पश्चिम बंगाल में अन्नपूर्णा योजना की अगस्त किस्त का वितरण शुरू, जानें नए पात्रता नियम और किसे मिलेंगे 3,000 रुपयेविदेशी सरजमीं पर विराट कोहली का खौफनाक दबदबा, एबी डीविलियर्स का सचिन तेंदुलकर के साथ तुलनात्मक विश्लेषणरंगबिरंगे लंचबॉक्स के लिए झटपट तैयार करें पौष्टिक चुकंदर पराठा, जानें बनाने की पूरी विधिपूलीज X1 रिव्यू: क्या 110 डॉलर वाला यह वॉटर जेट पूल रोबोट वाकई काम का है?थिएटर में सुस्त प्रदर्शन के बाद डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उतरी 'श्रीनिवास मंगापुरम', प्राइम वीडियो पर देखें राशा थडानी और जया कृष्णा की फिल्ममौसम का नया दौर: 60 किमी की रफ्तार से चलेंगी हवाएं, दिल्ली से लेकर उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश तक भारी बारिश का अलर्टसर्वोच्च अदालत ने जंतर-मंतर प्रदर्शन घटना की जांच हेतु पूर्व न्यायाधीश आर. सुभाष रेड्डी की अध्यक्षता में बनाई 5 सदस्यीय समितिफिल्म विश्वनाथ एंड संस के सेट पर 103 डिग्री ज्वर में ममिता बैजू का डांस, भवानी श्री ने खोला राजकर्नाटक के बीदर में देशभक्ति के नारे लगाने पर विवाद, 15 अगस्त के बाद पुलिस ने कॉलेज प्रमुख पर दर्ज किया मुकदमासरकारी आवास में कैश कांड के बाद जस्टिस यशवंत वर्मा पर एफआईआर दर्ज करने की मांग ने पकड़ा जोर
बुजुर्गों के संरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: माता-पिता को प्रताड़ित करने वाले बच्चों को संपत्ति से बेदखल कर सकेगा ट्रिब्यूनलउत्तर प्रदेश
19 अग॰ 2026, 2:44 pm (1 दिन पहले)· 2

बुजुर्गों के संरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: माता-पिता को प्रताड़ित करने वाले बच्चों को संपत्ति से बेदखल कर सकेगा ट्रिब्यूनल

सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ नागरिक कानून के तहत ट्रिब्यूनल को प्रताड़ना देने वाले बच्चों को बुजुर्गों की संपत्ति से बेदखल करने का अधिकार दिया है। अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का पुराना फैसला रद्द करते हुए बुजुर्गों की गरिमा और सुरक्षा को सर्वोपरि माना।

देश में वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों, सुरक्षा और गरिमा को बनाए रखने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यदि किसी बुजुर्ग व्यक्ति के भरण-पोषण, संरक्षण और गरिमापूर्ण जीवन के लिए आवश्यक हो, तो कानून के तहत गठित ट्रिब्यूनल उस बुजुर्ग की संपत्ति से बेटे या बहू को बाहर निकालने यानी बेदखल करने का सख्त आदेश जारी कर सकता है। अदालत के इस निर्णय से उन बुजुर्ग माता-पिता को बड़ी कानूनी राहत मिलेगी जो अपनी ही संपत्ति में बच्चों या परिजनों की उपेक्षा और प्रताड़ना झेलने को मजबूर होते हैं।

हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने बताया त्रुटिपूर्ण

जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को पूरी तरह निरस्त कर दिया, जिसमें ट्रिब्यूनल द्वारा जारी बेदखली के आदेश को रद्द कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा और उनके सम्मानजनक जीवन को सुनिश्चित करना ही माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम 2007 की मुख्य आत्मा है। शीर्ष अदालत ने कहा कि ट्रिब्यूनल के पास बेदखली का आदेश देने का पूरा अधिकार है, बशर्ते यह कदम वरिष्ठ नागरिक के हितों की रक्षा के लिए अनिवार्य हो।

ये भी पढ़ें

लखनऊ के विकास नगर का मामला और पारिवारिक विवाद

यह पूरा कानूनी विवाद उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के विकास नगर स्थित एक आवासीय मकान से शुरू हुआ था। इस मकान के वास्तविक मालिक रवि कांत गुप्ता हैं। उन्होंने अपने ही बेटे के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग करते हुए प्रशासन का दरवाजा खटखटाया था। रवि कांत गुप्ता का आरोप था कि उनके बेटे ने उनकी 81 वर्षीय वृद्ध मां यानी अपनी सगी दादी को घर में रहने की इजाजत नहीं दी। बेटे के दुर्व्यवहार के कारण वृद्ध महिला को घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा और अंततः उन्हें वृद्धाश्रम में शरण लेनी पड़ी। इस स्थिति से व्यथित होकर रवि कांत गुप्ता ने 5 जून 2022 को जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन प्रस्तुत किया और 2007 के कानून के तहत अपने बेटे को मकान से बाहर निकालने की मांग की।

एसडीएम और जिला मजिस्ट्रेट की प्रशासनिक कार्रवाई

मामले की जांच और सुनवाई के बाद नवंबर 2022 में उप उप-जिलाधिकारी (एसडीएम) ने यह निष्कर्ष निकाला कि संबंधित मकान रवि कांत गुप्ता की अपनी कमाई से अर्जित यानी स्व-अर्जित संपत्ति है। प्रशासनिक आदेश में इस तथ्य को दर्ज किया गया कि बेटे ने अपनी 81 साल की बुजुर्ग दादी को घर में रहने नहीं दिया था। इसके आधार पर जिला मजिस्ट्रेट ने बेटे को संपत्ति से बेदखल करने का निर्देश जारी किया। बाद में 9 अगस्त 2023 को जिला मजिस्ट्रेट ने इस बेदखली के आदेश को बरकरार रखते हुए बेटे और उसकी पत्नी को तुरंत मकान का कब्जा रवि कांत गुप्ता को सौंपने का हुक्म दिया।

हाईकोर्ट की रोक और सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय

जिला प्रशासन के इस आदेश के खिलाफ बेटे और उसकी पत्नी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की। हाईकोर्ट ने पूर्व के न्यायिक दृष्टांतों का हवाला देते हुए कहा था कि वरिष्ठ नागरिक कानून के तहत अधिकारियों को किसी व्यक्ति को संपत्ति से बेदखल करने का अधिकार प्राप्त नहीं है। हाईकोर्ट ने एसडीएम और जिला मजिस्ट्रेट दोनों के बेदखली आदेशों को रद्द कर दिया था। इसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के तर्क को खारिज करते हुए कहा कि कानून की ऐसी सीमित व्याख्या से बुजुर्गों के संरक्षण का मूल उद्देश्य ही निष्फल हो जाएगा।

अनुच्छेद 21 और 41 का उल्लेख तथा सामाजिक दायित्व

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में समाज और न्यायपालिका की भूमिका पर गंभीर टिप्पणियां कीं। पीठ ने कहा कि किसी भी सभ्य समाज की वास्तविक पहचान इस बात से होती है कि वह अपने बुजुर्ग नागरिकों को कितना सम्मान, सुरक्षा और गरिमा प्रदान करता है। अदालत ने रेखांकित किया कि ढलती उम्र का अर्थ उपेक्षा, अपमान या असुरक्षा का जीवन जीना बिल्कुल नहीं होना चाहिए। संसद द्वारा 2007 में बनाए गए कानून का उद्देश्य बुजुर्गों को त्वरित न्याय और सहायता पहुंचाना है। अपने निर्णय में अदालत ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 41 का विशेष उल्लेख किया। अदालत के अनुसार, ये संवैधानिक प्रावधान एक ऐसे कल्याणकारी समाज की परिकल्पना करते हैं जहां कमजोर वर्गों की रक्षा की जाए और हर व्यक्ति को गरिमा के साथ जीवन जीने का मौलिक अधिकार मिले।

सवाल-जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने सीनियर सिटीजन एक्ट 2007 पर क्या बड़ा फैसला दिया है?
सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि यदि बुजुर्गों के भरण-पोषण और सम्मान के लिए जरूरी हो, तो ट्रिब्यूनल बच्चों या परिजनों को बुजुर्ग की संपत्ति से बेदखल करने का आदेश दे सकता है।
लखनऊ के इस विवाद में मुख्य मामला क्या था?
विकास नगर लखनऊ के मकान मालिक रवि कांत गुप्ता ने अपने बेटे के खिलाफ याचिका दी थी, क्योंकि बेटे ने अपनी 81 वर्षीय दादी को घर में नहीं रहने दिया और उन्हें वृद्धाश्रम जाना पड़ा।
सुप्रीम कोर्ट की किस पीठ ने यह निर्णय सुनाया?
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के पुराने फैसले को रद्द करते हुए यह निर्णय दिया।
अदालत ने फैसले में संविधान के किन अनुच्छेदों का उल्लेख किया?
अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 41 का उल्लेख करते हुए बुजुर्गों के गरिमापूर्ण जीवन और सामाजिक सुरक्षा के अधिकार पर बल दिया।
जिला प्रशासन ने इस मामले में क्या आदेश दिया था?
एसडीएम और जिला मजिस्ट्रेट ने मकान को स्व-अर्जित मानते हुए 9 अगस्त 2023 तक बेटे और बहू को घर खाली कर रवि कांत गुप्ता को कब्जा सौंपने का आदेश दिया था।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 दिन पहले

यह फैसला क्रिमिनल जस्टिस और सिविल लॉ के उस नाजुक दायरे को स्पष्ट करता है जहाँ पारिवारिक कलह और बुजुर्गों का उत्पीड़न गंभीर सामाजिक अपराध बन जाता है। इस कानूनी प्रावधान से उन बुजुर्गों को सीधी ताकत मिलेगी जो थानों और अदालतों के चक्कर काटने में असमर्थ हैं। भविष्य में ऐसे मामलों के त्वरित निस्तारण से जिला प्रशासन और ट्रिब्यूनल की भूमिका न्याय व्यवस्था में और अधिक प्रभावी होगी।

Rohan Verma@rohan-verma·1 दिन पहले

उत्तर प्रदेश के संदर्भ में यह निर्णय सामाजिक ताने-बाने और जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गहरा असर डालेगा। लखनऊ के विकास नगर जैसे मामलों से साफ है कि राज्य के शहरी और अर्ध-शहरी इलाकों में संपत्ति विवादों की आड़ में बुजुर्गों की अनदेखी एक गंभीर प्रवृत्ति बन चुकी है। अब चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि ट्रिब्यूनल के पास बेदखली का सीधा अधिकार है, तो उम्मीद की जानी चाहिए कि उत्तर प्रदेश के सभी जिलों में उप-जिलाधिकारियों के स्तर पर लंबित ऐसे मामलों का निस्तारण तेज होगा। इससे थानों के चक्कर काट रहे बेबस बुजुर्गों को त्वरित राहत मिलना तय है।

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR