पूर्वोत्तर राज्य असम से दक्षिण भारत के तमिलनाडु स्थित मंदिरों में पांच युवा हाथियों को ले जाने का मामला अब बड़े विवाद में बदल चुका है। देश भर के 50 से अधिक वन्यजीव और पशु कल्याण संगठनों ने इस पूरी कवायद पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। इन संस्थाओं का कहना है कि दान या उपहार की आड़ में असल में संरक्षित वन्यजीवों का गैरकानूनी लेन-देन किया गया है। पूरे मामले की तह तक जाने के लिए तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय को पत्र भेजकर एक स्वतंत्र विशेष जांच दल यानी एसआईटी अथवा उच्च स्तरीय तथ्य-खोज समिति गठित करने की पुरजोर मांग की गई है।
लंबा सफर और क्रूरता के गंभीर आरोप
विवाद के केंद्र में सितंबर महीने के दौरान स्थानांतरित किए गए पांच युवा हाथी हैं, जिनके नाम दुर्गा, रूपसिंग, शिवा, हीरालाल और बिजली हैं। इन सभी को असम से रवाना कर तमिलनाडु के अलग-अलग मंदिरों में पहुंचाया गया था। संगठनों ने 1 अक्टूबर को भेजे अपने साझा पत्र में रेखांकित किया कि लगभग 3,000 किलोमीटर की यह बेहद लंबी और थका देने वाली दूरी नौ दिनों से भी कम समय में तय कराई गई।
संरक्षण कार्यकर्ताओं का आरोप है कि इस तेज रफ्तार यात्रा में इन बेजुबानों के साथ भारी अमानवीयता बरती गई। सामने आई तस्वीरों और वीडियो फुटेज का हवाला देते हुए संगठनों ने दावा किया कि हाथियों को मोटी लोहे की जंजीरों में जकड़ा गया था। इतना ही नहीं, उनके कानों में छेद कर रस्सियां डाली गई थीं, जिनके जरिए उन्हें बेरहमी से खींचा और घसीटा गया। सफर के दौरान उन पर जबरन सवार होने और डंडों के प्रहार से उन्हें आगे हांकने के साक्ष्य भी उजागर हुए हैं।
जंगली मूल और कानूनी प्रावधानों के उल्लंघन का अंदेशा
पशु अधिकार कार्यकर्ताओं ने आशंका जताई है कि इन पांचों हाथियों को सीधे जंगलों से अवैध रूप से पकड़ा गया हो सकता है। यदि यह सच साबित होता है, तो यह वन्यजीव संरक्षण कानून 1972 की अनुसूची 1 का खुला उल्लंघन है। यह केंद्रीय कानून हाथियों के किसी भी तरह के वाणिज्यिक व्यापार और अनाधिकृत धरपकड़ पर पूर्ण प्रतिबंध लगाता है।
इसके साथ ही, तमिलनाडु कैप्टिव एलिफेंट्स (मैनेजमेंट एंड मेंटेनेंस) रूल्स 2011 के प्रावधानों की अनदेखी का मामला भी सामने आया है। संगठनों ने प्रशासन से अपील की है कि वे इन हाथियों के धार्मिक अनुष्ठानों, जुलूसों या किसी भी प्रकार के शारीरिक श्रम में इस्तेमाल पर तुरंत रोक लगाएं और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करें। इस बीच ऐसी जानकारियां भी सामने आई हैं कि असम से छह और युवा हाथियों को तमिलनाडु के मंदिरों में भेजने की तैयारी चल रही है, जिससे वन्यजीव प्रेमियों की चिंताएं और गहरी हो गई हैं।
केंद्रीय मंत्री से हस्तक्षेप और रोक लगाने की गुहार
इस मसले को लेकर केंद्र सरकार के स्तर पर भी आवाज उठाई गई है। सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनिमल राइट्स के संस्थापक आलोक हिसारवाला गुप्ता ने 5 अक्टूबर को केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव को एक अलग पत्र लिखा। उन्होंने मांग की कि पूर्वोत्तर के राज्यों से हाथियों के किसी भी तरह के अंतरराज्यीय स्थानांतरण पर तत्काल प्रभाव से पूर्ण रोक लगाई जाए। गुप्ता ने इन हाथियों की वास्तविक उत्पत्ति, मूल निवास और इनके महंगे परिवहन के लिए जुटाए गए धन के स्रोतों की स्वतंत्र जांच कराने का आग्रह किया है। हालांकि, अब तक इस पत्र पर किसी आधिकारिक कार्रवाई की जानकारी नहीं मिली है।
राजनीतिक गलियारों में भी उठे सवाल
यह मामला केवल पशु प्रेमियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक स्तर पर भी गरमा गया है। असम प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और लोकसभा सांसद गौरव गोगोई ने इस स्थानांतरण को लेकर राज्य सरकार से विस्तृत ब्योरा मांगा है। गोगोई ने सवाल उठाया है कि इन पांचों हाथियों की कानूनी मिल्कियत किसके पास थी, उन्हें कहां से लाया गया, यात्रा के लिए किन सक्षम अधिकारियों से मंजूरियां ली गईं और रास्ते में उनके स्वास्थ्य व देखभाल के क्या ठोस इंतजाम किए गए थे।



















