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झांसी मेडिकल कॉलेज में दर्दनाक नजारा, शव वाहन न मिलने पर बारिश में स्ट्रेचर के पास बैठा रहा लाचार पतिउत्तर प्रदेश
5 सित॰ 2026, 12:22 am (8 दिन पहले)· 2

झांसी मेडिकल कॉलेज में दर्दनाक नजारा, शव वाहन न मिलने पर बारिश में स्ट्रेचर के पास बैठा रहा लाचार पति

झांसी के महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज में एक गरीब पति को पत्नी के निधन के बाद शव घर ले जाने के लिए वाहन और पैसे नहीं मिले। बारिश के बीच वह अपनी आठ साल की बेटी के साथ घंटों स्ट्रेचर के पास बैठा रहा, जिसके बाद एक पुलिसकर्मी ने आगे आकर एंबुलेंस का इंतजाम किया।

उत्तर प्रदेश के झांसी से स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की पोल खोल देने वाली एक अत्यंत संवेदनशील घटना सामने आई है, जहाँ इलाज के दौरान एक महिला की मृत्यु के बाद उसके गरीब पति को शव घर तक पहुँचाने के लिए कोई साधन नसीब नहीं हुआ। मूसलाधार बारिश के बीच यह बेबस व्यक्ति अपनी मृत पत्नी के स्ट्रेचर के पास घंटों तक मदद की गुहार लगाते हुए बैठा रहा, जबकि उसकी छोटी सी बच्ची अपनी माँ के पार्थिव शरीर को देखकर लगातार बिलखती नजर आई। इस हृदयविदारक माहौल में किसी भी जिम्मेदार कर्मी ने शुरुआत में उनकी सुध नहीं ली, लेकिन अंत में एक पुलिसकर्मी की मानवीय पहल ने इस पीड़ित परिवार की मदद की और शव को उनके पैतृक निवास तक पहुँचाने का रास्ता साफ किया।

ओरछा से झांसी रेफर की गई थी मरीज

यह पूरा मामला झांसी शहर स्थित प्रतिष्ठित महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज परिसर से जुड़ा हुआ है। मध्य प्रदेश के निवाड़ी जिले के अंतर्गत आने वाले नकटा गाँव के निवासी राहुल आदिवासी की धर्मपत्नी रामवती पिछले काफी समय से गंभीर रूप से बीमार चल रही थीं। अपनी पत्नी की बिगड़ती हुई तबीयत को देखकर राहुल उन्हें सबसे पहले ओरछा के एक अस्पताल में लेकर गए थे। वहाँ डॉक्टरों ने उनकी नाज़ुक हालत को देखते हुए बेहतर उपचार के लिए उन्हें झांसी मेडिकल कॉलेज के लिए रेफर कर दिया था।

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अस्पताल पहुँचते ही टूट गई सांसें

राहुल के अनुसार उनके पास पर्याप्त वित्तीय संसाधन नहीं थे, फिर भी उन्होंने किसी तरह पैसों का जुगाड़ किया और एक टैक्सी किराए पर लेकर अपनी पत्नी को लेकर झांसी मेडिकल कॉलेज पहुँचे। उनके साथ उनकी लगभग 8 साल की छोटी बेटी नंदनी भी इस सफर में साथ थी। जैसे ही वे लोग अस्पताल पहुँचे, वहाँ के चिकित्सकों ने रामवती की जाँच के बाद उन्हें मृत घोषित कर दिया। डॉक्टरों द्वारा मृत घोषित किए जाने के बाद अस्पताल प्रशासन ने औपचारिकता पूरी करते हुए शव को एक स्ट्रेचर पर रखकर परिजनों के हवाले कर दिया। परंतु यहाँ पहुँचने के बाद इस गरीब परिवार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह आन पड़ी कि उनके पास मृतका के शव को वापस अपने गाँव ले जाने के लिए न तो कोई निजी वाहन था और न ही वाहन का किराया चुकाने के पर्याप्त पैसे बचे थे।

बारिश के बीच घंटों इंतजार करता रहा परिवार

अपनी जीवनसंगिनी को खोने के गहरे सदमे से जूझ रहे राहुल के कंधों पर उस वक्त मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा जब उन्हें कोई रास्ता नहीं सूझा। वह मजबूरी में शव वाले स्ट्रेचर को लेकर अस्पताल के वाहन स्टैंड की छत के नीचे आकर बैठ गए। बाहर तेज बारिश हो रही थी और ठीक सामने स्ट्रेचर पर उनकी पत्नी का शव रखा हुआ था। उनके ठीक पास बैठी उनकी मासूम बेटी नंदनी अपनी माँ की ऐसी हालत देखकर लगातार रोए जा रही थी। पिता और पुत्री दोनों ही करीब एक घंटे तक लगातार मदद की उम्मीद में वहाँ बैठे रहे और आने-जाने वाले हर शख्स की तरफ आस भरी नजरों से देखते रहे कि शायद कोई उनकी इस विपदा में मददगार बन जाए।

खाकी ने दिखाई इंसानियत

घंटों तक जब किसी अन्य व्यक्ति की नजर उन पर नहीं पड़ी, तो उसी दौरान वहाँ से गुजर रहे उत्तर प्रदेश पुलिस के एक सिपाही की निगाह स्ट्रेचर के पास बैठे उस लाचार पिता और रोती हुई बच्ची पर पड़ी। सिपाही ने तुरंत उनके पास जाकर रुकने का कारण पूछा और पूरी स्थिति की जानकारी ली। जब पुलिसकर्मी को यह असलियत मालूम हुई कि इस परिवार के पास शव को घर ले जाने के लिए एक फूटी कौड़ी भी नहीं है, तो उसने फौरन मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए खुद मदद करने का दृढ़ निश्चय किया। उस सिपाही ने तुरंत प्रभाव से एक एंबुलेंस का प्रबंध करवाया और हर संभव सहायता देते हुए शव को उनके पैतृक गाँव भिजवाने की मुकम्मल व्यवस्था की।

अस्पताल प्रशासन का पक्ष और ऐसी ही अन्य घटनाएं

इस पूरे मामले के तूल पकड़ने और सोशल मीडिया पर तस्वीरें वायरल होने के बाद, मेडिकल कॉलेज के सीएमएस डॉ. सचिन माहुर ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए स्पष्ट किया कि जिन भी परिजनों के पास मृतक के शव को ले जाने के वास्ते साधन की व्यवस्था नहीं होती है, उनके लिए मेडिकल कॉलेज प्रबंधन की तरफ से निःशुल्क शव वाहन उपलब्ध कराया जाता है। उन्होंने यह भी संभावना जताई कि हो सकता है संबंधित पीड़ित परिजनों ने अपनी इस गंभीर समस्या के बारे में अस्पताल के किसी भी सक्रिय स्टाफ को मौके पर जानकारी न दी हो।

गौरतलब है कि ऐसी लापरवाही या व्यवस्था की कमी का यह कोई इकलौता मामला नहीं है। इससे पहले झारखंड के गुमला जिले से भी स्वास्थ्य तंत्र को शर्मसार कर देने वाला एक ऐसा ही झकझोर देने वाला वाकया सामने आ चुका है। वहाँ नौवीं कक्षा की छात्रा शिवानी कुमारी ने समय पर एंबुलेंस और ऑक्सीजन उपलब्ध न हो पाने के कारण अपने माता-पिता की गोद में ही तड़प-तड़पकर दम तोड़ दिया था। इसके अलावा मध्य प्रदेश के उमरिया से भी एक ऐसी ही तस्वीर आई थी जहाँ गांव में पक्की सड़क न होने और एंबुलेंस के फंस जाने के कारण परिजनों को एक गर्भवती महिला को चादर के झूले में लादकर अस्पताल पहुँचाना पड़ा था जिसका वीडियो काफी वायरल हुआ था।

सवाल-जवाब

यह घटना किस अस्पताल की है?
यह घटना झांसी के महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज की है।
मृतक महिला का नाम क्या था और वह कहाँ की रहने वाली थी?
मृतक महिला का नाम रामवती था और वह मध्य प्रदेश के निवाड़ी जिले के नकटा गाँव की रहने वाली थीं।
पति का नाम क्या है और उनके साथ कौन था?
पति का नाम राहुल आदिवासी है और उनके साथ उनकी लगभग 8 साल की बेटी नंदनी भी थी।
परिवार को मदद किसने पहुँचाई?
उत्तर प्रदेश पुलिस के एक सिपाही ने मौके पर पहुँचकर एंबुलेंस की व्यवस्था कराई और शव को घर भिजवाया।
अस्पताल प्रशासन का इस मामले में क्या कहना है?
मेडिकल कॉलेज के सीएमएस डॉ. सचिन माहुर ने कहा कि वाहन की व्यवस्था निःशुल्क की जाती है और संभव है परिजनों ने स्टाफ को नहीं बताया हो।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Riya Menon@riya-menon·7 दिन पहले

यह घटना न केवल स्वास्थ्य व्यवस्था की संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल उठाती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि कैसे कमजोर वर्ग बुनियादी मानवीय गरिमा से वंचित रह जाता है। अस्पताल परिसर में शव वाहन और गरिमापूर्ण विदाई की व्यवस्था का अभाव प्रशासनिक उदासीनता का प्रमाण है। यदि समय पर संस्थागत प्रोटोकॉल और हेल्पडेस्क सक्रिय हों, तो ऐसी अमानवीय स्थितियों से बचा जा सकता है। भविष्य में ऐसे संस्थानों को अनिवार्य रूप से मुफ्त शव वाहन सेवा और पीड़ित सहायता डेस्क को पारदर्शी बनाना चाहिए।

Ravikash Gupta@ravikash·7 दिन पहले

झांसी मेडिकल कॉलेज की यह घटना केवल एक मानवीय संवेदना की विफलता नहीं, बल्कि हमारी लचर सार्वजनिक स्वास्थ्य रसद और आर्थिक असमानता का गंभीर प्रतिबिंब है। जब तक जिला अस्पतालों में शव वाहनों की मुफ्त या किफायती उपलब्धता को वित्तीय रूप से पारदर्शी और अनिवार्य नहीं बनाया जाएगा, तब तक ऐसे हृदयविदारक हादसे गरीब परिवारों की नियति बने रहेंगे। इस मामले में प्रशासनिक जवाबदेही तय करना और त्वरित परिवहन प्रोटोकॉल लागू करना अत्यंत आवश्यक हो गया है ताकि कोई भी परिवार अपनों को खोने के बाद इस तरह असहाय न बैठे।

Arjun Mehta@arjun-mehta·7 दिन पहले

यह घटना स्वास्थ्य प्रशासन की गहरी उदासीनता और नीतिगत विफलताओं को उजागर करती है। जब तक जिला अस्पतालों में मृतदेह परिवहन के लिए पारदर्शी और मुफ्त प्रोटोकॉल को कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं किया जाता, तब तक ऐसी घटनाएं व्यवस्था की संवेदनहीनता पर सवाल उठाती रहेंगी। नीति निर्माताओं को तुरंत जमीनी स्तर पर रसद तंत्र की समीक्षा करनी चाहिए।

Rohan Verma@rohan-verma·7 दिन पहले

झांसी मेडिकल कॉलेज की यह घटना उत्तर प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था और जिला अस्पतालों में गरीब मरीजों के लिए उपलब्ध परिवहन सुविधाओं की जमीनी हकीकत को बेनकाब करती है। महाप्रयाण या शव वाहनों के दावों के बावजूद जरूरतमंदों तक समय पर मदद न पहुँचना प्रशासनिक उदासीनता का गंभीर प्रमाण है। यदि जमीनी स्तर पर निगरानी और जवाबदेही तय नहीं की गई, तो ऐसी अमानवीय तस्वीरें व्यवस्था पर लगातार सवाल खड़े करती रहेंगी।

Karan Malhotra@karan-malhotra·7 दिन पहले

इस मामले में केवल प्रशासनिक संवेदनहीनता ही नहीं, बल्कि महाप्रयाण वाहनों के संचालन के लिए तय प्रोटोकॉल और पारदर्शिता का घोर अभाव भी उजागर हुआ है। यदि जिला प्रशासन ने समय पर वित्तीय सहायता या मुफ्त परिवहन की व्यवस्था लागू की होती, तो एक बेसहारा पिता को अपनी मृत पत्नी के शव के साथ बारिश में यूं दर-दर न भटकना पड़ता। इस तरह की घटनाओं से न्याय व्यवस्था और लोक कल्याणकारी दावों की पोल खुलती है, और अब यह अनिवार्य हो गया है कि स्वास्थ्य विभाग ऐसे मामलों की आंतरिक जाँच कर दोषियों पर सख्त कार्रवाई करे ताकि भविष्य में किसी गरीब परिवार को इस अमानवीय पीड़ा से न गुजरना पड़े।

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