हिमाचल प्रदेश की प्राचीन और समृद्ध हस्तशिल्प कला दुनिया भर में अपनी अनूठी पहचान रखती है। इसी सांस्कृतिक परंपरा को आगे बढ़ाते हुए देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को एक विशेष पारंपरिक रणसिंघा स्मृति चिन्ह के तौर पर भेंट किया जाएगा। इस कलाकृति को मंडी जिले के सराज क्षेत्र के थाची गांव के रहने वाले कुशल शिल्पी वीर सिंह ने अपने हाथों से तैयार किया है। इस उपहार के जरिए हिमाचल की लोक संस्कृति और पारंपरिक विरासत की झलक देश के सर्वोच्च पद तक पहुंचेगी।
बिलासपुर के दीक्षांत समारोह में होगी भेंट
निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार 6 से 8 अक्तूबर तक राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू हिमाचल प्रदेश के दौरे पर रहेंगी। इस दौरान वह 6 अक्तूबर को बिलासपुर स्थित एम्स के पहले दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत करेंगी। इसी ऐतिहासिक अवसर पर उन्हें यह पारंपरिक रणसिंघा उपहार स्वरूप दिया जाएगा। इस विशेष स्मृति चिन्ह की बनावट बेहद आकर्षक है जिसमें दो रणसिंघे शामिल हैं और उनके ठीक बीच में संबंधित संस्थान का लोगो डिजाइन किया गया है। इस पूरे कलात्मक उपहार को पीतल और तांबे जैसी धातुओं का उपयोग करके बनाया गया है जो इसकी मजबूती और सुंदरता दोनों को बढ़ाता है।
पीढ़ियों से चली आ रही है हस्तशिल्प की यह परंपरा
कलाकार वीर सिंह और उनका पूरा परिवार कई पीढ़ियों से इस पारंपरिक हस्तशिल्प के काम से जुड़ा हुआ है। सबसे खास बात यह है कि आज के आधुनिक दौर में भी रणसिंघे और देवी-देवताओं के मोहरे पूरी तरह से हाथ से ही तैयार किए जाते हैं। यही वजह है कि इन तमाम कलाकृतियों में हिमाचल की मिट्टी, संस्कृति और लोक कला की गहरी छाप साफ तौर पर दिखाई देती है। वीर सिंह के साथ उनके परिवार के अन्य सदस्य भी इस कार्य में पूरा सहयोग देते हैं। इस प्रकार यह कला केवल आजीविका का साधन मात्र नहीं है, बल्कि उनके परिवार की सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत का जीवंत हिस्सा बन चुकी है।
प्रधानमंत्री और पूर्व राष्ट्रपति को भी मिल चुका है रणसिंघा
वीर सिंह के हाथों बनी यह अनूठी कलाकृतियां इससे पहले भी देश के कई सर्वोच्च पदों पर बैठे दिग्गजों तक पहुंच चुकी हैं। उनके द्वारा बनाए गए रणसिंघे केवल स्थानीय नेताओं तक सीमित नहीं रहे हैं, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को भी ऐसे स्मृति चिन्ह भेंट किए जा चुके हैं। इसके अलावा हिमाचल की सांस्कृतिक पहचान को दर्शाने वाले ये हस्तनिर्मित रणसिंघे देश के विभिन्न राज्यों के साथ-साथ विदेशों में भी उपहार के रूप में पहुंच चुके हैं। जीआई टैग मिलने के बाद से इस कला को राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी एक नई पहचान मिली है। पारंपरिक शिल्प को बचाने और उसे संवारने के उनके सराहनीय प्रयासों के लिए उन्हें पिछले वर्ष दिल्ली में यंग आर्टिजन अवार्ड से भी नवाजा जा चुका है।
धार्मिक आयोजनों और देव संस्कृति का अभिन्न अंग
वीर सिंह द्वारा बनाए जाने वाले रणसिंघे केवल घर की सजावट की वस्तुएं नहीं हैं, बल्कि ये हिमाचल की समृद्ध देव संस्कृति और प्राचीन परंपराओं के प्रतीक हैं। राज्य के कई हिस्सों में धार्मिक आयोजनों और उत्सवों के दौरान रणसिंघे का बजाया जाना अनिवार्य हिस्सा माना जाता है। वीर सिंह ने इस बात पर जोर दिया है कि जीआई टैग मिलने से इस पारंपरिक वाद्य यंत्र को वैश्विक स्तर पर एक नई पहचान मिलेगी। उन्होंने सरकार से मांग की है कि जीआई टैग प्रक्रिया में बिचौलियों को बाहर किया जाना चाहिए ताकि सीधे तौर पर असली हस्तशिल्पकारों को ही अधिकृत यूजर का दर्जा मिल सके।





















