दिल्ली की राउज़ एवेन्यू अदालत ने महिला पहलवान यौन उत्पीड़न मामले में एक अहम निर्देश जारी करते हुए भारतीय कुश्ती महासंघ के पूर्व अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह को अंतिम अवसर दिया है। अदालत ने अपने बरी किए जाने के फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर अपना जवाब प्रस्तुत करने के लिए बचाव पक्ष को समय दिया है। सुनवाई के दौरान आरोपी के वकील ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए कोर्ट के समक्ष उपस्थित होकर जवाब तैयार करने हेतु एक हफ्ते की मोहलत मांगी थी। मामले की गंभीरता को देखते हुए सेशंस कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि 20 नवंबर को होने वाली अगली सुनवाई से पहले यह प्रक्रिया पूरी होनी चाहिए, जिसके बाद किसी भी सूरत में अतिरिक्त समय नहीं दिया जाएगा।
अदालत की प्रक्रिया और सुरक्षा निर्देश
इससे पहले 28 सितंबर को सेशंस कोर्ट ने बृजभूषण शरण सिंह और सह-आरोपी विनोद तोमर को नोटिस जारी कर इस याचिका पर अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया था। इस सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त लोक अभियोजक मनीष रावत कोर्ट में उपस्थित हुए। अदालत ने पीड़ितों की निजता और पहचान की सुरक्षा के संबंध में भी कड़े दिशा-निर्देश जारी किए हैं। कोर्ट के आदेश के मुताबिक, पीड़ितों के मूल नाम और पहचान वाले सभी हलफनामों और अदालती आदेशों को एक सीलबंद लिफाफे में सुरक्षित रखा जाएगा। इसके अलावा, अपीलकर्ताओं को निर्देश दिया गया है कि वे याचिका की एक ऐसी संशोधित प्रति दाखिल करें, जिसमें से पीड़ितों की पहचान उजागर करने वाले सभी विवरण पूरी तरह हटा दिए गए हों।
बरी किए जाने के फैसले पर पहलवानों के तर्क
महिला पहलवानों द्वारा दायर की गई अपील में 3 अगस्त के उस अदालती आदेश को चुनौती दी गई है, जिसके तहत अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अश्व पंवार ने बृजभूषण शरण सिंह और विनोद तोमर को सभी आरोपों से बरी कर दिया था। पहलवानों का तर्क है कि मजिस्ट्रेट अदालत का यह फैसला कानूनी मापदंडों पर खरा नहीं उतरता है। याचिका में कहा गया है कि निचली अदालत ने गवाहों और रिकॉर्ड पर उपलब्ध सबूतों का मूल्यांकन बेहद सीमित और गलत तरीके से किया है। पीड़ितों का कहना है कि बरी करने का यह निर्णय मुख्य रूप से अनुमानों और पूर्वग्रहों पर आधारित है, न कि ठोस कानूनी सिद्धांतों पर।
पुराने विचारों और रूढ़िवादिता पर सवाल
अपील में विशेष रूप से इस बात को रेखांकित किया गया है कि निचली अदालत का फैसला यौन उत्पीड़न का शिकार हुई महिलाओं के व्यवहार को लेकर बनाई गई पुरानी और रूढ़िवादी धारणाओं से प्रभावित है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, अदालत ने इस बात पर विचार करने के बजाय कि कोई पीड़िता किन परिस्थितियों और मानसिक दबाव में थी, यह तय करने की कोशिश की कि एक पीड़िता को कैसा व्यवहार करना चाहिए था। महिला पहलवानों ने इस बात पर जोर दिया है कि भारत और विदेशों में हुए कथित यौन उत्पीड़न की घटनाओं के मामले में बंद कमरे में हुई सुनवाई के दौरान प्रस्तुत किए गए साक्ष्यों की सही ढंग से समीक्षा नहीं की गई।
मामले से जुड़ी धाराओं का विवरण
यह पूरा विवाद महिला पहलवानों द्वारा दर्ज कराई गई उस शिकायत से जुड़ा है, जो उस समय सामने आई थी जब बृजभूषण शरण सिंह WFI के अध्यक्ष पद पर तैनात थे। दिल्ली पुलिस ने लंबी जांच के बाद इस मामले में भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया था। इनमें धारा 354, धारा 354 D, धारा 354 A, धारा 506(1) और धारा 109 शामिल हैं। बंद कमरे में चली लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद ACJM अदालत ने दोनों आरोपियों को राहत दी थी, जिसे अब सेशंस कोर्ट में चुनौती दी गई है। 20 नवंबर को होने वाली सुनवाई इस मामले की भावी दिशा तय करने में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।

















