लोकतांत्रिक व्यवस्था के सुचारु संचालन और आंतरिक सुरक्षा की मजबूती के लिए देश के वास्तविक नागरिकों की स्पष्ट पहचान होना बेहद बुनियादी जरूरत है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील अंबेकर ने इस बात पर विशेष बल दिया कि जब तक यह स्पष्ट नहीं होगा कि कौन वैध नागरिक है, तब तक संसाधनों और लोकतांत्रिक अधिकारों का न्यायसंगत वितरण संभव नहीं है। उनका मानना है कि जनसंख्या के अनुपात में आने वाला नकारात्मक असंतुलन देश की संप्रभुता के लिए गंभीर चुनौतियां खड़ी करता है, इसलिए देशव्यापी स्तर पर नागरिकता सत्यापन की रूपरेखा तैयार की जानी चाहिए।
जनसांख्यिकीय बदलाव और विभाजन के ऐतिहासिक सबक
आबादी के संतुलन पर चर्चा करते हुए सुनील अंबेकर ने ऐतिहासिक घटनाओं का स्मरण कराया। उन्होंने उल्लेख किया कि 1947 में देश का जो दुखद विभाजन हुआ था, उसकी मुख्य वजहों में असंतुलित जनसांख्यिकी भी एक बड़ा कारण थी। उनका तर्क है कि यदि किसी भूभाग पर जनसांख्यिकी का ताना-बाना बिगड़ता है, तो उसका सीधा असर राष्ट्रीय सुरक्षा, आपसी सद्भाव और भौगोलिक अखंडता पर पड़ता है।
नागरिकता के निर्धारण पर बात करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार इस सत्यापन कार्य को पूरा करने के लिए विभिन्न वैधानिक तंत्र अपना सकती है। असली उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि देश की एकता पर कोई आंच न आए। जो लोग विदेशी हैं अथवा बाहर से आना चाहते हैं, उनके लिए वैध आव्रजन के नियम बने हुए हैं। वैधानिक रास्तों से आने वाले लोग देश की प्रगति और विकास कार्यों में अपना योगदान दे सकते हैं, परंतु अवैध तरीकों से आकर नागरिक अधिकारों का दावा करना किसी भी संप्रभु राष्ट्र के हित में नहीं है।
धार्मिक विविधता बनाम राष्ट्रीय पहचान
नागरिक रजिस्टर और जनसांख्यिकी की इस बहस को किसी मजहबी चश्मे से देखे जाने का खंडन करते हुए प्रचार प्रमुख ने कहा कि संगठन की यह चिंता किसी खास समुदाय या पंथ के विरोध पर आधारित नहीं है। हर व्यक्ति को अपनी आस्था चुनने, किसी भी देवी-देवता की उपासना करने अथवा अपनी पद्धति से प्रार्थना करने की पूरी स्वतंत्रता है। हालांकि, व्यक्तिगत आस्था से ऊपर देश की सामूहिक पहचान, राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक चेतना का स्थान होना चाहिए।
उन्होंने रेखांकित किया कि दुनिया के प्रत्येक राष्ट्र की एक विशिष्ट सांस्कृतिक नींव होती है। वही सांस्कृतिक धरातल वहां के समाज को आपस में जोड़कर रखता है और देश की वास्तविक पहचान बनता है। जब नागरिक इस साझा सांस्कृतिक सूत्र से जुड़ते हैं, तभी राष्ट्र मजबूत बनता है।
वैश्विक मंच पर भारतीय जीवन दृष्टि का विस्तार
संघ प्रमुख मोहन भागवत के हालिया विदेशी दौरों का उल्लेख करते हुए सुनील अंबेकर ने बताया कि अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा की यात्राओं के दौरान भारतीय चिंतन का यही व्यापक स्वरूप दुनिया के सामने रखा गया। पूर्ववर्ती यात्राएं आमतौर पर वहां बसे भारतीय मूल के लोगों तक सीमित रहती थीं, किंतु इस बार की रणनीति में स्पष्ट बदलाव देखने को मिला।
इस नवीनतम यात्रा के दौरान संबंधित देशों के स्थानीय विचारकों, समाज के प्रभावशाली नीति-निर्माताओं और सार्वजनिक जीवन के प्रमुख व्यक्तियों से सीधा संवाद स्थापित किया गया। इस संवाद का मुख्य केंद्र बिंदु यह था कि भारत में हो रहे बुनियादी बदलावों और उसके बढ़ते वैश्विक प्रभाव से विश्व को अवगत कराया जाए। उन्होंने कहा कि आज का भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशाल संभावनाओं का एक सशक्त केंद्र बनकर उभर रहा है।
सांस्कृतिक राष्ट्र के रूप में भारत की संकल्पना
अंबेकर ने जोर दिया कि भारत को महज सीमाओं में बंधे एक आधुनिक राजनीतिक राज्य के रूप में देखना अधूरा दृष्टिकोण होगा। भारत वस्तुतः एक जीवंत सांस्कृतिक राष्ट्र है, जिसकी नींव हजारों वर्षों की निरंतर जीवन पद्धति, परंपराओं और आध्यात्मिक मूल्यों पर टिकी हुई है।
उन्होंने स्वीकार किया कि विश्व पटल पर हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्र की वैज्ञानिक एवं दार्शनिक समझ को और अधिक स्पष्टता से प्रस्तुत किए जाने की आवश्यकता है। अपनी इस बात को पुष्ट करने के लिए उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा के उदाहरण दिए। योग और ध्यान जैसी पद्धतियों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि ये सदियों पुरानी साधनाएं आज की तनावग्रस्त आधुनिक जीवनशैली में भी समूची मानवता को स्वास्थ्य और मानसिक शांति प्रदान कर रही हैं। इसी तरह, भारत की संयुक्त परिवार प्रणाली तथा प्रकृति एवं पर्यावरण के साथ मनुष्य के सह-अस्तित्व का दर्शन ऐसे तत्व हैं जो पूरी दुनिया को नई दिशा दे सकते हैं।
हिंदू राष्ट्र कोई नया राजनीतिक तंत्र नहीं
हिंदू राष्ट्र की अवधारणा पर फैले भ्रम को दूर करते हुए अंबेकर ने साफ शब्दों में कहा कि यह कोई नई शासन व्यवस्था या संविधान बदलने की योजना नहीं है। मोहन भागवत के विचारों को साझा करते हुए उन्होंने बताया कि संगठन का मकसद किसी नए राष्ट्र का निर्माण करना नहीं है, क्योंकि यह राष्ट्र सदियों से पहले से ही विद्यमान है।
अंबेकर के अनुसार, जब तक इस पावन भूमि का अंतिम व्यक्ति भी इन सांस्कृतिक परंपराओं, जीवन मूल्यों और साझी विरासत का सम्मान करता रहेगा, तब तक यह राष्ट्र जीवंत रहेगा। यह किसी राजनीतिक सत्ता की प्राप्ति का साधन नहीं, बल्कि अपनी प्राचीन सभ्यतागत स्मृति को पुनः जाग्रत करने का सतत प्रयास है। जब आमजन अपनी जड़ों और समृद्ध विरासत के प्रति जागरूक होंगे, तो उनमें स्वाभाविक रूप से आत्मगौरव का भाव पैदा होगा।
अपने दूसरे शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर रहे संगठन के आगामी लक्ष्यों के बारे में उन्होंने कहा कि इसका ध्येय मात्र संगठनात्मक ढांचे का विस्तार करना नहीं है। वास्तविक लक्ष्य देश के हर घर, हर मोहल्ले और समाज के हर तबके तक पहुंचना है, ताकि नागरिक अपने सामाजिक और राष्ट्रीय कर्तव्यों के प्रति स्वयं जागरूक और जिम्मेदार बन सकें।

















