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महाराष्ट्र समान नागरिक संहिता समिति से जस्टिस आरसी चव्हाण अलग, फीडबैक प्रक्रिया पर सवाल उठाकर दिया इस्तीफामहाराष्ट्र
22 सित॰ 2026, 9:01 am (35 दिन पहले)· 2

महाराष्ट्र समान नागरिक संहिता समिति से जस्टिस आरसी चव्हाण अलग, फीडबैक प्रक्रिया पर सवाल उठाकर दिया इस्तीफा

महाराष्ट्र में यूसीसी मसौदा तैयार करने वाली समिति से पूर्व जज जस्टिस आरसी चव्हाण ने इस्तीफा दे दिया है, जिसे राज्य सरकार ने स्वीकार कर लिया।

महाराष्ट्र में समान नागरिक संहिता की रूपरेखा और सिफारिशें तैयार करने के लिए बनाई गई उच्च स्तरीय समिति में आंतरिक मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। बॉम्बे हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस आरसी चव्हाण ने पैनल के कामकाज के तौर-तरीकों पर गंभीर आपत्ति जताते हुए अपनी सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है। राज्य सरकार ने 21 सितंबर को उनका इस्तीफा औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया। यह इस्तीफा 19 सितंबर को आयोजित समिति की दूसरी औपचारिक बैठक समाप्त होने के चंद घंटों के भीतर ही ईमेल के जरिए भेजा गया था।

प्रश्नावली और जनमत संग्रह के तौर-तरीकों पर मतभेद

सात सदस्यों वाली इस समिति का गठन राज्य सरकार ने जुलाई के महीने में किया था, जिसकी कमान सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस रंजना देसाई के हाथों में है। इस समिति का प्राथमिक कार्य राज्य में समान नागरिक संहिता के क्रियान्वयन के लिए आवश्यक नियम तय करना और व्यापक सिफारिशें तैयार करना है। हालांकि, 19 सितंबर को डिजिटल माध्यम से हुई दूसरी बैठक के दौरान जनता से सुझाव मांगने की प्रस्तावित प्रक्रिया को लेकर सदस्यों के बीच असहमति पैदा हो गई।

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जस्टिस चव्हाण ने अपने इस्तीफे में स्पष्ट किया कि बैठक का मुख्य एजेंडा आम जनता से विचार विमर्श के लिए तैयार की जाने वाली प्रश्नावली पर मंथन करना था। समिति के कुछ सदस्यों की दलील थी कि जनता से केवल 'हां' या 'नहीं' जैसे सीमित विकल्पों के जरिए जवाब लिए जाने चाहिए। इसके साथ ही इस प्रश्नावली की पेशेवर समीक्षा कराने का प्रस्ताव भी रखा गया था। समिति की अध्यक्ष की ओर से तैयार की गई प्रश्नावली पहले ही सदस्यों को साझा की जा चुकी थी, जिसे आधिकारिक वेबसाइट शुरू होते ही सार्वजनिक किया जाना था।

जस्टिस चव्हाण का मानना था कि समिति की बुनियादी जिम्मेदारी राज्य की जनता की वास्तविक राय जानना और संवेदनशील मुद्दों पर आम सहमति बनाना है। इसके विपरीत, बैठक की कार्यप्रणाली से उन्हें यह प्रतीत हुआ कि लोगों को सिर्फ पूर्वनिर्धारित सवालों पर सीमित प्रतिक्रिया देने का मौका मिलेगा, जिससे केवल डेटा विश्लेषण को सरल बनाने पर जोर दिया जा रहा था।

बैठक में अनधिकृत व्यक्ति की उपस्थिति पर ऐतराज

इस्तीफा पत्र में जस्टिस चव्हाण ने एक गैर-सदस्य की मौजूदगी का भी प्रमुखता से जिक्र किया। उन्होंने बताया कि बैठक में शामिल उस बाहरी व्यक्ति ने राज्य के प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा तैयार की गई वेबसाइट में कुछ संशोधनों की वकालत की। उस हस्तक्षेप के तुरंत बाद अध्यक्ष ने अधिकारियों को एक हफ्ते की समयसीमा में वेबसाइट में जरूरी बदलाव करने का निर्देश जारी कर दिया।

जस्टिस चव्हाण ने सवाल उठाया कि उस व्यक्ति की समिति की इस पूरी प्रक्रिया में क्या अधिकारिक भूमिका थी, यह किसी को स्पष्ट नहीं था। इस घटनाक्रम से उन्हें ऐसा महसूस हुआ कि शायद राज्य के संबंधित अधिकारियों को अपने काम और क्षमता पर भरोसा नहीं था या उनके अधिकार क्षेत्र में बाहरी दखल हो रहा था।

पद त्यागने की वजह और वर्तमान स्थिति

इन तमाम असहमतियों को देखते हुए जस्टिस चव्हाण ने समिति से हटकर अपनी सीट खाली करने का निर्णय लिया, ताकि सरकार किसी अन्य सदस्य को मनोनीत कर काम आगे बढ़ा सके। उन्होंने अपने पत्र में यह भी रेखांकित किया कि समिति के साथ जुड़ना उनके लिए सीखने का अनुभव था और समान नागरिक संहिता का मुद्दा बेहद महत्वपूर्ण है। समिति की अध्यक्ष जस्टिस रंजना देसाई की तरफ से इस पूरे घटनाक्रम पर फिलहाल कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

सवाल-जवाब

महाराष्ट्र यूसीसी समिति से किसने इस्तीफा दिया है?
बॉम्बे हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस आरसी चव्हाण ने समिति से इस्तीफा दिया है।
जस्टिस चव्हाण ने इस्तीफा क्यों दिया?
उन्होंने जनता से फीडबैक लेने के सीमित प्रारूप और बैठक में एक गैर-सदस्य की मौजूदगी पर सवाल उठाते हुए इस्तीफा दिया।
महाराष्ट्र सरकार ने इस्तीफा कब स्वीकार किया?
राज्य सरकार ने सोमवार 21 सितंबर को जस्टिस चव्हाण का इस्तीफा स्वीकार कर लिया।
इस यूसीसी समिति की अध्यक्ष कौन हैं?
सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस रंजना देसाई सात सदस्यीय समिति की अध्यक्षता कर रही हैं।
समिति का गठन कब और किस उद्देश्य से हुआ था?
राज्य सरकार ने जुलाई में समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए नियम और सिफारिशें तैयार करने हेतु इसका गठन किया था।
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टिप्पणियाँ 5

Vikram Yadav@vikram-yadav·34 दिन पहले

जनता से सिर्फ हां या ना में जवाब मांगने का क्या मतलब है? अगर राय ही सीमित कर दोगे तो सच सामने कैसे आएगा। जस्टिस चव्हाण ने बिल्कुल सही कदम उठाया है।

Ravikash Gupta@ravikash·34 दिन पहले

सिर्फ हाँ या ना जैसे विकल्पों से जनता की राय कैसे समझ आएगी? लगता है समिति कुछ और ही चाहती थी।

Pooja Bhatt@pooja-bhatt·34 दिन पहले

रविकेश, आपकी बात सही है। पर क्या आपको लगता है कि इस इस्तीफ़े के बाद अब जनता से राय लेने के तरीके में कोई बदलाव आएगा?

Rohan Verma@rohan-verma·34 दिन पहले

जनता से सिर्फ हां या ना में जवाब मांगना कौन सा तरीका है, जब मुद्दे इतने संवेदनशील हों। जस्टिस चव्हाण ने बिल्कुल सही वक्त पर सवाल उठाया है, वरना ऐसी समितियों का मतलब ही क्या रह जाता है जब राय पहले से तय लगे।

Karan Malhotra@karan-malhotra·34 दिन पहले

रोहन भाई, बात तो सही है आपकी, पर क्या पता 'हाँ-ना' वाले विकल्पों से डेटा संभालना सच में आसान करना मकसद हो? इतनी जल्दी प्रक्रिया पर सवाल उठाकर बाहर हो जाना थोड़ा जल्दबाजी नहीं लगता?

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