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मयूर विहार से एम्स रूट पर रोजाना भीषण जाम, बारापूला फेज 3 को लेकर क्यों उठने लगे बीआरटी जैसे सवालदिल्ली
6 अक्तू॰ 2026, 4:02 pm (24 दिन पहले)· 0

मयूर विहार से एम्स रूट पर रोजाना भीषण जाम, बारापूला फेज 3 को लेकर क्यों उठने लगे बीआरटी जैसे सवाल

मयूर विहार से एम्स को जोड़ने वाले नवनिर्मित बारापूला फेज 3 एलिवेटेड कॉरिडोर पर रोज लग रहे भयंकर ट्रैफिक जाम ने लोगों को पुराने बीआरटी प्रोजेक्ट की नाकामियों की याद दिला दी है।

देश की राजधानी में मयूर विहार से एम्स तक निर्बाध सफर कराने के उद्देश्य से 29 सितंबर को शुरू किया गया बारापूला फेज 3 एलिवेटेड कॉरिडोर इन दिनों भारी ट्रैफिक जाम के केंद्र में आ गया है। जिस रास्ते को चालकों का कीमती समय बचाने और सिग्नल फ्री आवागमन देने के इरादे से जनता को सौंपा गया था, उसी मार्ग पर अब रोजाना गाड़ियां रेंगती नजर आ रही हैं। जो दूरी कुछ मिनटों में तय हो जानी चाहिए थी, वह अब घंटों के लंबे इंतजार में बदल चुकी है। इस एलिवेटेड सड़क पर वाहनों का दबाव इतना अनियंत्रित हो चुका है कि वाहन चालकों को पुराने पारंपरिक रास्तों की तुलना में यहां से निकलना कहीं ज्यादा महंगा और थकाऊ साबित हो रहा है। लगातार पैदा हो रही इस अव्यवस्था के बीच अब कई लोग इसकी तुलना दिल्ली के पुराने बस रैपिड ट्रांजिट यानी बीआरटी कॉरिडोर से करने लगे हैं, जो शुरुआत में तो शहर के लिए बड़ी सौगात बताया गया था लेकिन बाद में चालकों के लिए आफत बन गया था।

दक्षिण दिल्ली में कैसे शुरू हुआ था बीआरटी का प्रयोग

राजधानी में पब्लिक ट्रांसपोर्ट को नई गति देने के नाम पर बीआरटी प्रणाली की शुरुआत 20 अप्रैल 2008 को की गई थी। उस दौरान कांग्रेस की शीला दीक्षित सरकार ने दक्षिण दिल्ली इलाके में अंबेडकर नगर से मूलचंद तक करीब 5.8 किलोमीटर लंबी मुख्य सड़क पर इस विशेष लेन कॉरिडोर का निर्माण कराया था। वर्ष 2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स से पहले तैयार किए गए इस बुनियादी ढांचे पर उस समय करीब 150 करोड़ रुपये का सरकारी खर्च आया था। इसका मुख्य मकसद सड़कों पर सार्वजनिक परिवहन और बसों को प्राथमिकता देना था, ताकि वे बिना किसी रुकावट के तेज रफ्तार से अपनी मंजिल तक पहुंच सकें।

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विदेशी मॉडलों से ली गई थी प्रेरणा, मकसद था बसों को रफ्तार देना

उस दौर में दिल्ली की सड़कों पर निजी वाहनों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही थी, जिसकी वजह से प्रमुख चौराहों पर लगने वाला ट्रैफिक जाम रोजमर्रा की सबसे गंभीर समस्या बन चुका था। सड़कों पर चलने वाली सार्वजनिक परिवहन की बसें अक्सर कारों और दोपहिया वाहनों की भीड़ में फंस जाती थीं। बसों के तय समय पर न पहुंचने के कारण आम नागरिक धीरे-धीरे इनसे दूरी बनाने लगे थे। इसी संकट से निपटने के लिए दिल्ली सरकार ने बसों के तीव्र संचालन हेतु एक समर्पित लेन तैयार करने की योजना बनाई। योजना में बसों के अलावा साइकिल चालकों और पैदल चलने वालों के लिए भी अलग जगह सुरक्षित की गई थी।

इस पूरे प्रोजेक्ट को जमीन पर उतारने के लिए दिल्ली सरकार ने कोलंबिया के बोगोटा और ब्राजील के क्यूरिटिबा जैसे अंतरराष्ट्रीय शहरों के कामयाब मॉडलों से सीख ली थी। सरकार का आकलन था कि इस व्यवस्था के लागू होने से न केवल वाहनों का प्रदूषण घटेगा, बल्कि आम लोगों को एक बेहद किफायती, सुरक्षित और तेज यात्रा का विकल्प भी मिल सकेगा।

डिजाइन की खामियों ने बनाया था परेशानी का सबब

कागजों पर बेहद आकर्षक नजर आने वाला यह प्रयोग धरातल पर उतरते ही भारी परेशानियों का कारण बन गया। सबसे बड़ी दिक्कत यह आई कि बस स्टॉप सड़क के ठीक बीच में बनाए गए थे, जिसके चलते पैदल चलने वाले मुसाफिरों को सड़क पार करने में भारी जोखिम और परेशानी उठानी पड़ती थी। दूसरी तरफ, निजी गाड़ियों के लिए सड़क की चौड़ाई अचानक बेहद कम हो गई, जिससे सामान्य लेन में भीषण जाम लगने लगा। इसके अलावा, ट्रैफिक सिग्नल समुचित तालमेल के साथ काम नहीं कर रहे थे और सड़कों पर लेन अनुशासन का पालन भी नहीं हो पा रहा था। नतीजा यह हुआ कि न तो बसें ही समय पर निकल सकीं और न ही कार चालकों को राहत मिली। इस कॉरिडोर पर कई घातक हादसे भी हुए, जिनमें पैदल यात्रियों ने अपनी जान गंवा दी। लगातार बढ़ते हादसों और जाम से जनता में गुस्सा भड़क उठा और यह पूरा विवाद अदालतों की दहलीज तक पहुंच गया।

आठ साल के सफर के बाद पूरी तरह तोड़ा गया कॉरिडोर

जनता के भारी विरोध, सड़क हादसों, गलत डिजाइन और अंतहीन ट्रैफिक संकट को देखते हुए वर्ष 2015 में आम आदमी पार्टी की सरकार ने इस व्यवस्था को पूरी तरह समाप्त करने का फैसला लिया। जुलाई 2015 में दिल्ली कैबिनेट ने इसे हटाने की आधिकारिक मंजूरी दी और अंततः 2016 में इस पूरे 5.8 किलोमीटर लंबे कॉरिडोर को पूरी तरह से डिस्मेंटल कर दिया गया। सरकार ने साफ तौर पर स्वीकार किया कि दुनिया के कई हिस्सों में सफल रहने के बावजूद दिल्ली की परिस्थितियों में यह बीआरटी मॉडल पूरी तरह नाकाम साबित हुआ था। इस तरह आठ वर्षों तक जारी रहा यह प्रयोग आखिरकार समाप्त हो गया।

क्या बारापूला फेज 3 के सामने भी खड़ी है वही चुनौती

अब बारापूला फेज 3 एलिवेटेड मार्ग पर शुरुआती दिनों से ही दिखाई दे रहे भारी जाम ने शहर के लोगों को एक बार फिर बीआरटी के पुराने दौर की याद दिला दी है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या यह नया कॉरिडोर भी उसी तरह की तकनीकी व डिजाइन संबंधी समस्याओं से जूझ रहा है। हालांकि दिल्ली ट्रैफिक पुलिस का कहना है कि वे इस मार्ग पर लगातार काम कर रहे हैं। अधिकारियों के मुताबिक मार्ग की निगरानी बढ़ाई जा रही है और गूगल पर भी ट्रैफिक से जुड़े जरूरी अपडेट जारी किए जाएंगे। पुलिस का कहना है कि जहां भी आवश्यकता होगी, वहां वाहनों का डायवर्जन किया जाएगा ताकि यातायात को सुचारू बनाया जा सके।

सवाल-जवाब

बारापूला फेज 3 फ्लाईओवर जनता के लिए कब खोला गया था?
बारापूला फेज 3 एलिवेटेड कॉरिडोर को 29 सितंबर को आम जनता के यातायात के लिए खोला गया था।
बारापूला फेज 3 कॉरिडोर किन प्रमुख इलाकों को जोड़ता है?
यह एलिवेटेड कॉरिडोर मयूर विहार से एम्स तक सिग्नल फ्री आवागमन की सुविधा देने के लिए बनाया गया है।
दिल्ली में पुराना बीआरटी कॉरिडोर कब और किस रूट पर शुरू हुआ था?
बीआरटी कॉरिडोर को 20 अप्रैल 2008 को दक्षिण दिल्ली के अंबेडकर नगर से मूलचंद के बीच 5.8 किलोमीटर मार्ग पर शुरू किया गया था।
पुराने बीआरटी कॉरिडोर के निर्माण पर कितनी लागत आई थी?
कांग्रेस की शीला दीक्षित सरकार के कार्यकाल में बने इस 5.8 किलोमीटर लंबे बीआरटी कॉरिडोर की लागत करीब 150 करोड़ रुपये थी।
दिल्ली सरकार ने बीआरटी प्रोजेक्ट के लिए किन विदेशी शहरों से प्रेरणा ली थी?
दिल्ली सरकार ने इस मॉडल के लिए कोलंबिया के बोगोटा और ब्राजील के क्यूरिटिबा शहर के सफल परिवहन सिस्टम से प्रेरणा ली थी।
बीआरटी कॉरिडोर को हटाने का फैसला कब लिया गया और यह कब पूरी तरह हटा?
आम आदमी पार्टी की सरकार ने जुलाई 2015 में इसे बंद करने की मंजूरी दी थी और 2016 में इसे पूरी तरह तोड़कर हटा दिया गया था।
बारापूला फेज 3 के ट्रैफिक जाम को सुलझाने के लिए पुलिस क्या कदम उठा रही है?
दिल्ली ट्रैफिक पुलिस के अनुसार मार्ग की निगरानी की जा रही है, गूगल पर लाइव अपडेट दिए जाएंगे और जरूरत पड़ने पर ट्रैफिक डायवर्जन किया जाएगा।
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टिप्पणियाँ 5

Meera Joshi@meera-joshi·23 दिन पहले

रोज़ का ऐसा जाम मानसिक शांति और वर्क-लाइफ बैलेंस दोनों की धज्जियाँ उड़ा देता है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·23 दिन पहले

मयूर विहार से एम्स जाने के नाम पर ही अब डर लगने लगा है। सिग्नल फ्री सड़क पर घंटों फंसना पड़े तो प्लानिंग पर सवाल उठना लाजिमी है। पुराना बीआरटी वाला हश्र यहां भी दिखने लगा है।

Aisha Khan@aisha-khan·23 दिन पहले

अर्जुन जी, बिल्कुल सही कहा आपने! जैसे किसी फ्लॉप फिल्म का सीक्वल दोबारा टिकट खिड़की पर पिट जाता है, वही हाल इस सड़क का हो रहा है।

Rohan Verma@rohan-verma·23 दिन पहले

अंबेडकर नगर से मूलचंद वाला वो बीआरटी वाला दौर याद आ गया, तब भी ऐसे ही जाम से बुरा हाल हुआ था। सड़क पर नया प्रोजेक्ट आते ही गाड़ियां फंसने लग जाती हैं।

Karan Malhotra@karan-malhotra·23 दिन पहले

रोहन भाई, सही कहा आपने। मैं खुद उस बीआरटी के जाम में कई बार घंटों फंसा हूं, वही डर अब इस बारापूला फेज 3 को देखकर फिर से लगने लगा है।

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