उच्च शिक्षण संस्थानों में फर्जी दस्तावेजों के सहारे दाखिला दिलाने वाले एक संगठित अंतरराज्यीय गिरोह का पर्दाफाश हुआ है। उत्तरी दिल्ली क्षेत्र में सक्रिय इस नेटवर्क के तार कई राज्यों से जुड़े थे, जो सामान्य छात्रों के फर्जी दिव्यांग यानी पीडब्ल्यूडी प्रमाणपत्र तैयार कर उन्हें आरक्षित कोटे की सीटों पर प्रवेश दिलाते थे। उत्तरी जिले के स्पेशल स्टाफ ने सुनियोजित तरीके से कार्रवाई करते हुए इस अवैध धंधे में शामिल 9 आरोपियों को हिरासत में ले लिया है। पुलिस टीम ने आरोपियों के ठिकानों से 27 जाली दिव्यांग प्रमाणपत्र समेत भारी मात्रा में डिजिटल उपकरण और अन्य सामग्री बरामद की है।
दाखिले के लिए बड़े कोर्स और संस्थान थे निशाने पर
उत्तरी जिले की पुलिस उपायुक्त निहारिका भट्ट ने बताया कि यह गिरोह छात्रों को दिल्ली विश्वविद्यालय, बीटेक, जेबीटी और अन्य स्नातक पाठ्यक्रमों में पीडब्ल्यूडी कोटे के तहत दाखिला दिलाने का झांसा देता था। जांच में यह स्पष्ट हुआ है कि इस गिरोह की जड़ें केवल राजधानी तक सीमित नहीं थीं, बल्कि इसका नेटवर्क उत्तर प्रदेश के कई अलग-अलग जिलों में गहराई तक फैला हुआ था। गिरोह के सदस्य उन छात्रों को लक्षित करते थे जो प्रतिष्ठित कॉलेजों में सामान्य मेरिट से प्रवेश पाने में असफल रहते थे या आरक्षित कोटे का अनुचित लाभ उठाना चाहते थे।
एआई तकनीक से तैयार होते थे फर्जी आधार और पते
पुलिस जांच में इस सिंडिकेट के काम करने के पूरे तौर-तरीके का खुलासा हुआ है। इस पूरे गोरखधंधे का पहला चरण छात्रों की तलाश और उनकी निजी जानकारी जुटाने से शुरू होता था। नेटवर्क से जुड़े तथाकथित शिक्षा सलाहकार सबसे पहले इच्छुक छात्रों से उनके वास्तविक आधार कार्ड, पासपोर्ट साइज फोटो और हस्ताक्षर एकत्र करते थे। इसके बाद इन दस्तावेजों में तकनीकी हेरफेर की जाती थी। गिरोह के सदस्य आधुनिक एआई टूल्स का दुरुपयोग करके आधार कार्ड पर उत्तर प्रदेश के फर्जी पते दर्ज कर देते थे। इन जाली पतों का उपयोग आगे चलकर पीडब्ल्यूडी प्रमाणपत्र की आधिकारिक प्रक्रिया में किया जाता था ताकि संबंधित जिलों से कागजात तैयार करवाए जा सकें।
यूडीआईडी पोर्टल पर फर्जीवाड़ा और जाली मेडिकल रिपोर्ट
आधार कार्ड में उत्तर प्रदेश का फर्जी पता तैयार करने के बाद आरोपी दिव्यांगता प्रमाणपत्र के लिए आधिकारिक यूडीआईडी पोर्टल पर ऑनलाइन आवेदन जमा करते थे। इसके बाद गिरोह में शामिल संपर्कों की मदद से पूरी तरह मनगढ़ंत और जाली मेडिकल रिपोर्ट तैयार की जाती थी। इन फर्जी मेडिकल रिपोर्टों को संबंधित सरकारी प्रणाली में सीधे अपलोड कर दिया जाता था। इस चालबाजी के जरिए पूरी तरह स्वस्थ छात्र को भी कागजों पर दिव्यांग दर्शा दिया जाता था और उसके नाम से वैध दिखने वाला पीडब्ल्यूडी प्रमाणपत्र हासिल कर लिया जाता था।
प्रति प्रमाणपत्र 20 से 30 हजार रुपये की वसूली और सरकारी सांठगांठ का शक
इस पूरे फर्जीवाड़े के एवज में छात्रों और उनके परिजनों से मोटी रकम वसूली जाती थी। प्रत्येक फर्जी दिव्यांग प्रमाणपत्र तैयार करने के बदले आरोपी करीब 20 से 30 हजार रुपये की मांग करते थे। जांच के दौरान यह भी सामने आया कि ये जाली प्रमाणपत्र उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों के सरकारी अस्पतालों और मुख्य चिकित्सा अधिकारी यानी सीएमओ कार्यालयों के नाम से तैयार कराए जा रहे थे। पुलिस को अंदेशा है कि इस व्यापक नेटवर्क को संचालित करने में सरकारी तंत्र और चिकित्सा विभाग से जुड़े कुछ लोगों की भी मिलीभगत हो सकती है, जिसकी विस्तृत जांच की जा रही है।
नकदी, लग्जरी कार और भारी मात्रा में गैजेट्स जब्त
छापेमारी की कार्रवाई के दौरान स्पेशल स्टाफ ने आरोपियों के कब्जे से उन्नत इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बरामद किए हैं, जिनका उपयोग दस्तावेज तैयार करने में किया जाता था। बरामद सामान में लैपटॉप, मैकबुक और डेस्कटॉप कंप्यूटर शामिल हैं। इसके अतिरिक्त पुलिस ने आरोपियों से 11 मोबाइल फोन, 27 जाली दिव्यांग प्रमाणपत्र और 75 हजार रुपये नकद भी जब्त किए हैं। आरोपियों के पास से एक मर्सिडीज कार भी बरामद की गई है। पुलिस अब इस बात की गहन पड़ताल कर रही है कि यह गिरोह अब तक कितने छात्रों के लिए ऐसे फर्जी दस्तावेज बना चुका है और किन-किन कॉलेजों अथवा पाठ्यक्रमों में इन अवैध प्रमाणपत्रों का इस्तेमाल कर दाखिला लिया गया है।



















