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मुंबई के एशियाटिक सोसायटी में बोले अमित शाह, कहा नालंदा की लाइब्रेरी जला सकते हैं लेकिन जनमानस में रचे ज्ञान को मिटाना नामुमकिनभारत
13 सित॰ 2026, 4:52 pm (12 दिन पहले)· 0

मुंबई के एशियाटिक सोसायटी में बोले अमित शाह, कहा नालंदा की लाइब्रेरी जला सकते हैं लेकिन जनमानस में रचे ज्ञान को मिटाना नामुमकिन

मुंबई में एशियाटिक सोसायटी की गणेश ज्ञानार्थी प्रदर्शनी का उद्घाटन करते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने भारतीय ज्ञान परंपरा की मजबूती पर बल दिया और कहा कि नालंदा की लाइब्रेरी भले जला दी गई हो, लेकिन स्मृति और श्रुति के माध्यम से दिलो-दिमाग में बसा ज्ञान अजर-अमर है.

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मुंबई प्रवास के दौरान ऐतिहासिक एशियाटिक सोसायटी परिसर में आयोजित गणेश ज्ञानार्थी प्रदर्शनी का भव्य उद्घाटन किया. समारोह में उपस्थित विद्वानों, शोधकर्ताओं और नागरिकों को संबोधित करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि वे इस संस्थान में केवल एक कैबिनेट मंत्री के रूप में नहीं आए हैं. वे भारत की हजारों वर्ष पुरानी बौद्धिक और सांस्कृतिक ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाने वाले आंदोलन के एक सक्रिय सहभागी के रूप में उपस्थित हुए हैं. उन्होंने उम्मीद जताई कि एशियाटिक सोसायटी आने वाले समय में देश भर में भारतीय ज्ञान परंपरा का प्रसार करने वाला एक मजबूत माध्यम बनेगी.

संस्कृति, भाषा और ऐतिहासिक धरोहर की रक्षा का महत्व

गृह मंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि अपनी भाषा, संस्कृति, स्मृतियों, इतिहास, संस्कारों और परंपराओं की रक्षा न कर पाने वाले राष्ट्र की शक्ति चाहे जितनी भी हो, उसका अस्तित्व मिटने में अधिक समय नहीं लगता. इसके विपरीत, जो देश विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी भाषाई शुद्धता, व्याकरण, ऐतिहासिक अभिलेखों और सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा करता है, उसे लंबे समय तक विदेशी शासन के अधीन रखकर भी स्थायी रूप से गुलाम नहीं बनाया जा सकता. भारत की ऐतिहासिक यात्रा इस जीवंत उदाहरण को पूरी दुनिया के सामने प्रस्तुत करती है.

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देश की ज्ञान परंपरा पर हुए अतीत के हमलों की चर्चा करते हुए उन्होंने नालंदा का विशेष उल्लेख किया. उन्होंने कहा, "नालंदा का पुस्तकालय जला सकते हैं, लेकिन स्मृति और श्रुति से जो लोगों के चित में बसा है, उस ज्ञान को कोई समाप्त नहीं कर सकता." सदियों तक संपूर्ण विश्व का मार्गदर्शन करने वाले इस ओजस्वी ज्ञान को नष्ट करने के अनेक प्रयास किए गए, लेकिन भारतीय जनमानस के भीतर गहराई से समाए इस विचार प्रवाह को कोई भी मिटा नहीं सका.

पराजय में धैर्य और विजय में समावेशी भारतीय संस्कार

भारतीय सभ्यता के मौलिक दर्शन को रेखांकित करते हुए गृह मंत्री ने कहा कि भारत की संस्कृति हमें कठिन समय में धैर्य बनाए रखने की सीख देती है. जब भारतीय समाज पराजित होता है, तो वह पूरे संयम के साथ नए संकल्पों के साथ आगे बढ़ता है. वहीं जब भारत को विजय प्राप्त होती है, तो वह पराजित पक्ष की स्मृतियों या पहचान को मिटाने का काम नहीं करता. इसके बजाय, वह उन सभी अनुभवों और स्मृतियों को बिना नष्ट किए अपनी व्यापक सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा बनाने का प्रयास करता है.

विचारधाराओं से मुक्त ज्ञान और सत्ता-ज्ञान का अलगाव

एशियाटिक सोसायटी की भूमिका और उसमें आवश्यक बदलावों पर चर्चा करते हुए अमित शाह ने कहा कि सच्चा ज्ञान कभी किसी एक विचारधारा का बंधक नहीं हो सकता. ज्ञान स्वयं में एक स्वतंत्र विचारधारा है और जब भी इसे किसी सीमित ढांचे में बांधने की कोशिश की जाती है, तो उसके मूल मायने बदल जाते हैं. ज्ञान को पूरी तरह मुक्त और उन्मुक्त वातावरण मिलना चाहिए. उन्होंने कहा कि एशियाटिक सोसायटी में मौजूद विशाल ज्ञान संपदा का उपयोग अब एक महान भारत के निर्माण और विश्व कल्याण के लिए किया जाना चाहिए.

उन्होंने कहा कि ब्रिटिश काल में औपनिवेशिक शासकों ने ज्ञान और राजसत्ता को एक सूत्र में पिरोकर अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल किया था. अब समय आ गया है कि सत्ता को ज्ञान के नियंत्रण से अलग कर ज्ञान आधारित शासन व्यवस्था का निर्माण किया जाए. एशियाटिक सोसायटी को एक ऐसी कार्यप्रणाली विकसित करनी चाहिए, जिससे देश का संचालन सच्चे ज्ञान के आधार पर हो सके.

'इंडोलॉजी' की औपनिवेशिक धारणा का विश्लेषण

संबोधन के दौरान गृह मंत्री ने 'इंडोलॉजी' (भारतीय विद्या) शब्द के ऐतिहासिक संदर्भों पर विस्तृत विचार व्यक्त किए. उन्होंने कहा कि एशियाटिक सोसायटी की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझने के लिए इंडोलॉजी को सही संदर्भ में समझना आवश्यक है. औपनिवेशिक दौर में सिक्का-विज्ञान (न्यूमिजमैटिक्स), अभिलेख-शास्त्र (एपिक्स), मानव-विज्ञान (एंथ्रोपोलॉजी), इतिहास, पुरातत्व, भाषा-विज्ञान, दर्शनशास्त्र, साहित्य, धर्मशास्त्र और व्याकरण जैसे विविध विषयों के समागम से इंडोलॉजी का ढांचा तैयार किया गया था.

उन्होंने स्पष्ट किया कि अंग्रेजों द्वारा निर्मित इस अध्ययन पद्धति का उद्देश्य विश्व या ब्रह्मांड का कल्याण करना नहीं था, जबकि भारतीय ज्ञान परंपरा का मूल ध्येय हमेशा से प्राणीमात्र का हित रहा है. अंग्रेजों द्वारा इंडोलॉजी को बढ़ावा देने का मुख्य मकसद भारत की स्थानीय सामाजिक व्यवस्थाओं और शासन प्रणालियों को गहराई से समझना था, ताकि वे यहां के लोगों पर लंबे समय तक अपना औपनिवेशिक शासन बनाए रख सकें.

एशियाटिक सोसायटी के पुनरुद्धार के लिए तीन प्रमुख सुझाव

गृह मंत्री ने एशियाटिक सोसायटी के ज्ञान के संपूर्ण विस्तार के लिए तीन स्पष्ट दिशा-निर्देश प्रस्तुत किए

  • विद्वानों का समागम: ज्ञान के दायरे को व्यापक बनाने वाले प्रख्यात शोधकर्ताओं और विद्वानों को संस्थान से जोड़ा जाना चाहिए.
  • डिजिटल नेटवर्क का निर्माण: आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों का उपयोग करके देश की प्रमुख लाइब्रेरियों को आपस में डिजिटल रूप से कनेक्ट किया जाना चाहिए.
  • पांडुलिपियों का संरक्षण: महाराष्ट्र के गांव-गांव में मौजूद दुर्लभ पांडुलिपियों को सुरक्षित किया जाए और 'भारतम पांडुलिपि' पहल के जरिए उनके शोध और ज्ञान को देश के सामने लाया जाए.

सवाल-जवाब

गृह मंत्री अमित शाह मुंबई में किस कार्यक्रम में शामिल हुए थे?
गृह मंत्री अमित शाह मुंबई दौरे के दौरान एशियाटिक सोसायटी में आयोजित गणेश ज्ञानार्थी प्रदर्शनी के उद्घाटन समारोह में शामिल हुए थे.
अमित शाह ने नालंदा पुस्तकालय का उदाहरण क्यों दिया?
उन्होंने यह समझाने के लिए नालंदा का जिक्र किया कि भले ही आक्रमणकारियों ने पुस्तकालय की भौतिक किताबों को जला दिया, लेकिन लोगों के चित्त में बसी श्रुति और स्मृति परंपरा के ज्ञान को कभी खत्म नहीं किया जा सका.
औपनिवेशिक दौर की 'इंडोलॉजी' पर गृह मंत्री ने क्या विचार व्यक्त किए?
उन्होंने कहा कि औपनिवेशिक दौर में इंडोलॉजी का मकसद विश्व कल्याण नहीं बल्कि भारतीय व्यवस्थाओं को समझकर यहां के लोगों पर लंबे समय तक शासन करना था.
एशियाटिक सोसायटी के भविष्य के लिए गृह मंत्री ने कौन से तीन प्रमुख सुझाव दिए?
उन्होंने विद्वानों को संस्था से जोड़ने, देश भर की लाइब्रेरी को डिजिटल रूप से आपस में कनेक्ट करने और 'भारतम पांडुलिपि' के माध्यम से महाराष्ट्र के गांवों की पांडुलिपियों को सहेजने का सुझाव दिया.
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