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झुंझुनूं के भालोठ गांव ने सेना को दिए 700 जवान, अध्यापकों की भी लंबी फेहरिस्तराजस्थान
5 जुल॰ 2026, 8:32 pm (36 दिन पहले)· 2

झुंझुनूं के भालोठ गांव ने सेना को दिए 700 जवान, अध्यापकों की भी लंबी फेहरिस्त

राजस्थान के झुंझुनूं जिले का भालोठ गांव अब तक भारतीय सेना को 700 से ज्यादा जवान और करीब 500 शिक्षक दे चुका है, साथ ही यह अपने सैकड़ों साल पुराने मंदिरों और गहरी आस्था के लिए भी जाना जाता है।

राजस्थान के झुंझुनूं जिले में बसा भालोठ गांव इन दिनों अपनी दोहरी उपलब्धि के चलते चर्चा में है। इस छोटे से गांव ने भारतीय सेना को अब तक 700 से ज्यादा जवान दिए हैं और साथ ही करीब 500 लोग यहां से निकलकर शिक्षक बने हैं। देश की रक्षा और शिक्षा, दोनों मोर्चों पर भालोठ का योगदान इसे राजस्थान के बाकी गांवों से अलग खड़ा करता है। जिले में लोग अक्सर भालोठ को इस बात की मिसाल के तौर पर पेश करते हैं कि एक ही गांव एक साथ दो मोर्चों पर देश की सेवा कर सकता है।

नाम के पीछे की कहानी

प्रशासक संतोष देवी बताती हैं कि भालोठ की नींव सदियों पहले पड़ी थी। दिल्ली के तत्कालीन बादशाह गयासुद्दीन ने इस इलाके में 52 हजार बीघा जमीन दान में दी थी। इसी जमीन पर भाल नाम के एक व्यक्ति ने बस्ती बसाई और आगे चलकर उन्हीं के नाम पर इस गांव का नाम भालोठ पड़ गया। दिल्ली सल्तनत के उस दौर में मिला यह भूमि दान ही एक वजह है कि गांव वाले भालोठ की जड़ों को आसपास के गांवों से कहीं ज्यादा पुराना मानते हैं। गांव के लोग आज भी इस इतिहास को बड़े फख्र से याद करते हैं और इसे अपनी विरासत मानते हैं।

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शिक्षा की मजबूत नींव

आजादी मिलने के बाद साल 1948 में भालोठ को पंचायत का दर्जा दिया गया। इसके चार साल बाद यानी 1952 में गांव में पहला विद्यालय खुला, जिसमें शुरुआत में पांचवीं कक्षा तक पढ़ाई होती थी। 1958 में इसी विद्यालय को दसवीं कक्षा तक कर दिया गया। इतनी जल्दी स्कूल खुल जाने से गांव के परिवारों में अपने बच्चों को लगातार पढ़ाई से जोड़े रखने का भरोसा बना, और इसी आदत का नतीजा है कि आज भी यहां से शिक्षकों की एक लंबी कतार निकल रही है, जो राजस्थान के अलग अलग हिस्सों में स्कूलों में पढ़ा रहे हैं।

फौज में सेवा की परंपरा

शिक्षा के साथ साथ भालोठ के युवाओं का रुझान देश सेवा की ओर भी उतना ही रहा है। गांव के करीब 700 जवान भारतीय सेना और अलग अलग सुरक्षा बलों में सेवाएं दे चुके हैं या अभी भी सीमा पर तैनात हैं। यही वजह है कि भालोठ को इलाके में सैनिकों और शिक्षकों की धरती कहकर सम्मान दिया जाता है। पीढ़ी दर पीढ़ी यहां के नौजवान सेना में भर्ती होने का सपना देखते आए हैं। देश सेवा का यह जज्बा पीढ़ियों से बना हुआ है, और यही वजह है कि इलाके में भालोठ के लोगों को खास सम्मान की नजर से देखा जाता है।

मंदिरों से जुड़ी गहरी आस्था

भालोठ सिर्फ सैनिकों और शिक्षकों के लिए ही नहीं बल्कि अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत के लिए भी जाना जाता है। गांव में संवत 1308 में गुड़गांव वाली माता का मंदिर बनवाया गया था, जिससे जुड़ी आस्था आज भी उतनी ही गहरी है। मान्यता है कि होली के दिन इस मंदिर में स्नान करने वाली महिलाओं की संतान प्राप्ति की मनोकामना पूरी होती है, और इसी वजह से दूर दूर से महिलाएं यहां मन्नत लेकर पहुंचती हैं। खासकर नवरात्रि के दिनों में गांव के बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं की तादाद कई गुना बढ़ जाती है, जिससे यह मंदिर उन दिनों इलाके के सबसे व्यस्त धार्मिक स्थलों में शुमार हो जाता है।

इसके अलावा खेतड़ी के तत्कालीन राजा ने गांव में ठाकुरजी का एक भव्य मंदिर बनवाया था। सैकड़ों साल पुरानी इस मंदिर की वास्तुशैली और इसमें रखी अष्टधातु की मूर्तियां आज भी लोगों को आकर्षित करती हैं। अष्टधातु से बनी इन मूर्तियों को शिल्प कला की दृष्टि से भी बेहद कीमती माना जाता है, और सैकड़ों साल से इस मंदिर का रखरखाव खुद में गांव की सांस्कृतिक निरंतरता का प्रतीक है। कृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर यहां ठाकुरजी का खास श्रृंगार किया जाता है और विशेष आयोजन रखे जाते हैं, जिसके चलते दूर दराज से श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। साल 2000 में गांव वालों ने आपसी सहयोग से जोहड़ वाले भोले बाबा का मंदिर भी बनवाया, जो अब गांव की धार्मिक पहचान का एक और हिस्सा बन चुका है।

खेती-पशुपालन पर टिकी जिंदगी

इतनी उपलब्धियों के बावजूद भालोठ के ज्यादातर लोग आज भी खेती और पशुपालन पर निर्भर हैं। गांव के कई प्रगतिशील किसान परंपरागत खेती छोड़कर आधुनिक और उन्नत तरीकों से खेती कर रहे हैं, जिससे कृषि क्षेत्र में भी भालोठ की एक अलग पहचान बन रही है। गांव में इन प्रगतिशील किसानों को अक्सर इस बात की मिसाल के तौर पर देखा जाता है कि भालोठ के लोग चाहे खेती हो, शिक्षा हो या देश सेवा, हर क्षेत्र में खुद को ढालना जानते हैं। सेना, शिक्षा, आस्था और खेती, इन सभी क्षेत्रों में साथ साथ आगे बढ़ते हुए भालोठ गांव आज राजस्थान के लिए एक मिसाल बन चुका है।

सवाल-जवाब

भालोठ गांव कहां स्थित है?
यह राजस्थान के झुंझुनूं जिले में स्थित है।
गांव से अब तक कितने जवान भारतीय सेना में जा चुके हैं?
भालोठ से अब तक 700 से ज्यादा जवान भारतीय सेना और अन्य सुरक्षा बलों में सेवाएं दे चुके हैं।
गांव से कितने शिक्षक निकले हैं?
भालोठ से करीब 500 लोग शिक्षक बनकर राजस्थान के अलग अलग हिस्सों में पढ़ा रहे हैं।
भालोठ नाम कैसे पड़ा?
दिल्ली के तत्कालीन बादशाह गयासुद्दीन से मिली 52 हजार बीघा जमीन पर भाल नाम के व्यक्ति ने गांव बसाया था, जिनके नाम पर इसका नाम भालोठ पड़ा।
गांव में पहला स्कूल कब खुला था?
पहला स्कूल 1952 में खुला था, जिसमें शुरुआत में पांचवीं तक पढ़ाई होती थी, और 1958 में इसे दसवीं तक कर दिया गया।
भालोठ को पंचायत का दर्जा कब मिला?
आजादी के बाद 1948 में भालोठ को पंचायत का दर्जा मिला था।
गुड़गांव वाली माता मंदिर की क्या मान्यता है?
मान्यता है कि होली के दिन इस मंदिर में स्नान करने वाली महिलाओं की संतान प्राप्ति की मनोकामना पूरी होती है।
ठाकुरजी का मंदिर किसने बनवाया था?
यह मंदिर खेतड़ी के तत्कालीन राजा ने बनवाया था, जो अपनी सैकड़ों साल पुरानी वास्तुशैली और अष्टधातु की मूर्तियों के लिए जाना जाता है।
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