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झारखंड में परीक्षाओं के रद्द होने से नया बवंडर, नौकरी कर रहे अभ्यर्थियों के भविष्य पर मंडराया संकटभारत
19 अग॰ 2026, 1:15 pm (2 घंटे पहले)· 2

झारखंड में परीक्षाओं के रद्द होने से नया बवंडर, नौकरी कर रहे अभ्यर्थियों के भविष्य पर मंडराया संकट

छात्रों के प्रदर्शन के बाद झारखंड सरकार ने जेएसएससी-सीजीएल समेत कई परीक्षाएं रद्द कर दी हैं, लेकिन इस फैसले ने पहले से नौकरी कर रहे सैकड़ों निर्दोष कर्मचारियों के सामने गंभीर आजीविका संकट खड़ा कर दिया है।

झारखंड में बीते 26 दिनों से लगातार जारी छात्र आंदोलन के भारी दबाव के बाद राज्य सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। सोमवार, 17 अगस्त को राज्य प्रशासन ने झारखंड सामान्य स्नातक योग्यताधारी संयुक्त प्रतियोगिता परीक्षा (जेएसएससी-सीजीएल) के साथ-साथ टीडीपीएल द्वारा आयोजित विभिन्न भर्ती परीक्षाओं को रद्द करने का औपचारिक फैसला सुना दिया। इसके साथ ही मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली सरकार ने वर्ष 2014 से लेकर अब तक झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (जेएसएससी) के माध्यम से हुई तमाम परीक्षाओं एवं नियुक्तियों की विस्तृत जांच कराने के निर्देश दिए हैं। प्रक्रियागत सुधारों का सुझाव देने के लिए एक उच्चस्तरीय समीक्षा समिति के गठन का भी ऐलान किया गया है। सरकारी आदेश से उन परीक्षार्थियों को फौरी राहत मिली है जो लंबे समय से पेपर लीक और धांधली के आरोप लगाते हुए परीक्षाओं को निरस्त करने की मांग पर अड़े थे। हालांकि, इस प्रशासनिक निर्णय ने राज्य में एक नया और अत्यधिक जटिल संकट उत्पन्न कर दिया है, जिससे हजारों परिवार अनिश्चितता के भंवर में फंस गए हैं।

सरकारी फैसले की घोषणा होते ही राज्य के प्रशासनिक और सामाजिक गलियारों में यह सवाल तेजी से गूंजने लगा है कि क्या धांधली के आरोपियों पर सीधी कार्रवाई करने के बजाय पूरी परीक्षा प्रक्रिया को निरस्त कर देना उचित न्याय है। जो अभ्यर्थी अपनी योग्यता के बल पर चयनित होकर विभिन्न सरकारी विभागों में पदस्थापित हो चुके थे, उन्हें भी अब संदेह के दायरे में ला खड़ा किया गया है। जानकारों का मानना है कि सड़क पर उतरकर विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों को शांत करने के लिए जल्दबाजी में उठाया गया यह कदम राज्य सरकार के लिए एक दूसरी बड़ी चुनौती बन गया है। जिन युवाओं ने पारदर्शी प्रक्रिया के तहत सफलता प्राप्त कर अपने करियर की शुरुआत की थी, वे अब इस फैसले के दूरगामी और विनाशकारी परिणामों से जूझने को मजबूर हैं।

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नौकरी कर रहे कर्मचारियों में गहरा आक्रोश और प्रोजेक्ट भवन का प्रदर्शन

प्रशासनिक फैसले के विरोध में राज्य के विभिन्न जिलों से आए नवनियुक्त कर्मचारी मंगलवार को तेज बारिश और खराब मौसम की परवाह किए बिना राजधानी रांची स्थित प्रोजेक्ट भवन के बाहर एकत्र हुए। अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए प्रदर्शनकारी कर्मियों ने सवाल उठाया कि बिना किसी ठोस प्रमाण के उनके भविष्य को अंधकार में क्यों धकेला जा रहा है। एक प्रदर्शनकारी कर्मचारी ने कानून और न्यायशास्त्र के मौलिक सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि भले ही सौ दोषी छूट जाएं, लेकिन किसी एक भी निर्दोष व्यक्ति को सजा नहीं मिलनी चाहिए। कर्मचारियों का स्पष्ट आरोप है कि सरकार ने आंदोलनकारी छात्रों के एक पक्षीय दबाव को तो सुन लिया, लेकिन उन अभ्यर्थियों के पक्ष को पूरी तरह अनदेखा कर दिया जिन्होंने वर्षों तक कठोर परिश्रम करके परीक्षा उत्तीर्ण की थी।

कर्मचारियों का कहना है कि उन्होंने इसी नौकरी के आधार पर अपने जीवन के तमाम महत्वपूर्ण फैसले लिए थे। कई अभ्यर्थियों ने इस पद को स्वीकार करने के लिए अपनी पुरानी नौकरियां छोड़ दी थीं, जबकि कई अन्य अपने परिवारों के एकमात्र वित्तीय सहारे बने हुए थे। कुछ लोगों ने बैंक से कर्ज ले रखा है और कई लोगों का विवाह इस रोजगार के भरोसे तय हुआ था। अब एकाएक पूरी परीक्षा को रद्द घोषित कर दिए जाने से उनके सामने जीवन यापन का संकट पैदा हो गया है। प्रोजेक्ट भवन के समक्ष खड़े कर्मियों ने साफ शब्दों में कहा कि प्रशासनिक स्तर पर हुई नाकामियों का खामियाजा निष्पक्ष तरीके से चयनित अभ्यर्थियों को भुगतने के लिए विवश नहीं किया जाना चाहिए।

निर्दोष बनाम दोषी: न्यायशास्त्र के सिद्धांतों पर उठे गंभीर सवाल

प्रदर्शन में शामिल विभिन्न पदों पर कार्यरत कर्मियों ने सरकार के समक्ष बेहद चुभते हुए कानूनी और प्रशासनिक प्रश्न रखे हैं। खूंटी जिले में लेबर एनफोर्समेंट ऑफिसर के पद पर कार्यरत एक कर्मचारी ने सरकार से सीधा सवाल किया कि यदि किसी परीक्षा में भाग लेने वाले सौ लोगों में से पांच व्यक्तियों ने अनुचित साधनों का प्रयोग किया है, तो बाकी पचानवे निष्ठावान अभ्यर्थियों को किस अपराध का दंड दिया जा रहा है। उनका कहना था कि यदि जांच में उनके व्यक्तिगत चयन में कोई गड़बड़ी पाई जाती है तो उन्हें तत्काल प्रभाव से पदमुक्त कर दिया जाए, लेकिन बिना किसी व्यक्तिगत दोष साबित हुए सामूहिक रूप से सजा देना पूरी तरह से अन्यायपूर्ण है।

इसी प्रकार सहायक अनुभाग अधिकारी (एएसओ) के पद पर सेवा दे रहे एक अन्य कर्मचारी ने प्रशासनिक प्रक्रिया की विसंगतियों को उजागर किया। उन्होंने बताया कि उनकी नियुक्ति प्रक्रिया उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के विस्तृत आदेशों के तहत पूरी हुई थी। सर्वोच्च न्यायालय की हरी झंडी और 141 पृष्ठों के विस्तृत न्यायिक निर्णय के आधार पर ही उन्हें नियुक्ति पत्र प्रदान किया गया था। ऐसी स्थिति में जब सर्वोच्च अदालत के आदेश से किसी की बहाली हुई हो, तब सरकार द्वारा पूरी चयन प्रक्रिया को अचानक अवैध घोषित कर देना न्यायपालिका के फैसलों पर भी सवाल खड़े करता है। कर्मचारियों का तर्क है कि सरकार को जांच के जरिए व्यक्तिगत दोषियों की पहचान कर उन पर कठोर कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए थी, न कि पूरी प्रक्रिया को खारिज करके सभी चयनितों को संदिग्ध करार देना चाहिए था।

सरकार की प्रशासनिक और नैतिक जवाबदेही का सवाल

प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरे मामले में राज्य सरकार के पास कर्मचारियों के तर्कों का कोई स्पष्ट उत्तर नहीं है। अब सरकार को सार्वभौमिक रूप से यह स्पष्ट करना होगा कि क्या पूरी भर्ती प्रणाली ही भ्रष्ट हो चुकी थी अथवा केवल कुछ विशिष्ट सेंटरों या व्यक्तियों के स्तर पर अनियमितताएं हुई थीं। यदि सरकार के पास यह पुख्ता प्रमाण हैं कि समूची जेएसएससी-सीजीएल परीक्षा प्रणाली भीतर से दूषित थी, तो उसे सार्वजनिक रूप से उन साक्ष्यों को उजागर करना चाहिए। सरकार को यह बताना होगा कि किस प्रशासनिक स्तर पर चूक हुई, किस परीक्षा एजेंसी की भूमिका संदिग्ध पाई गई और कुल कितने अभ्यर्थियों ने धोखाधड़ी के जरिए अंक प्राप्त किए।

यदि सरकार यह साबित करने में असमर्थ रहती है कि प्रत्येक चयनित अभ्यर्थी की सफलता में धांधली का योगदान था, तो पूरी परीक्षा और उससे जुड़ी नियुक्तियों को निरस्त करने का नैतिक और कानूनी आधार स्वतः कमजोर पड़ जाता है। स्वतंत्र विश्लेषकों के अनुसार, विस्तृत निष्पक्ष जांच पूरी होने से पूर्व ही पूरी परीक्षा को रद्द कर देने का फैसला यह संकेत देता है कि सरकार प्रशासनिक जवाबदेही से बचने और तत्काल आंदोलन को दबाने की कोशिश कर रही थी। पहले जांच करके दोषियों और निर्दोषों को पृथक किया जाना चाहिए था, और उसके बाद ही नियुक्तियों पर कोई अंतिम निर्णय लिया जाना उचित होता।

आंदोलन की नई मांगें और सीबीआई जांच का पेच

दूसरी तरफ, सरकार के इस फैसले के बावजूद छात्र आंदोलन पूरी तरह शांत होता दिखाई नहीं दे रहा है। छात्र नेता रवींद्र पासवान ने सरकार द्वारा जारी नई अधिसूचना पर सवाल उठाते हुए कहा है कि केवल परीक्षा रद्द कर देने से अभ्यर्थियों का विश्वास बहाल नहीं होगा। छात्र संगठन अभी भी अपनी इस मांग पर अड़े हुए हैं कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच उच्च न्यायालय के किसी वर्तमान न्यायाधीश की अध्यक्षता में कराई जाए अथवा इसे केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपा जाए। इसके अलावा, परीक्षार्थी अन्य संदिग्ध परीक्षाओं को भी रद्द करने और भर्ती कैलेंडर में व्यापक सुधार की मांग कर रहे हैं।

इस स्थिति से स्पष्ट होता है कि राज्य सरकार ने जिस विवाद को समाप्त करने के लिए इतना बड़ा फैसला लिया, वह विवाद सुलझने के बजाय और अधिक गहरा गया है। एक तरफ जहां आंदोलनकारी छात्र सरकार की मंशा पर संदेह जताते हुए उच्चस्तरीय न्यायिक जांच की मांग पर कायम हैं, वहीं दूसरी तरफ नौकरी गंवाने के मुहाने पर खड़े नवनियुक्त कर्मचारी अपने अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनी और सामाजिक लड़ाई लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। आने वाले दिनों में यह मुद्दा झारखंड की राजनीति और न्याय व्यवस्था के लिए एक अत्यंत संवेदनशील और विचारणीय विषय बना रहेगा।

सवाल-जवाब

झारखंड सरकार ने 17 अगस्त को क्या फैसला लिया?
सरकार ने 26 दिनों से जारी छात्र आंदोलन के दबाव में जेएसएससी-सीजीएल और टीडीपीएल द्वारा आयोजित भर्ती परीक्षाओं को रद्द कर दिया तथा वर्ष 2014 से हुई परीक्षाओं की जांच के लिए उच्चस्तरीय समिति गठित करने का ऐलान किया।
परीक्षा रद्द होने से नवनियुक्त कर्मचारियों पर क्या प्रभाव पड़ा है?
सफल होकर विभिन्न सरकारी पदों पर काम कर रहे कर्मियों की नौकरियां अब खतरे में पड़ गई हैं और उन्हें भी संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है।
प्रोजेक्ट भवन के बाहर कर्मचारियों ने क्या विरोध जताया?
कर्मचारियों ने भारी बारिश के बीच प्रदर्शन करते हुए कहा कि 100 दोषियों के चक्कर में निर्दोषों को सजा देना अन्यायपूर्ण है और सरकार को निष्पक्ष जांच के बाद ही फैसला लेना चाहिए था।
आंदोलनकारी छात्रों की अब क्या मांगें हैं?
छात्र नेता रवींद्र पासवान और अभ्यर्थी अभी भी मामले की जांच उच्च न्यायालय के वर्तमान न्यायाधीश अथवा सीबीआई से कराने की मांग पर अड़े हुए हैं।
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