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झारखंड में 12 साल चला 20 एकड़ का झगड़ा और 13 मुकदमों का बोझ, अधिकारी की मध्यस्थता से भाइयों ने गले मिलकर खत्म की तकरारझारखंड
19 सित॰ 2026, 4:08 pm (6 दिन पहले)· 2

झारखंड में 12 साल चला 20 एकड़ का झगड़ा और 13 मुकदमों का बोझ, अधिकारी की मध्यस्थता से भाइयों ने गले मिलकर खत्म की तकरार

रांची के बरडीहा में 20 एकड़ जमीन पर चार भाइयों के बीच 12 साल से चल रहे विवाद और 13 मुकदमों को एसडीएम प्रवीण सिंह ने पंचायत व बातचीत के जरिए शांतिपूर्ण ढंग से सुलझा दिया।

पारिवारिक भूखंडों के झगड़े जब अदालतों और पुलिस स्टेशनों की दहलीज लांघते हैं, तो पीढ़ियों की कमाई तारीखों और वकीलों की भेंट चढ़ जाती है। झारखंड अंतर्गत रांची के बरडीहा क्षेत्र से एक ऐसा उदाहरण सामने आया है जिसने पारंपरिक मुकदमेबाजी के ढर्रे को बदलकर रख दिया। वहां चार सगे भाइयों के बीच बीस एकड़ पैतृक भूमि के बंटवारे को लेकर पिछले बारह सालों से घमासान मचा हुआ था। यह तनातनी महज मौखिक कहासुनी तक सीमित नहीं रही, बल्कि दोनों पक्षों की तरफ से थाने में कुल मिलाकर तेरह प्राथमिकी तक दर्ज कराई जा चुकी थीं। सालों से अनुमंडल कार्यालय और दीवानी अदालत के चक्कर काट रहे इन सगे संबंधियों के बीच कड़वाहट इतनी बढ़ चुकी थी कि समझौते की कोई गुंजाइश नहीं दिखती थी।

इस पूरे गतिरोध को तोड़ने में अनुमंडल दंडाधिकारी प्रवीण सिंह की प्रशासनिक सूझबूझ ने निर्णायक भूमिका निभाई। उन्होंने विवादित जमीन को लेकर उलझे परिजनों को औपचारिक मुकदमों से हटाकर पारंपरिक पंचायती व्यवस्था और आमने-सामने संवाद के लिए राजी किया। इस अनूठी सुलह का एक दृश्य इंटरनेट पर भी तेजी से साझा किया जा रहा है, जिसमें कानूनी पचड़ों में वर्षों गंवाने वाले भाई एक साथ बैठकर भोजन करते और पुरानी रंजिश भूलकर एक-दूसरे को गले लगाते दिखाई दिए।

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पैतृक बीस एकड़ और बारह सालों का कानूनी उलझाव

बरडीहा का यह पारिवारिक संकट करीब बीस एकड़ जमीन के मालिकाना हक और सीमांकन से जुड़ा हुआ था। जो जायदाद अगली पीढ़ी की समृद्धि और पारिवारिक सुरक्षा का आधार बननी चाहिए थी, उसी के चलते सगे भाइयों के बीच गहरी खाई पैदा हो गई। बंटवारे की छोटी सी असहमति धीरे-धीरे उग्र विवाद में तब्दील हुई और नौबत मारपीट तथा कानूनी शिकायतों तक जा पहुंची।

बारह वर्षों के लंबे अंतराल में दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के खिलाफ तेरह अलग-अलग मामले थानों में दर्ज कराए। परिवार के सदस्य सालों तक कभी सिविल कोर्ट की तारीखों पर हाजिरी भरते रहे, तो कभी अनुमंडल कार्यालय की फाइलों के पीछे भागते रहे। समय और धन की भारी बर्बादी के बावजूद जमीन का वास्तविक निपटारा नहीं हो सका, उल्टे पारिवारिक रिश्तों की डोर लगातार कमजोर होती चली गई।

पंचायत की चौपाल और संवाद से निकला स्थायी हल

अदालती कार्यवाहियों के जरिए वर्षों से खिंच रहे इस मसले को सुलझाने के लिए एसडीएम प्रवीण सिंह ने एक सर्वथा अलग रास्ता चुना। उन्होंने समझाइश दी कि कागजी आदेशों से जमीन तो बंट सकती है, लेकिन दिलों में पड़ी दरार कभी नहीं भरती। इसी सोच के तहत उन्होंने परिजनों और गांव के अनुभवी पंचों को एक मंच पर आमंत्रित किया।

प्रवीण सिंह ने इस पहल का ब्योरा अपने फेसबुक पेज पर साझा किया। उन्होंने वीडियो के माध्यम से रेखांकित किया कि कैसे अनगिनत कानूनी पेशियों के मुकाबले आमने-सामने बैठकर की गई बातचीत कहीं अधिक असरदार साबित हुई। पंचायत की मौजूदगी में चारों भाइयों ने खुले मन से अपनी समस्याएं रखीं और आपसी रजामंदी से जमीन के न्यायसंगत बंटवारे का खाका तैयार कर लिया गया।

गिले-शिकवे भुलाकर भाइयों ने किया सामूहिक भोज

इस समझौते का सबसे भावुक पहलू बातचीत संपन्न होने के तुरंत बाद देखने को मिला। बारह सालों तक एक-दूसरे के धुर विरोधी बने खड़े चारों सगे भाइयों ने पुरानी कटुता को पूरी तरह भुला दिया। समझौते की सहमति बनते ही भाइयों ने एक-दूसरे को आलिंगनबद्ध किया और गिले-शिकवे आंसुओं में बह गए।

इसके पश्चात सभी परिजनों ने एक साथ बैठकर भोजन किया और सालों पुरानी दुश्मनी को सदा के लिए विदा कर दिया। जिस बीस एकड़ भूभाग ने एक ही खून के रिश्तों को अदालत की सीढ़ियों पर ला खड़ा किया था, वहां आखिरकार संवाद और सौहार्द की जीत दर्ज हुई।

प्रशासनिक और कानूनी सीमाओं पर अधिकारी का दृष्टिकोण

इस ऐतिहासिक सुलह के बाद एसडीएम प्रवीण सिंह ने समाज और व्यवस्था के नाम एक आवश्यक संदेश भी दिया। उनका स्पष्ट मत था कि घरेलू और पारिवारिक तकरार का मुकम्मल हल केवल थानों की डायरी या अदालतों के आदेशों में नहीं तलाशा जा सकता।

प्रवीण सिंह के अनुसार, यदि ग्रामीण अंचलों में भू-विवादों को स्थानीय स्तर पर पंचायती सूझबूझ और भाईचारे से सुलझा लिया जाए, तो आम नागरिकों को कचहरी की लंबी दौड़ और आर्थिक तबाही से सहज ही बचाया जा सकता है। पुलिस, कानून और प्रशासनिक तंत्र हर पारिवारिक मनमुटाव को जबरन खत्म नहीं कर सकते; स्थायी समाधान तभी संभव है जब संबंधित पक्ष स्वयं मेज पर बैठकर संवाद का रास्ता अपनाएं।

सोशल मीडिया पर नागरिकों की प्रतिक्रिया

अधिकारी द्वारा साझा किए गए दृश्य सार्वजनिक होने के बाद डिजिटल माध्यमों पर जनता ने इस मानवीय पहल की मुक्तकंठ से सराहना की। लाल पप्पू नाथ शहदेव नामक एक उपभोक्ता ने टिप्पणी करते हुए कहा कि उनके परिवार में भी पांच भाइयों के बीच बारह साल से जमीन का विवाद चला आ रहा है, जिसमें उन्होंने अधिकारी से ऐसी ही मध्यस्थता की गुहार लगाई।

वहीं दिनेश ठाकुर ने अपने विचार साझा करते हुए लिखा कि प्रवीण सर बरडीहा प्रखंड में बेहद उत्कृष्ट कार्य कर रहे हैं और ऐसे समर्पित अधिकारी का मिलना क्षेत्र के लिए सौभाग्य है। एक अन्य टिप्पणीकार जितेंद्र यादव ने व्यावहारिक सुझाव देते हुए कहा कि यदि लोगों को अपनी गाढ़ी कमाई और अनमोल वक्त बचाना है, तो उन्हें कचहरी भागने के बजाय ग्राम पंचों के परामर्श पर अमल करना चाहिए। विभिन्न नागरिकों ने यह भी जोड़ा कि अन्य प्रशासनिक पदाधिकारियों को भी इस संवेदनशील मॉडल से सीख लेकर जनसमस्याओं का निवारण करना चाहिए।

सवाल-जवाब

यह पूरा मामला झारखंड के किस क्षेत्र से जुड़ा है?
यह मामला झारखंड के रांची जिले में स्थित बरडीहा प्रखंड से जुड़ा हुआ है।
भाइयों के बीच विवाद कितने समय से और कितनी जमीन को लेकर चल रहा था?
चार भाइयों के बीच यह विवाद बीस एकड़ पैतृक जमीन के बंटवारे को लेकर पिछले करीब बारह वर्षों से चल रहा था।
इस पारिवारिक विवाद के दौरान पुलिस में कितने मामले दर्ज हुए थे?
बारह सालों की इस कानूनी लड़ाई के दौरान दोनों पक्षों की तरफ से कुल तेरह प्राथमिकी दर्ज कराई गई थीं।
इस विवाद को सुलझाने में किस प्रशासनिक अधिकारी ने मुख्य भूमिका निभाई?
इस पूरे मामले को आपसी सहमति और पंचायती पहल से सुलझाने में एसडीएम प्रवीण सिंह ने मुख्य भूमिका निभाई।
एसडीएम ने पारिवारिक विवादों के समाधान के लिए क्या सलाह दी?
एसडीएम प्रवीण सिंह ने कहा कि हर पारिवारिक विवाद का हल अदालत और थाने में नहीं होता, बल्कि आपसी बातचीत और गांव के पंचों के जरिए इनका बेहतर समाधान निकाला जा सकता है।
समझौते के बाद भाइयों ने अपनी सुलह को किस तरह प्रदर्शित किया?
समझौता संपन्न होने के बाद चारों भाइयों ने गिले-शिकवे भुलाकर एक-दूसरे को गले लगाया और साथ बैठकर भोजन किया।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Dr. Aditya Sharma@aditya-sharma·5 दिन पहले

ज्योतिषीय और वास्तु सिद्धांतों के अनुसार, भूमि (भूमि और संपत्ति) चतुर्थ भाव से जुड़ी होती है, जो मानसिक शांति और पारिवारिक सौहार्द का प्रतीक है। जब पैतृक संपत्ति को लेकर कलह बढ़ती है, तो यह केवल कानूनी उलझन नहीं बनती, बल्कि परिवार के सामूहिक ऊर्जा क्षेत्र और भावी पीढ़ियों के कल्याण को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित करती है। इस मामले में प्रशासनिक मध्यस्थता और पारंपरिक संवाद ने अदालती मुकदमों के उस दुष्चक्र को तोड़ा है, जो ग्रहों की प्रतिकूल दशाओं के समान परिवार को क्षीण कर रहा था।

Arjun Mehta@arjun-mehta·5 दिन पहले

यह मामला प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा वैकल्पिक विवाद समाधान और सामुदायिक मध्यस्थता को बढ़ावा देने की आवश्यकता को रेखांकित करता है। जब स्थानीय प्रशासन अदालती बोझ को कम करने के लिए इस तरह की पहल करता है, तो इससे न केवल पुलिस और न्यायपालिका के संसाधनों की बचत होती है, बल्कि समाज में सामाजिक सौहार्द भी मजबूत होता है। भविष्य में नीतिगत स्तर पर ऐसे प्रशासनिक मॉडलों को संस्थागत रूप देने की जरूरत है ताकि छोटे पारिवारिक विवाद अदालतों की लंबी प्रक्रिया में फंसने के बजाय समय पर सुलझ सकें।

Ravikash Gupta@ravikash·5 दिन पहले

अधिवक्ता शुल्क और अदालती खर्चों पर बर्बाद होने वाली पूंजी अगर इस तरह स्थानीय प्रशासनिक मध्यस्थता से बचे, तो यह सीधे तौर पर पारिवारिक अर्थव्यवस्था और ग्रामीण निवेश को बढ़ावा देती है। झारखंड के बरडीहा का यह प्रकरण बताता है कि वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) और जन-संवाद किस प्रकार जमीनी स्तर पर आर्थिक संसाधनों के अपव्यय को रोक सकते हैं। यदि जिला प्रशासन ऐसे सामुदायिक मध्यस्थता मंचों को नियमित रूप से स्थापित करे, तो यह अनगिनत परिवारों को आर्थिक तबाही से बचाते हुए संपत्तियों को त्वरित रूप से उत्पादन और निवेश चक्र में वापस ला सकता है।

Rohan Verma@rohan-verma·5 दिन पहले

यह मामला प्रशासनिक अधिकारियों के लिए एक बड़ा सबक है कि मुकदमेबाजी की जगह संवाद और स्थानीय मध्यस्थता से दशकों पुराने पारिवारिक और भूमि विवादों को काफी कम समय और बिना धन की बर्बादी के सुलझाया जा सकता है। झारखंड के बरडीहा जैसी ऐसी अनूठी पहल यदि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में भी प्रशासनिक स्तर पर अपनाई जाएं, तो तहसीलों और अदालतों में लंबित मामलों का बोझ काफ़ी हद तक कम हो सकता है और सामाजिक सौहार्द भी बचेगा।

Karan Malhotra@karan-malhotra·5 दिन पहले

बरडीहा का यह मामला भारतीय न्याय व्यवस्था के उस गंभीर संकट को उजागर करता है जहाँ छोटे भूमि विवाद आपराधिक मुकदमों में बदलकर थानों और अदालतों का बोझ बढ़ाते हैं। जब अधिकारी कानूनी दायरे से आगे बढ़कर सामुदायिक संवाद का मार्ग चुनते हैं, तो न केवल मुकदमों की संख्या घटती है बल्कि पुलिस और अदालतों का समय भी बचता है। इस तरह की मध्यस्थता से यह साबित होता है कि पारंपरिक मुकदमों के मुकाबले आपसी मेल-मिलाप सामाजिक और पारिवारिक ताने-बाने को टूटने से बचाने में कहीं अधिक प्रभावी है।

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