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जंतर-मंतर से विरोध स्थल का दर्जा हटने पर भड़की शिवसेना यूबीटी, केंद्र पर असहमति दबाने का लगाया आरोपदिल्ली
14 अक्तू॰ 2026, 7:04 pm (15 दिन पहले)· 1

जंतर-मंतर से विरोध स्थल का दर्जा हटने पर भड़की शिवसेना यूबीटी, केंद्र पर असहमति दबाने का लगाया आरोप

दिल्ली पुलिस द्वारा जंतर-मंतर से प्रदर्शन का अधिकार छीने जाने के बाद शिवसेना (यूबीटी) ने केंद्र सरकार पर कड़ा प्रहार किया है। पार्टी ने आरोप लगाया कि सत्ता के गलियारों से दूर प्रदर्शनकारियों को धकेलना प्रशासनिक डर और सत्तावाद का स्पष्ट प्रमाण है।

देश की राजधानी में ऐतिहासिक धरना स्थल जंतर-मंतर से प्रदर्शन का दर्जा समाप्त किए जाने के कदम ने सियासी गलियारों में तीखी बहस छेड़ दी है। 14 अक्टूबर को शिवसेना (यूबीटी) ने इस प्रशासनिक निर्णय को लेकर केंद्र सरकार पर सीधा हमला बोला। पार्टी ने आरोप लगाया कि मौजूदा शासन व्यवस्था सार्वजनिक असहमति को व्यवस्थित रूप से कुचलने में लगी है और देश में सत्तावाद को संस्थागत रूप दिया जा रहा है।

सत्ता के केंद्र से दूर धकेले गए प्रदर्शन स्थल

पार्टी के मुखपत्र 'सामना' के संपादकीय में ठाकरे गुट ने दिल्ली पुलिस के नए नियमों पर गंभीर सवाल उठाए हैं। संपादकीय के अनुसार, विरोध प्रदर्शनों को जानबूझकर सत्ता के शीर्ष केंद्रों से दूर भगाया जा रहा है। पुलिस द्वारा तय किए गए नए वैकल्पिक स्थलों में रामलीला मैदान लगभग 4 किलोमीटर दूर है, जबकि शाहदरा स्थित सीबीडी ग्राउंड करीब 12 किलोमीटर और बुराड़ी ग्राउंड 20 से 21 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। पार्टी का मानना है कि यह एक सोची-समझी योजना का हिस्सा है, ताकि आम नागरिकों, कर्मचारियों और आंदोलनकारियों की आवाज न तो संसद भवन तक पहुंचे और न ही राष्ट्रीय चेतना को झकझोर सके।

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प्रोटेस्ट का बढ़ता खर्च और बुकिंग की दिक्कतें

संपादकीय में लोकतांत्रिक अधिकारों के व्यावसायीकरण पर भी तीखी चिंता व्यक्त की गई है। ठाकरे गुट का कहना है कि नए प्रस्तावित स्थलों में शामिल रामलीला मैदान का किराया प्रतिदिन 1.5 लाख रुपए से भी अधिक है। इसके अलावा, इस मैदान को पाने के लिए कई महीने पहले से अग्रिम बुकिंग करानी पड़ती है, और ज्यादातर समय यह स्थान धार्मिक आयोजनों या सत्तारूढ़ दल के अपने कार्यक्रमों के लिए पहले से ही आरक्षित रहता है। ऐसे में सामान्य जनआंदोलनों और गरीब तबके के लिए अपनी बात रखना आर्थिक रूप से असंभव बना दिया गया है।

संवैधानिक अधिकारों और चुनावी अखंडता का मुद्दा

शिवसेना (यूबीटी) ने रेखांकित किया कि शांतिपूर्ण सभा और प्रदर्शन करना देश के संविधान द्वारा संरक्षित मौलिक अधिकार है। असहमति की आवाजों को महानगर की बाहरी सीमाओं तक सीमित कर देना सत्ता के गहरे प्रशासनिक डर को दर्शाता है। यह पूरा प्रशासनिक कदम चुनावी अखंडता पर जवाबदेही मांगने वाले नागरिक समूहों के हालिया प्रदर्शनों के बाद सामने आया, जिसके चलते राजधानी में बड़े पैमाने पर सुरक्षा बलों की तैनाती की गई थी और कई लोगों को निवारक हिरासत में लिया गया था।

विपक्ष का विरोध और हाईकोर्ट में कानूनी लड़ाई

संपादकीय के मुताबिक, राहुल गांधी सहित विभिन्न विपक्षी नेताओं ने इस पूरे प्रशासनिक आदेश की कड़ी भर्त्सना की है। वहीं दूसरी ओर, जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से गैर-अधिसूचित किए जाने के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में कानूनी याचिकाएं भी तेजी से दायर की गई हैं। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने तीखा निष्कर्ष निकालते हुए कहा कि जब कोई सरकार अपनी ही जनता से डरने लगती है, तो उसके पतन की उलटी गिनती आधिकारिक तौर पर शुरू हो जाती है।

सवाल-जवाब

शिवसेना (यूबीटी) ने केंद्र सरकार पर क्या आरोप लगाया है?
शिवसेना (यूबीटी) ने केंद्र सरकार पर असहमति को व्यवस्थित रूप से दबाने और सत्तावाद को संस्थागत रूप देने का आरोप लगाया है।
दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन के लिए कौन से नए स्थल तय किए हैं?
पुलिस ने रामलीला मैदान (4 किमी दूर), शाहदरा में सीबीडी ग्राउंड (12 किमी दूर) और बुराड़ी ग्राउंड (20-21 किमी दूर) को प्रदर्शन के लिए निर्धारित किया है।
रामलीला मैदान में प्रदर्शन करने की लागत क्या बताई गई है?
सामना के संपादकीय के अनुसार, रामलीला मैदान का खर्च प्रतिदिन 1.5 लाख रुपए से अधिक है और इसके लिए महीनों पहले बुकिंग करानी पड़ती है।
किन विपक्षी नेताओं ने इस प्रशासनिक कार्रवाई का विरोध किया है?
राहुल गांधी सहित अन्य विपक्षी नेताओं ने जंतर-मंतर से प्रदर्शन स्थल का दर्जा हटाने की कड़ी निंदा की है।
क्या जंतर-मंतर से जुड़े इस फैसले को अदालत में चुनौती दी गई है?
हां, जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से गैर-अधिसूचित किए जाने के फैसले के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में कानूनी याचिकाएं दायर की गई हैं।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Yuki Tanaka@yuki-tanaka·15 दिन पहले

रामलीला मैदान का डेढ़ लाख रुपये प्रतिदिन का किराया सुनकर तो आम आदमी के लिए अपनी आवाज़ उठाना ही नामुमकिन हो जाएगा।

Arjun Mehta@arjun-mehta·15 दिन पहले

जंतर-मंतर हटने से आवाज़ थोड़ी दूर ज़रूर हो जाएगी, पर मुझे नहीं लगता कि इससे विरोध करने वालों का जोश कम होगा। लोग रास्ता ढूंढ ही लेते हैं।

Omar AL Mansoori@omar-mansoori·15 दिन पहले

अर्जुन भाई, जोश कम होने की बात ठीक है, पर जब रामलीला मैदान का किराया डेढ़ लाख रोज़ हो और बुकिंग महीनों पहले करानी पड़े, तो रास्ता ढूंढना आसान नहीं रहेगा।

Karan Malhotra@karan-malhotra·15 दिन पहले

विरोध प्रदर्शनों को शहर के बाहर धकेलना सीधे तौर पर जनता की आवाज़ दबाने की कोशिश है। लोकतंत्र में असहमति की जगह खत्म करना ठीक नहीं है।

Rohan Verma@rohan-verma·15 दिन पहले

करण भाई, बिल्कुल सही कहा आपने। पिछली बार जब हम जंतर-मंतर पर एक आंदोलन कवर करने गए थे, तो लगा था कि सरकार कम से कम सुनेगी तो सही। अब बुराड़ी भेज देंगे तो कोई आवाज़ ही नहीं सुनेगा।

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