देश की शीर्ष अदालत ने गुरुवार को एक अहम सुनवाई के दौरान कहा कि ऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी के मामलों में अगर किसी बैंक या वित्तीय संस्था की तरफ से जरूरी जांच-पड़ताल में कोताही पाई जाती है, तो प्रभावित खाताधारकों को कम-से-कम उनके नुकसान के बराबर मुआवजा दिया जाना चाहिए। अदालत ने इस बात पर कड़ा रुख अपनाया कि वित्तीय धोखाधड़ी की रोकथाम और ग्राहकों की सुरक्षा को लेकर वित्तीय संस्थानों की ठोस जवाबदेही तय की जानी बेहद जरूरी है।
इस साल अब तक आठ सौ करोड़ रुपये का नुकसान
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की विशेष पीठ ने सुनवाई के दौरान चिंताजनक आंकड़े सामने रखे। पीठ ने रेखांकित किया कि साइबर अपराधों के कुल मामलों में पचास प्रतिशत की गिरावट दर्ज होने के बाद भी केवल इस साल लोगों को लगभग आठ सौ करोड़ रुपये की वित्तीय चपत लग चुकी है। इतनी बड़ी राशि का नुकसान यह साबित करता है कि मौजूदा सुरक्षा उपाय आम नागरिकों की गाढ़ी कमाई की रक्षा करने के लिए नाकाफी साबित हो रहे हैं।
आरबीआई के नए नियमों की होगी समीक्षा
अदालत ने स्पष्ट किया कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा तैयार किए जा रहे नए नियामकीय तंत्र में पीड़ितों के मुआवजे, धोखाधड़ी रोकने की रणनीति और वित्तीय संस्थानों की स्पष्ट जिम्मेदारी से जुड़े कड़े दिशा-निर्देश शामिल होने चाहिए। अदालत आरबीआई के प्रस्तावित 'अपने ग्राहक को जानें' (केवाईसी) संशोधन निर्देश, 2026 की स्वयं विस्तृत समीक्षा करेगी। निर्धारित कार्यक्रम के तहत इन नए नियमों को तीस नवंबर तक अधिसूचित करने और इकतीस दिसंबर तक पूर्ण रूप से लागू करने की योजना बनाई गई है।
लापरवाही पर हर्जाना और दंडात्मक कार्रवाई का आदेश
अपने आधिकारिक आदेश में पीठ ने दर्ज किया कि केंद्रीय बैंक के आगामी विनियामक उपायों में ऐसा स्पष्ट नियम होना चाहिए जिसके तहत 'डिजिटल अरेस्ट' या अन्य ऑनलाइन जालसाजी के शिकार बने लोगों को वित्तीय कंपनियां उचित क्षतिपूर्ति दें। यह भरपाई किसी भी स्थिति में ग्राहक द्वारा गंवाई गई रकम से कम नहीं होनी चाहिए, यदि यह सिद्ध हो जाता है कि चूक बैंक की लचर पड़ताल की वजह से हुई। चीफ जस्टिस ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि वित्तीय संस्थानों के लिए दंडात्मक शर्तें लागू करना अपरिहार्य हो चुका है, क्योंकि कड़े दंड के बिना बैंक अपनी कार्यप्रणाली और सुरक्षा मानकों में बदलाव करने को तैयार नहीं होंगे।
लेन-देन के पैटर्न और एआई के इस्तेमाल पर जोर
अदालत ने इस पहलू पर भी विचार किया कि बैंक अपने सुरक्षा तंत्र को आधुनिक तकनीकों से क्यों नहीं लैस कर रहे हैं। पीठ ने सवाल उठाया कि वित्तीय संस्थान खाताधारकों के खातों को उनकी प्रकृति और सामान्य लेन-देन के तौर-तरीकों के अनुसार अलग-अलग श्रेणियों में क्यों नहीं बांटते। इसके साथ ही असामान्य और संदेहास्पद गतिविधियों को समय रहते पकड़ने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का दायरा क्यों नहीं बढ़ाया जा रहा है।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि बैंकों के पास प्रत्येक खाताधारक के लेन-देन का विस्तृत ब्योरा मौजूद रहता है। ऐसी स्थिति में अगर कोई ग्राहक अमूमन छोटी रकम का लेन-देन करता है और उसके खाते से अचानक असामान्य रूप से बड़ी रकम किसी दूसरे खाते में भेजने की कोशिश की जाती है, तो बैंक के सुरक्षा तंत्र को तत्काल सक्रिय होकर बीच में दखल देना चाहिए ताकि जालसाजों के मंसूबे पूरे न हो सकें।
















