आईआईटी बॉम्बे परिसर में दूसरे वर्ष के एक छात्र की संदिग्ध मौत के बाद उपजा असंतोष तीन दिनों तक चले बड़े आंदोलन में तब्दील हो गया। संस्थान के मुख्य द्वार पर दिन-रात डटे छात्रों के व्यापक विरोध के सामने आखिरकार संस्थान प्रबंधन को झुकना पड़ा। संस्थान के निदेशक केदारे ने प्रदर्शनकारी विद्यार्थियों द्वारा सौंपे गए 18-सूत्रीय मांग पत्र पर अपनी औपचारिक सहमति जताते हुए हस्ताक्षर कर दिए हैं। इस समझौते के बाद परिसर में गतिरोध तो थमा है, लेकिन पूरे प्रकरण को लेकर छात्र समुदाय और प्रशासन के बीच तनाव अब भी महसूस किया जा रहा है।
लगातार तीन दिनों तक मुख्य द्वार पर धरना
छात्रों का यह आक्रोश उस दर्दनाक घटना के बाद भड़का, जिसमें दूसरे वर्ष के 22 वर्षीय छात्र का शव शुक्रवार शाम को उसके हॉस्टल के कमरे में मिला था। इस दुखद घटना से कुछ घंटे पहले छात्र पर मिड-सेमेस्टर परीक्षा के दौरान नकल करने का आरोप लगाया गया था। साथी छात्र की जान जाने की खबर मिलते ही विद्यार्थियों में रोष फैल गया और उन्होंने परिसर के मुख्य गेट को घेरते हुए अनिश्चितकालीन धरना शुरू कर दिया। तीन दिनों तक चले इस आंदोलन के दौरान छात्रों ने साफ कर दिया था कि जब तक संबंधित फैकल्टी पर कार्रवाई नहीं होती और उनकी बुनियादी मांगों को नहीं माना जाता, वे पीछे नहीं हटेंगे। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए निदेशक ने छात्रों से वार्ता की और सभी 18 मांगों को स्वीकार करने का निर्णय लिया।
18-सूत्रीय चार्टर में कार्रवाई और जांच की मुख्य शर्तें
प्रदर्शनकारी छात्रों द्वारा तैयार किए गए इस 18-सूत्रीय चार्टर में जवाबदेही, निष्पक्ष जांच और संस्थागत बदलावों पर जोर दिया गया है। छात्रों की सबसे प्रमुख मांग संबंधित शिक्षक के खिलाफ तत्काल एक्शन लेने की थी। चार्टर में मांग की गई कि प्रोफेसर सूर्यनारायण डूल्ला को तुरंत प्रभाव से निलंबित किया जाए और स्वतंत्र जांच पूरी होने पर दोषी पाए जाने वाले किसी भी व्यक्ति को पद से हटाया जाए। इसके अलावा, छात्रों ने संस्थान से बिना शर्त सार्वजनिक माफी की मांग भी रखी। उनका आरोप है कि एक लिंक्डइन पोस्ट में आंशिक और चुनिंदा विवरण साझा करके मृतक छात्र की मानहानि की गई, जिसे संस्थान को सार्वजनिक तौर पर स्वीकार करना चाहिए।
समयबद्ध रिपोर्ट और प्रशासनिक जवाबदेही
छात्रों ने केवल आश्वासन पर आंदोलन खत्म करने से इनकार करते हुए हर मांग के लिए स्पष्ट समयसीमा तय कराई है। समझौते के तहत छात्र की मौत की पूरी परिस्थितियों, आपातकालीन सेवाओं और अस्पताल की प्रतिक्रिया की पड़ताल के लिए एक स्वतंत्र जांच समिति का गठन किया जाएगा। इस समिति में प्रोफेसर, छात्र प्रतिनिधि, बाहरी सदस्य और छात्र प्रतिनिधियों द्वारा अनुशंसित व्यक्ति शामिल होंगे। इस जांच समिति को 30 सितंबर तक अपनी अंतरिम रिपोर्ट और 15 अक्टूबर तक अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी।
इसके साथ ही छात्रों ने प्रशासन की प्रत्यक्ष जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए 22 सितंबर से पहले एक ओपन हाउस आयोजित करने का निर्देश दिया है। इस ओपन हाउस में निदेशक, डीन एसए, डीन एपी और संबंधित विभाग के प्रमुख को सीधे छात्रों के सवालों और चिंताओं के उत्तर देने होंगे। समझौते में यह कड़ी शर्त भी रखी गई है कि यदि एक महीने के भीतर तय मांगों को धरातल पर लागू नहीं किया जाता, तो निदेशक, डीन एपी और डीन एसए अपने पदों से इस्तीफा देंगे। छात्र इन सभी मांगों के क्रियान्वयन पर साप्ताहिक प्रगति रिपोर्ट भी लेंगे।
मानसिक स्वास्थ्य सुधार और प्रभावित परिवारों को राहत
इस मांग पत्र का एक बड़ा हिस्सा कैंपस में मानसिक स्वास्थ्य संवेदनशीलता, छात्र कल्याण और व्यवस्थागत सुधारों से जुड़ा हुआ है। छात्रों ने रेखांकित किया कि हाल के महीनों में संस्थान के भीतर अपनों को खोने वाले चार परिवारों को संस्थान की ओर से उचित और त्वरित आर्थिक सहायता प्रदान की जाए और यह सहयोग निरंतर जारी रहे। इसके अलावा छात्रों ने मांग की कि परिसर में काउंसलिंग सेवाओं, चिकित्सा सहायता और फैकल्टी के व्यवहार को लेकर कड़े नियम बनाए जाएं।
छात्र संकट के मूल कारणों की जड़ तक पहुंचने के लिए एक स्थाई और स्वतंत्र तंत्र स्थापित करने पर सहमति बनी है। इस व्यवस्था में छात्रों के साथ-साथ फैकल्टी सदस्य, पेशेवर मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ और बाहरी जानकारों को शामिल किया जाएगा, ताकि अनुशासनात्मक प्रक्रियाओं को पारदर्शी बनाया जा सके और छात्रों में बढ़ रहे तनाव का समय पर समाधान हो सके।
क्राइम ब्रांच की जांच और दर्ज एफआईआर
संस्थान के भीतर छात्रों की मांगों पर सहमति बनने के बीच इस मामले की कानूनी जांच भी तेज हो गई है। पवई पुलिस ने मृतक छात्र के माता-पिता की लिखित शिकायत के आधार पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 108 (आत्महत्या के लिए उकसाना) और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के प्रावधानों के तहत प्राथमिकी दर्ज की है। परिवार ने आरोप लगाया है कि छात्र को गंभीर संस्थागत उत्पीड़न और जाति आधारित भेदभाव का सामना करना पड़ा।
मामले की गंभीरता को देखते हुए अब मुंबई क्राइम ब्रांच ने इस 22 वर्षीय छात्र की मौत की जांच पूरी तरह अपने हाथ में ले ली है। जांच एजेंसी द्वारा प्रोफेसर डूल्ला और अन्य संबंधित लोगों को पूछताछ के लिए तलब किए जाने की संभावना है। पुलिस के अनुसार प्रोफेसर को इस मामले में बतौर आरोपी नामजद किया गया है और परिवार द्वारा लगाए गए सभी आरोपों की सूक्ष्मता से जांच की जा रही है।
परीक्षा के दौरान का घटनाक्रम और फैकल्टी का रुख
पूरे विवाद की शुरुआत मिड-सेमेस्टर परीक्षा के दौरान हुई घटना से जुड़ी है। छात्र शुक्रवार को अपने हॉस्टल रूम में मृत मिला था, जबकि उसी दिन कुछ घंटे पहले उसे परीक्षा हॉल में कथित तौर पर स्मार्टफोन और चैटजीपीटी का सहारा लेते हुए पकड़ा गया था। संस्थान प्रशासन का कहना था कि छात्र ने परीक्षा के प्रश्नपत्र को चैटजीपीटी पर अपलोड करके उत्तर तलाशने का प्रयास किया था, लेकिन उसके खिलाफ कोई औपचारिक अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू नहीं की गई थी। प्रशासन का दावा है कि मौके पर मौजूद निरीक्षक और विभागाध्यक्ष ने छात्र की काउंसलिंग की थी और भरोसा दिया था कि इस वाकये से उसका शैक्षणिक करियर बर्बाद नहीं होगा।
दूसरी तरफ, आईआईटी बॉम्बे फैकल्टी फोरम ने प्रोफेसर सूर्यनारायण डूल्ला के समर्थन में खुलकर आवाज उठाई है। फैकल्टी फोरम ने डूल्ला के साथ पूर्ण एकजुटता व्यक्त करते हुए कहा कि वे उस समय मिड-सेमेस्टर परीक्षा की निगरानी कर रहे थे और उन्होंने तय संस्थागत प्रोटोकॉल का पालन करते हुए परीक्षा में स्मार्टफोन के अनधिकृत उपयोग की जानकारी अधिकारियों को दी थी। फोरम ने छात्र की असामयिक मौत पर परिवार के प्रति गहरी संवेदना प्रकट की, लेकिन साथ ही यह चिंता भी जताई कि अपने दायित्व का निर्वहन करने वाले प्रोफेसर की प्रतिष्ठा को बेवजह धूमिल किया जा रहा है। फिलहाल प्रशासनिक सहमति के बाद सभी की निगाहें 30 सितंबर को आने वाली अंतरिम जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं।



















