मानसून का आगमन होते ही ग्रामीण क्षेत्रों की रसोई में हरी सब्जियों के सीमित विकल्प बचते हैं। ऐसे समय में परंपरागत स्थानीय उपज ग्रामीण परिवारों के लिए स्वाद और आवश्यक पोषण का बेहतरीन माध्यम बनकर उभरती है। उत्तर प्रदेश के लखीमपुर जिले की मोहम्मदी तहसील स्थित दिलावरपुर गांव में किसान अब पारंपरिक फसलों के साथ प्रयोग करते हुए बेहतर आमदनी जुटा रहे हैं। दिलावरपुर के रहने वाले किसान वसीम खान ने पारंपरिक देसी सब्जी मानी जाने वाली फूट ककड़ी की बड़े पैमाने पर रोपाई की है और मचान तकनीक के प्रयोग से अपनी पैदावार को नई पहचान दी है।
मानसून में बढ़ती मांग और ककड़ी की अनोखी खासियत
बरसात के दिनों में जब बाजार में अन्य सब्जियों की आपूर्ति प्रभावित होती है, तब फूट ककड़ी की पूछपरख काफी बढ़ जाती है। इस फल की सबसे बड़ी खासियत इसका प्राकृतिक रूप से पकने के बाद फटना है। पूर्ण रूप से पक जाने पर यह फल अपने आप दरक जाता है, जिसके कारण स्थानीय बोलचाल की भाषा में इसे 'फूट' के नाम से जाना जाता है। इसका स्वाद हल्का खट्टा और मीठा होता है। ग्रामीण इलाकों में लोग इसे विभिन्न तरीकों से अपनी खुराक में शामिल करते हैं। कई जगहों पर इसे टुकड़ों में काटकर चीनी अथवा गुड़ के साथ बड़े चाव से खाया जाता है।
सीमित जमीन और कम लागत में बंपर मुनाफा
फूट ककड़ी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसकी खेती के लिए बहुत विशाल भूखंड की जरूरत नहीं होती। किसान अपने उपलब्ध खेत के एक छोटे से हिस्से में भी इसकी पैदावार शुरू कर सकते हैं। कम लागत में तैयार होने वाली इस फसल में यदि सिंचाई, देखरेख और बेलों को सहारा देने का सही प्रबंधन किया जाए, तो फसल बहुत कम समय में तैयार हो जाती है। दिलावरपुर गांव के किसान वसीम खान वर्तमान समय में लगभग दो एकड़ जमीन में फूट ककड़ी की खेती कर रहे हैं। उनका मानना है कि सही देखरेख से पैदावार अच्छी रहती है और स्थानीय मंडी में अपनी उपज को बेचने के लिए ज्यादा भागदौड़ नहीं करनी पड़ती।
स्थानीय बाजार में 20 से 60 रुपये प्रति पीस की दर से बिक्री
बाजार में मिलने वाले भाव के विषय में किसान वसीम खान ने बताया कि स्थानीय मंडियों में यह फल 20 रुपये से लेकर 60 रुपये प्रति पीस तक के भाव में आसानी से बिक जाता है। हालांकि यह कीमत फल की गुणवत्ता, उसके आकार, बाजार की तात्कालिक मांग और मंडी के माहौल पर भी निर्भर करती है। बेहतर आकार और साफ सुथरी बनावट वाले फलों को खरीदार तुरंत हाथों-हाथ उठा लेते हैं, जिससे किसानों को त्वरित नकदी प्राप्त हो जाती है।
मचान विधि से फसल की सुरक्षा और बेहतर गुणवत्ता
इस बार फसल को कीटों और नमी से सुरक्षित रखने के लिए किसान वसीम खान ने पारंपरिक धरातलीय विधि के स्थान पर मचान तकनीक को अपनाया है। मचान विधि में बेलदार पौधों को जमीन पर फैलाने की बजाय लकड़ी या तार के बने ऊंचे ढांचे पर चढ़ाया जाता है। इस व्यवस्था से पौधों के मध्य हवा की आवाजाही सुचारू रूप से बनी रहती है और तैयार फल जमीन की नमी के सीधे संपर्क में नहीं आते।
मचान तकनीक के फायदों पर बात करते हुए किसान ने बताया कि जब फल जमीन से ऊपर हवा में लटकते हैं, तो उन पर मिट्टी नहीं जमती। इससे फल की बाहरी सतह साफ रहती है और खेत में होने वाली सड़न व विभिन्न प्रकार के कीट पतंगों के हमले का खतरा काफी हद तक टल जाता है। इसके अतिरिक्त, ऊंचे ढांचे के कारण खेत में निराई-गुड़ाई करने, देखभाल करने और पके हुए फलों की तुड़ाई करने में भी किसानों को काफी सहूलियत होती है।





















