भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा लगभग साढ़े तीन साल के अंतराल के बाद रेपो रेट में की गई बढ़ोतरी ने वित्तीय बाजार में हलचल पैदा कर दी है। इसके बाद वाणिज्यिक बैंकों ने अपनी कर्ज दरों में संशोधन करना शुरू कर दिया है। जहां सार्वजनिक क्षेत्र के यूको बैंक ने रेपो रेट से जुड़े अपने ऋणों पर ब्याज दरें तुरंत बढ़ा दी हैं, वहीं अपनी जमा राशि पर बेहतर रिटर्न की उम्मीद कर रहे ग्राहकों को अभी थोड़ा इंतजार करना होगा। देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने यह पूरी तरह साफ कर दिया है कि फिक्स्ड डिपॉजिट पर ब्याज दरों में तुरंत कोई बढ़ोतरी नहीं की जाएगी।
बैंकिंग प्रणाली में अतिरिक्त नकदी के कारण जमा दरें स्थिर
स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के चेयरमैन सीएस शेट्टी के अनुसार, वर्तमान में देश की बैंकिंग प्रणाली में पर्याप्त मात्रा में अतिरिक्त नकदी उपलब्ध है। इस भरपूर नकदी के कारण बड़े बैंकों को नई पूंजी जुटाने के लिए जमा दरों को तुरंत बढ़ाने की कोई आवश्यकता महसूस नहीं हो रही है। यही वजह है कि अगले दो से तीन महीनों के दौरान आम उपभोक्ताओं के लिए FD दरों में किसी भी तरह के बदलाव की संभावना नहीं है। बैंक प्रबंधन का मानना है कि केंद्रीय बैंक द्वारा रेपो रेट में की गई इस वृद्धि से आने वाली दो से तीन तिमाहियों तक बैंकों के नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) को मजबूती मिलेगी। इस अवधि में जब बैंकों के मुनाफे का मार्जिन सुधरेगा, उसके बाद ही ग्राहकों को दी जाने वाली जमा दरों में बढ़ोतरी पर विचार किया जा सकता है।
आरबीआई के सख्त रुख और कर्ज दरों पर इसका प्रभाव
हाल ही में रिज़र्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति ने नीतिगत रेपो दर को 0.25 प्रतिशत बढ़ाकर 5.50 प्रतिशत करने का निर्णय लिया है। इसके साथ ही, केंद्रीय बैंक ने अपने रुख को बदलकर सख्त और नियंत्रित करने वाला बना दिया है, ताकि देश में बढ़ती महंगाई पर काबू पाया जा सके। इस फैसले का सीधा असर कर्ज लेने वाले ग्राहकों पर पड़ा है क्योंकि भारतीय बैंकिंग प्रणाली में 50 प्रतिशत से अधिक ऋण बाहरी बेंचमार्क दरों से जुड़े हुए हैं। चूंकि इन ऋणों के लिए रेपो रेट ही सबसे मुख्य बाहरी बेंचमार्क है, इसलिए केंद्रीय बैंक की नीतिगत दरों में होने वाला कोई भी बदलाव सीधे ग्राहकों के लोन की ब्याज दरों को बढ़ा देता है, जैसा कि यूको बैंक के मामले में देखा गया है।
भविष्य में कर्ज की मांग बढ़ने पर बढ़ सकती हैं एफडी दरें
आने वाले समय में सावधि जमा या फिक्स्ड डिपॉजिट पर मिलने वाले ब्याज की दिशा मुख्य रूप से ऋण की मांग पर निर्भर करेगी। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के शीर्ष अधिकारियों का कहना है कि यदि ऋण की मांग इसी तेज रफ्तार से बढ़ती रही, तो बैंकों को कर्ज देने के लिए अतिरिक्त फंड जुटाने की जरूरत पड़ेगी। ऐसी स्थिति में बैंकों को मजबूरन अपनी जमा दरें बढ़ानी होंगी ताकि वे अधिक से अधिक ग्राहकों को अपनी ओर आकर्षित कर सकें। इसके अलावा, बढ़ती मुद्रास्फीति के दौर में जमाकर्ताओं को सकारात्मक वास्तविक ब्याज दर मिलना भी बेहद जरूरी है। बाजार विश्लेषकों का अनुमान है कि रिज़र्व बैंक आने वाले समय में दो या तीन चरणों में कुल मिलाकर 0.75 प्रतिशत तक रेपो रेट बढ़ा सकता है, जिसके बाद बैंकों पर जमा दरों में बढ़ोतरी का दबाव और बढ़ जाएगा।
स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने जताया कर्ज वृद्धि पर भरोसा
बाजार में सख्त मौद्रिक नीतियों के बावजूद, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया अपने परिचालन और ऋण पोर्टफोलियो को लेकर काफी सकारात्मक है। इस प्रमुख सरकारी बैंक को उम्मीद है कि वह चालू वित्त वर्ष में अपने ऋण पोर्टफोलियो में 14 से 15 प्रतिशत की मजबूत वृद्धि दर बनाए रखने में सफल रहेगा। बैंक के नीतिगत दिशानिर्देशों के अनुसार, इसकी कर्ज वृद्धि दर देश की नाममात्र सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृद्धि दर से कम से कम दो से तीन प्रतिशत अधिक होनी चाहिए। चूंकि बैंक के कुल ऋण पोर्टफोलियो का एक बड़ा हिस्सा सीधे बाहरी मानकों से जुड़ा हुआ है, इसलिए इन संपत्तियों की दरों में स्वतः ही सुधार हो जाएगा, जिससे बैंक की आय में लगातार वृद्धि होती रहेगी, भले ही जमाकर्ताओं को फिलहाल अपनी पुरानी दरों पर ही संतोष करना पड़े।



















