पर जब पिछली बार मैं पैदल गई थी, तो वहाँ के किसानों की मेहनत अपनी आँखों से देखी थी। छह महीने की इस बर्फ़ीली तपस्या के बाद अगर बेमौसम बारिश फसल खराब कर दे, तो सचमुच दिल टूट जाता है। उम्मीद है मौसम साथ देगा और इन स्वादिष्ट राजमाह की खुशबू दिल्ली-पंजाब के साथ किसानों के घरों में भी राहत लाएगी।

Arjun Mehta@arjun-mehta·36 दिन पहले

राजमाह का स्वाद वाकई बहुत बढ़िया होता है, लेकिन सिर्फ मौसम को ही सारी परेशानी की वजह मान लेना थोड़ा अजीब लगता है। शायद परिवहन और सड़कों की हालत भी उतनी ही बड़ी समस्या है, जिसे नजरअंदाज किया जा रहा है।

Ravikash Gupta@ravikash·36 दिन पहले

अर्जुन, आपकी बात बिल्कुल सही है। बिना पक्की सड़कों के किसानों की आधी मेहनत तो वैसे ही बर्बाद हो जाती है।

Rohan Verma@rohan-verma·36 दिन पहले

जब मैं पिछले साल भरमौर गया था, तो वहाँ के स्थानीय लोगों ने मुझे खुद अपने हाथ से बना कुगती का राजमाह खिलाया था। उसका स्वाद आज भी याद है, उम्मीद है इस बार की बारिश से उनकी मेहनत खराब न हो।

Karan Malhotra@karan-malhotra·36 दिन पहले

रोहन भाई, सही कहा आपने! वहाँ का स्वाद वाकई बेजोड़ है। मौसम की मार से उनकी मेहनत बच जाए, यही उम्मीद है।

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