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जमीन की रजिस्ट्री के बाद दाखिल खारिज नहीं हुआ तो क्या मालिकाना हक छिन जाएगा, सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसलाभारत
8 अक्तू॰ 2026, 9:52 pm (2 घंटे पहले)· 0

जमीन की रजिस्ट्री के बाद दाखिल खारिज नहीं हुआ तो क्या मालिकाना हक छिन जाएगा, सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि दाखिल खारिज न होने पर भी रजिस्टर्ड सेल डीड के आधार पर मालिकाना हक पूरी तरह सुरक्षित रहता है और जमीन बेचने के लिए म्यूटेशन का सबूत अनिवार्य नहीं है।

जमीन, प्लॉट या मकान खरीदने वाले खरीदारों के बीच लंबे समय से यह संशय बना रहता है कि क्या दाखिल खारिज कराए बिना प्रॉपर्टी की रजिस्ट्री पूरी मानी जाती है। आम धारणा यही रही है कि अगर सरकारी राजस्व रिकॉर्ड में म्यूटेशन यानी दाखिल खारिज दर्ज नहीं हुआ, तो खरीदार को संपत्ति का कानूनी मालिकाना हक हासिल नहीं हो पाता। देश की शीर्ष अदालत ने इस कानूनी भ्रम को पूरी तरह समाप्त करते हुए स्पष्ट व्यवस्था दी है कि दाखिल खारिज का दस्तावेज न होने की स्थिति में भी रजिस्टर्ड सेल डीड निष्प्रभावी नहीं होती और व्यक्ति का मालिकाना हक कानूनी तौर पर बरकरार रहता है।

समीउल्लाह बनाम स्टेट ऑफ बिहार मामले में शीर्ष अदालत का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने समीउल्लाह बनाम स्टेट ऑफ बिहार, 2025 के मामले की सुनवाई करते हुए रजिस्ट्रेशन और म्यूटेशन की कानूनी स्थिति पर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। शीर्ष अदालत ने कहा कि जब भी कोई व्यक्ति अपने मालिकाना हक वाली जमीन या अचल संपत्ति को बेचना चाहता है, तो उसके लिए म्यूटेशन यानी दाखिल खारिज का प्रमाण पेश करना अनिवार्य शर्त नहीं है। अगर किसी व्यक्ति के पास वैध सेल डीड मौजूद है, तो वह म्यूटेशन रिकॉर्ड के बिना भी अपनी मिल्कियत वाली प्रॉपर्टी का बैनामा करने और उसे बेचने का पूरा कानूनी अधिकार रखता है। अदालत ने रेखांकित किया कि रजिस्ट्री और दाखिल खारिज दो पूरी तरह अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं हैं, जिन्हें एक साथ मिलाकर नहीं देखा जा सकता।

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रजिस्ट्री ही तय करती है संपत्ति का असली टाइटल

अदालत के इस फैसले से साफ होता है कि किसी भी अचल संपत्ति की रजिस्ट्री यानी रजिस्टर्ड सेल डीड सीधे तौर पर उसके टाइटल यानी मालिकाना हक के हस्तांतरण का दस्तावेज होती है। इस कानूनी प्रक्रिया के अंतर्गत संपत्ति का मौजूदा स्वामी अपने टाइटल को विधिवत रूप से नए खरीदार के नाम पर ट्रांसफर करता है। अचल संपत्ति के लेन-देन में सेल डीड ही सबसे बुनियादी और निर्णायक टाइटल दस्तावेज मानी जाती है। कानून की नजर में यदि किसी नागरिक के पास वैध रजिस्ट्री मौजूद है, तो वही व्यक्ति उस प्रॉपर्टी का असली और कानूनी मालिक माना जाएगा, भले ही उसने स्थानीय राजस्व विभाग में दाखिल खारिज की प्रक्रिया पूरी न कराई हो।

दाखिल खारिज केवल राजस्व रिकॉर्ड, मालिकाना हक का पैमाना नहीं

शीर्ष अदालत ने म्यूटेशन के कानूनी दायरे की भी स्पष्ट व्याख्या की है। अदालत के अनुसार, दाखिल खारिज किसी भी प्रॉपर्टी के मालिकाना हक को परिभाषित या सृजित नहीं करता है। म्यूटेशन की प्रक्रिया केवल रेवेन्यू अथवा म्यूनिसिपल रिकॉर्ड के रखरखाव और टैक्स संकलन के उद्देश्य से की जाने वाली प्रशासनिक व्यवस्था है। यह रिकॉर्ड किसी व्यक्ति के वास्तविक स्वामित्व का निर्णय नहीं करता है। ऐसे में यदि किसी व्यक्ति के पास दाखिल खारिज का दस्तावेज उपलब्ध नहीं है, तो इसका यह अर्थ कतई नहीं निकाला जा सकता कि संपत्ति पर उसका अधिकार खत्म हो गया है। किसी भी प्रॉपर्टी का कानूनी स्वामित्व तय करने के लिए वैध रजिस्टर्ड सेल डीड ही अपने आप में पर्याप्त आधार है।

सवाल-जवाब

क्या बिना दाखिल खारिज कराए सिर्फ रजिस्ट्री से मालिकाना हक मिल जाता है?
हां, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार वैध सेल डीड ही मालिकाना हक तय करती है और दाखिल खारिज न होने पर भी स्वामित्व सुरक्षित रहता है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला किस मामले में सुनाया?
यह फैसला सुप्रीम कोर्ट ने समीउल्लाह बनाम स्टेट ऑफ बिहार, 2025 (Samiullah vs State of Bihar, 2025) के मामले में दिया है।
क्या जमीन बेचने के लिए म्यूटेशन का प्रूफ देना जरूरी है?
नहीं, अदालत ने साफ किया है कि अपनी जमीन बेचने के लिए व्यक्ति को दाखिल खारिज का प्रमाण देना अनिवार्य नहीं है।
कानून में रजिस्ट्री और दाखिल खारिज में क्या मुख्य अंतर है?
रजिस्ट्री संपत्ति के टाइटल यानी मालिकाना हक का कानूनी ट्रांसफर है, जबकि दाखिल खारिज सिर्फ टैक्स और प्रशासनिक कार्यों के लिए राजस्व रिकॉर्ड होता है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Ayesha Siddiqui@ayesha-siddiqui·32 मिनट पहले

मेरे एक रिश्तेदार सालों से पटवारी के चक्कर काट रहे थे सिर्फ दाखिल खारिज के लिए, डर था कि जमीन हाथ से निकल जाएगी। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उन लोगों के लिए बड़ी राहत है जो सरकारी दफ्तरों के इस खेल से परेशान रहते हैं।

Ravikash Gupta@ravikash·53 मिनट पहले

अदालत का फैसला अपनी जगह ठीक है, पर ज़मीन-मकान के मामलों में बिना दाखिल-खारिज के कागज़ी पचड़े से बचना मुश्किल ही लगता है। बाबू लोग बिना म्यूटेशन के कहां मानते हैं?

Tanvi Desai@tanvi-desai·52 मिनट पहले

रविकाश जी, बात तो सही है कि सरकारी दफ़्तरों में बाबू लोग परेशान करते हैं, पर कोर्ट के फैसले के बाद कम से कम कानूनी डर तो खत्म हुआ कि कोई हक नहीं छीन सकता।

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 घंटे पहले

बात तो सही है पर तहसील के चक्कर कटवाने वालों से कौन पूछेगा, कागज़ पर हक होने से क्या फायदा जब असली दफ्तरों में धक्के खाने पड़ें।

Arjun Mehta@arjun-mehta·1 घंटे पहले

करण भाई, बात तो सौ टका सच है। कानून चाहे जो कहे, तहसील वाले बिना रिश्वत और चक्कर कटवाए काम कहाँ करते हैं?

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