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जब देश के महानतम सेनानायक सैम बहादुर को अस्पताल के बेड पर मिला उनका वास्तविक हकभारत
28 जून 2026, 2:28 am (122 दिन पहले)· 2

जब देश के महानतम सेनानायक सैम बहादुर को अस्पताल के बेड पर मिला उनका वास्तविक हक

फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ के गौरवशाली सैन्य सफर और 1971 के ऐतिहासिक युद्ध में उनके नेतृत्व की गाथा, जिसके बाद उन्हें सेवानिवृत्ति के कई दशकों बाद राष्ट्रपति कलाम के हस्तक्षेप से अपना असली हक मिला।

भारतीय सैन्य इतिहास के सबसे चमकीले सितारे सैम होर्मूसजी फ्रैमजी जमशेदजी मानेकशॉ का जन्म 3 अप्रैल 1914 को अमृतसर के एक प्रतिष्ठित पारसी परिवार में हुआ था। उनके पिता पेशे से एक चिकित्सक थे और उनकी इच्छा थी कि उनका बेटा भी डॉक्टरी की पढ़ाई करने के लिए लंदन जाए। मगर सैम के मन में कुछ और ही चल रहा था। उन्होंने अपने पिता के इस विचार के प्रति असहमति जताते हुए बगावत का रुख अपनाया। इसके बाद उन्होंने जुलाई 1932 में नवगठित भारतीय सैन्य अकादमी यानी आईएमए के सबसे पहले बैच में दाखिला ले लिया, जिसे 'द पायनियर्स' के नाम से जाना जाता था।

चिकित्सा के बजाय सेना का मार्ग

सैम की जिंदगी का नया सफर यहीं से शुरू हुआ और वे देश सेवा के मार्ग पर आगे बढ़ गए। उनका व्यक्तिगत जीवन भी काफी सुखी रहा। 22 अप्रैल 1939 को उनका विवाह सिलू बोडे के साथ हुआ। सैम गोरखा सैनिकों के साहस और निडरता के बहुत बड़े प्रशंसक थे। उनकी बहादुरी को लेकर उनका एक प्रसिद्ध कथन आज भी भारतीय सेना के गलियारों में बड़े गर्व के साथ याद किया जाता है। उन्होंने कहा था कि अगर कोई व्यक्ति यह दावा करता है कि उसे अपनी मौत का कोई डर नहीं है, तो वह शख्स या तो झूठ बोल रहा है या फिर वह निश्चित तौर पर एक गोरखा है। गोरखा रेजिमेंट के जांबाज सैनिकों ने ही उन्हें पूरे सम्मान और स्नेह के साथ 'सैम बहादुर' का नाम दिया था, जो बाद में उनकी पहचान बन गया।

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1971 का ऐतिहासिक युद्ध और सैन्य सूझबूझ

सैम के रणनीतिक कौशल और नेतृत्व की सबसे कठिन परीक्षा साल 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान देखने को मिली। अप्रैल 1971 के महीने में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पूर्वी पाकिस्तान में मचे मानवीय हाहाकार को देखते हुए सेना को तुरंत हमला करने का निर्देश दिया था। लेकिन जनरल सैम ने बेहद स्पष्टवादी ढंग से इस जल्दबाजी वाले कदम को उठाने से मना कर दिया। उन्होंने तार्किक रूप से समझाया कि मानसून की भारी वर्षा के कारण सैन्य बलों की गति पूरी तरह ठप हो जाएगी, जिससे देश को पराजय का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने युद्ध की मुकम्मल तैयारियों के लिए सरकार से कुछ महीनों का अतिरिक्त वक्त मांगा और साथ ही शत-प्रतिशत विजय की गारंटी भी दी।

सख्त सैन्य अनुशासन और विजय गाथा

इसके बाद जब पाकिस्तान ने 3 दिसंबर 1971 की शाम भारतीय हवाई ठिकानों पर हमले शुरू किए, तो सैम ने अपनी बहुआयामी और अत्यंत तीव्र सैन्य रणनीति को धरातल पर उतारा। इस युद्ध की शुरुआत से ठीक पहले उन्होंने अपने सैनिकों को सख्त हिदायत दी थी कि वे स्थानीय महिलाओं की मर्यादा और सम्मान का पूरा ध्यान रखेंगे। भारतीय सेना की इस अभूतपूर्व तैयारी का परिणाम यह हुआ कि मात्र 13 दिनों के भीतर भारत ने एक ऐतिहासिक और गौरवशाली जीत हासिल की। युद्ध के मैदान में 90,000 से भी अधिक पाकिस्तानी सैनिकों को बिना किसी शर्त के घुटने टेकने पड़े और आत्मसमर्पण करना पड़ा, जिसके बाद विश्व मानचित्र पर नए राष्ट्र बांग्लादेश का उदय हुआ।

अस्पताल के बेड पर मिला सालों पुराना बकाया

सैम मानेकशॉ 15 जनवरी 1973 को अपने पद से सेवामुक्त हुए। चूंकि फील्ड मार्शल का सम्मानीय सैन्य पद जीवनपर्यंत चलने वाला होता है और इस सर्वोच्च दर्जे का अधिकारी कभी सेवानिवृत्त नहीं माना जाता, इसलिए वे अपने पूरे वेतन के हकदार थे। हालांकि, प्रशासनिक और लालफीताशाही की बाधाओं के चलते उन्हें लंबे समय तक मात्र आधी पेंशन पर ही गुजारा करना पड़ा। इस गंभीर मुद्दे पर तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने व्यक्तिगत रूप से संज्ञान लिया और उनके हस्तक्षेप के बाद अप्रैल 2007 में तत्कालीन रक्षा सचिव शेखर दत्त स्वयं अस्पताल पहुंचे। वहां उन्होंने बीमार फील्ड मार्शल को उनके 1.16 करोड़ रुपए के बकाये का चेक सौंपा। आखिरकार, फेफड़ों में संक्रमण होने के कारण इस महान नायक ने 27 जून 2008 को तमिलनाडु के वेलिंगटन में 94 वर्ष की आयु में अंतिम सांस ली।

सवाल-जवाब

सैम मानेकशॉ का जन्म कहां हुआ था और उनके पिता उन्हें क्या बनाना चाहते थे?
सैम मानेकशॉ का जन्म 3 अप्रैल 1914 को अमृतसर में हुआ था। उनके पिता एक डॉक्टर थे और वे सैम को भी चिकित्सा की पढ़ाई के लिए लंदन भेजना चाहते थे।
उन्हें 'सैम बहादुर' का नाम किसने दिया था?
सैम मानेकशॉ गोरखा सैनिकों की निडरता के बड़े प्रशंसक थे। गोरखा रेजिमेंट के सैनिकों ने ही उन्हें आदरपूर्वक 'सैम बहादुर' का नाम दिया था।
उन्होंने अप्रैल 1971 में तुरंत सैन्य कार्रवाई करने से क्यों इनकार कर दिया था?
उन्होंने इनकार कर दिया क्योंकि मानसून की भारी बारिश के कारण सेना की रफ्तार रुक जाती और हार का जोखिम बढ़ जाता। उन्होंने तैयारी के लिए समय मांगा था।
1971 का युद्ध कितने समय चला और इसके बाद किस देश का गठन हुआ?
यह युद्ध केवल 13 दिनों तक चला, जिसमें 90,000 से अधिक पाकिस्तानी सैनिकों ने बिना शर्त आत्मसमर्पण कर दिया। इसके परिणामस्वरूप बांग्लादेश का गठन हुआ।
उन्हें सेवानिवृत्ति के बाद लंबे समय तक कम पेंशन क्यों मिल रही थी?
फील्ड मार्शल का पद जीवनभर के लिए होता है, लेकिन नौकरशाही की बाधाओं के कारण उन्हें केवल आधी पेंशन मिल रही थी। राष्ट्रपति कलाम के हस्तक्षेप के बाद उन्हें 1.16 करोड़ का बकाया मिला।
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