विदेश मंत्रालय ने मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू के सार्क सम्मेलन और क्षेत्रीय सहयोग को दोबारा शुरू करने वाले बयान पर कड़ा रुख अपनाया है। भारत सरकार ने बिना किसी मुल्क का सीधा नाम लिए स्पष्ट कर दिया कि पूरा दक्षिण एशिया भली-भांति जानता है कि क्षेत्रीय संगठन के काम में अडंगा कौन डाल रहा है। विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने एक प्रेस वार्ता के दौरान इस विषय पर भारत की स्थिति साफ की।
सद्भावना और नीयत बिना संभव नहीं क्षेत्रीय सहयोग
रणधीर जायसवाल ने मीडिया के सवालों का जवाब देते हुए कहा कि भारत हमेशा से एक सशक्त और असरदार क्षेत्रीय सहयोग का पक्षधर रहा है। भारत ने बीते कई दशकों से इस दिशा में निरंतर प्रयास भी किए हैं। हालांकि, उन्होंने जोर देकर कहा कि दक्षिण एशियाई क्षेत्र का हर देश इस सच्चाई से पूरी तरह वाकिफ है कि कौन सा देश और किस तरह का आचरण सार्क की गतिविधियों में निरंतर रुकावटें पैदा कर रहा है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता के अनुसार, किसी भी क्षेत्रीय सहयोग मंच की सफलता के लिए सदस्य देशों के बीच अच्छी नीयत और आपसी सद्भावना का होना प्राथमिक शर्त है। जब तक सीमा पार से नकारात्मक नीतियां जारी रहेंगी, तब तक कोई भी मंच सुचारू रूप से कार्य नहीं कर सकता।
मुइज्जू की सार्क को सक्रिय करने की अपील
यह पूरा घटनाक्रम मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू के उस भाषण के बाद सामने आया है जिसमें उन्होंने दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) को एक बार फिर से सक्रिय करने की पुरजोर वकालत की थी। मुइज्जू ने अपने संबोधन के दौरान सदस्य देशों के बीच जारी आपसी मतभेदों को बातचीत और संवाद के जरिए हल करने की सलाह दी थी। हालांकि, भारत के आधिकारिक बयान से यह साफ संकेत मिल गया है कि आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले पड़ोसी देश के रवैये में बदलाव आए बिना सार्क को दोबारा सक्रिय करना मुमकिन नहीं है।
2016 के उरी हमले के बाद से ठप है सार्क शिखर सम्मेलन
सार्क आठ दक्षिण एशियाई देशों का एक प्रमुख क्षेत्रीय समूह है, जिसमें भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, मालदीव, नेपाल, श्रीलंका और अफगानिस्तान शामिल हैं। इस संगठन का अंतिम शिखर सम्मेलन वर्ष 2014 में नेपाल की राजधानी काठमांडू में आयोजित हुआ था। इसके बाद अगला सम्मेलन वर्ष 2016 में पाकिस्तान के इस्लामाबाद शहर में होना तय किया गया था।
हालांकि, 18 सितंबर 2016 को जम्मू-कश्मीर के उरी स्थित भारतीय सैन्य शिविर पर एक जघन्य और कायरतापूर्ण आतंकवादी हमला हुआ था। इस हमले के बाद भारत ने आतंकवाद के साए में किसी भी कूटनीतिक वार्ता या सम्मेलन में भाग लेने से साफ़ मना कर दिया था। भारत के इस कड़े फैसले के समर्थन में बांग्लादेश, भूटान और अफगानिस्तान ने भी इस्लामाबाद में प्रस्तावित बैठक का बहिष्कार करने की घोषणा कर दी थी। सहयोगियों के इस बहिष्कार के बाद से सार्क व्यावहारिक रूप से पूरी तरह निष्क्रिय और ठप पड़ा हुआ है।



















