15 अगस्त 1947 की सुबह भारतीय इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में सामने आई। कई शताब्दियों के औपनिवेशिक शासन के उपरांत देश ने स्वतंत्रता की सांस ली। दिल्ली स्थित संसद भवन में जब स्वाधीनता के औपचारिक समारोह की शुरुआत हुई, तब देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने स्वतंत्र राष्ट्र के उदय की घोषणा की। हालांकि, जिस समय राजधानी उत्सव के माहौल में डूबी थी, ठीक उसी समय राष्ट्रपिता महात्मा गांधी दिल्ली के भव्य कार्यक्रमों से सैकड़ों मील दूर बंगाल के हिंसा प्रभावित इलाकों में सांप्रदायिक सद्भाव की अलख जगा रहे थे।
सत्ता हस्तांतरण और उपमहाद्वीप के विभाजन की जटिल प्रक्रिया
भारत की स्वतंत्रता अचानक हुआ कोई घटनाक्रम नहीं थी, बल्कि इसके पीछे महीनों लंबी प्रशासनिक और राजनीतिक तैयारी शामिल थी। 20 फरवरी 1947 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने इस बात की आधिकारिक घोषणा की थी कि ब्रिटेन जल्द ही भारत में अपना शासन समाप्त कर देगा। इसके बाद 3 जून को वायसराय लॉर्ड लुइस माउंटबेटन ने सत्ता के हस्तांतरण और देश के विभाजन की विस्तृत रूपरेखा देश के सामने रखी। माउंटबेटन को विशेष रूप से इसी कार्य निष्पादन के लिए भारत भेजा गया था।
ब्रिटिश हुकूमत ने माउंटबेटन को केवल शासन की चाबी सौंपने की जिम्मेदारी नहीं दी थी, बल्कि उनके कंधों पर पूरे भारतीय उपमहाद्वीप को दो अलग राष्ट्रों में विभाजित करने का चुनौतीपूर्ण कार्य भी था। भारत और पाकिस्तान के बीच सेना की टुकड़ियों, सिविल सेवा के अधिकारियों, रेलवे तंत्र, पुलिस बल, डाक नेटवर्क तथा सरकारी संपत्तियों का बंटवारा किया जाना था। यहां तक कि दफ्तरों की कुर्सियों, मेजों और टाइपराइटरों तक का विस्तृत ब्योरा तैयार किया गया था। माउंटबेटन की कार्यमेज पर एक विशेष कैलेंडर रखा हुआ था, जो बीते तीन महीनों के प्रत्येक दिन और उस दौरान पूरी की गई विभाजन प्रक्रिया का हिसाब रखता था।
नियति से मिलन का भाषण और खाली लिफाफे की घटना
14 और 15 अगस्त 1947 की दरम्यानी रात संसद के केंद्रीय कक्ष में वह पल आया, जिसका इंतजार देशवासी दशकों से कर रहे थे। जवाहरलाल नेहरू ने अपने प्रसिद्ध भाषण में कहा कि वर्षों पहले हमने नियति के साथ एक वादा किया था और अब उस वादे को पूरा करने का समय आ गया है। यह उद्बोधन लाखों स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग, जेल यातनाओं और बलिदानों का औपचारिक परिणाम था।
भाषण समाप्त होने के बाद नेहरू तुरंत वायसराय पैलेस पहुंचे, जिसे वर्तमान में राष्ट्रपति भवन के नाम से जाना जाता है। वहां उन्होंने माउंटबेटन को स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर-जनरल का पद संभालने का औपचारिक आमंत्रण पत्र सौंपा। इसी दौरान एक अनूठी घटना भी घटित हुई। नेहरू ने माउंटबेटन को एक सीलबंद लिफाफा प्रदान किया, जिसके विषय में यह माना जा रहा था कि उसमें भारत की पहली मंत्रिपरिषद के मंत्रियों की सूची शामिल है। परंतु बाद में जब लिफाफा खोला गया तो पता चला कि हड़बड़ी और व्यस्तता के कारण वह लिफाफा बिना सूची रखे ही सील कर दिया गया था।
15 अगस्त की तारीख का सैन्य महत्व
स्वतंत्रता की इस तिथि को लेकर तत्कालीन समय में कई ज्योतिषियों ने अपनी चिंताएं व्यक्त की थीं और इसे शुभ नहीं माना था। लेकिन माउंटबेटन के लिए यह तारीख अत्यधिक व्यक्तिगत और सामरिक महत्व रखती थी। ठीक दो वर्ष पूर्व 15 अगस्त 1945 के दिन द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान की सेना ने मित्र राष्ट्रों के सामने पूर्ण आत्मसमर्पण किया था।
उस समय माउंटबेटन दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र में मित्र राष्ट्रों के सुप्रीम कमांडर पद पर तैनात थे। जापानी आत्मसमर्पण के साथ ही विश्व युद्ध का अंत हुआ था, जिसे इतिहास में 'विक्ट्री ओवर जापान डे' अथवा V-J Day के नाम से दर्ज किया गया। यही कारण था कि माउंटबेटन ने भारत की आजादी के लिए इस विशेष दिन का चयन किया, ताकि उनके सैन्य जीवन का यह ऐतिहासिक दिन भारत के इतिहास से भी जुड़ जाए।
पाकिस्तान का स्वतंत्रता दिवस 14 अगस्त को क्यों मनाया जाता है?
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 को ब्रिटिश संसद द्वारा 18 जुलाई 1947 के दिन मंजूरी दी गई थी। इस कानूनी दस्तावेज में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया था कि 15 अगस्त 1947 को भारत और पाकिस्तान नामक दो स्वतंत्र डोमिनियन अस्तित्व में आएंगे। कानून के अनुसार दोनों देशों के निर्माण की संवैधानिक तिथि 15 अगस्त ही थी।
पाकिस्तान द्वारा 14 अगस्त को अपना स्वतंत्रता दिवस चुने जाने के पीछे एक व्यावहारिक प्रशासनिक कारण था। लॉर्ड माउंटबेटन को कराची में आयोजित सत्ता हस्तांतरण समारोह में भाग लेने के उपरांत नई दिल्ली के मध्यरात्रि समारोह में सम्मिलित होना था। यात्रा कार्यक्रम और समय प्रबंधन को सुचारू बनाए रखने के लिए कराची में सत्ता हस्तांतरण का औपचारिक कार्यक्रम 14 अगस्त को ही आयोजित कर लिया गया, जिसके बाद से पाकिस्तान इस दिन को अपने स्वाधीनता दिवस के रूप में मनाता आ रहा है।
नोआखाली में महात्मा गांधी का शांति प्रयास
जब दिल्ली में देश के तमाम शीर्ष नेता और नागरिक आजादी की खुशी में शामिल थे, तब महात्मा गांधी बंगाल के नोआखाली जिले में पदयात्रा कर रहे थे। सांप्रदायिक दंगों से आहत गांधी नंगे पैर गांव-गांव जाकर पीड़ित लोगों के बीच विश्वास बहाल करने का प्रयास कर रहे थे। एक गांव में उन्होंने हिंदू और मुस्लिम समुदायों से अपनी झोपड़ियों से बाहर आकर सामूहिक प्रार्थना करने की अपील की, परंतु भय के कारण कोई भी ग्रामीण बाहर नहीं निकला।
काफी देर प्रतीक्षा करने के बाद गांधी जी की नजर गेंद से खेल रहे कुछ बच्चों पर पड़ी। जब वे बच्चों के समीप पहुंचे तो एक बच्चे ने उनसे कहा कि भले ही उनके माता-पिता एक-दूसरे से डरते हों, लेकिन बच्चे आपस में नहीं डरते। इसके पश्चात गांधी जी लगभग आधे घंटे तक उन बच्चों के साथ खेलते रहे। फिर उन्होंने ग्रामीणों को संबोधित करते हुए कहा कि यदि बड़े लोग शांति स्थापना का साहस नहीं दिखा सकते, तो उन्हें अपने बच्चों के आचरण से सीख लेनी चाहिए। बाद में जब गांधी दिल्ली लौटे, तब उन्होंने किंग्सवे अस्पताल से जुड़ी जानकारी प्राप्त की।





















