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पैकेज्ड फूड पर चेतावनी लेबल में देरी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, एफएसएसएआई और केंद्र सरकार से दो हफ्ते में मांगा अंतिम जवाबभारत
14 अग॰ 2026, 9:30 am (3 दिन पहले)· 3

पैकेज्ड फूड पर चेतावनी लेबल में देरी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, एफएसएसएआई और केंद्र सरकार से दो हफ्ते में मांगा अंतिम जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने पैकेज्ड फूड पर फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबल लागू करने में हो रही देरी पर केंद्र सरकार और एफएसएसएआई को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने बच्चों की सेहत पर गहरी चिंता जताते हुए अंतिम निर्णय रिकॉर्ड पर रखने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है।

भारत में पैकेज्ड खाद्य पदार्थों में चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट की अत्यधिक मात्रा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। पैकेज्ड फूड के फ्रंट पर स्पष्ट चेतावनी लेबल लगाने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) और केंद्र सरकार को तीखी फटकार लगाई। अदालत ने बच्चों में अस्वास्थ्यकर खानपान की बढ़ती आदत और इससे स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों पर गहरी चिंता जताई। पीठ ने कहा कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के मामले में किसी भी तरह की ढिलाई स्वीकार नहीं की जाएगी और सरकार तथा नियामक संस्था को अपनी अंतिम नीति स्पष्ट करने के लिए 14 दिनों की मोहलत दी।

बच्चों की सेहत और पैकेज्ड स्नेक्स की बढ़ती पहुंच पर अदालत की चिंता

अदालत की सुनवाई के दौरान देश में बच्चों के खानपान के विकल्पों पर गंभीर चर्चा हुई। आज के दौर में आम परिवारों के लिए महंगे सूखे मेवे नियमित रूप से खरीद पाना कठिन है, जबकि चिप्स, नमकीन और तरह-तरह के पैकेज्ड स्नैक्स हर छोटी-बड़ी दुकान पर आसानी से उपलब्ध हैं। यही वजह है कि बच्चे इन पैकेटबंद खाद्य पदार्थों की तरफ तेजी से आकर्षित हो रहे हैं। पीठ ने टिप्पणी की कि जब छोटे बच्चे इन चीजों के आदी हो रहे हैं, तो अभिभावकों और उपभोक्ताओं को यह जानने का पूरा अधिकार है कि पैकेट के अंदर क्या है। अगर किसी उत्पाद में चीनी, वसा या नमक की मात्रा तय सीमा से अधिक है, तो उसकी जानकारी पैकेट के सामने साफ शब्दों में दिखाई देनी चाहिए ताकि लोग खरीदारी के वक्त सही फैसला ले सकें।

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जस्टिस पारदीवाला की सख्त टिप्पणी: क्या जनस्वास्थ्य प्राथमिकता नहीं है?

सुनवाई के दौरान जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने सरकार और नियामक संस्था के सुस्त रवैये पर भारी नाराजगी जताई। जस्टिस पारदीवाला ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल बृजेंद्र चहार से तीखे सवाल करते हुए पूछा कि क्या सरकार देश के नागरिकों और खास तौर पर बढ़ते बच्चों को स्वस्थ नहीं देखना चाहती? उन्होंने स्पष्ट किया कि यह याचिका पूरी तरह से जनहित से जुड़ी है और अदालत इसे बेहद गंभीरता से ले रही है। पीठ ने सरकार से पूछा कि क्या नियामक संस्था पर किसी प्रकार का दबाव है या वह स्वयं आदेश का पालन करेगी, अन्यथा अदालत को अपनी ओर से सख्त दिशा-निर्देश जारी करने पड़ेंगे।

पारंपरिक खाद्य उद्योग का तर्क और एफएसएसएआई की दलीलें

सरकार की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल बृजेंद्र चहार ने अदालत में उद्योग जगत की व्यावहारिक कठिनाइयों को सामने रखा। उन्होंने दलील दी कि देश में लगभग एक-तिहाई व्यापारिक उद्यम पारंपरिक खाद्य पदार्थों से जुड़े हुए हैं। अगर चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट के कड़े मापदंडों के आधार पर पैकेट के सामने चेतावनी लेबल लगाना अनिवार्य किया गया, तो नमकीन जैसे पारंपरिक भारतीय स्नैक्स भी अनहेल्दी या अस्वास्थ्यकर श्रेणी में आ जाएंगे। इससे इस व्यापक कुटीर और लघु उद्योग पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि व्यावसायिक हितों के कारण आम जनता और बच्चों के स्वास्थ्य के मानकों से समझौता नहीं किया जा सकता।

केरल के एनजीओ की याचिका और वैश्विक मानकों की आवश्यकता

यह पूरा मामला केरल स्थित गैर-सरकारी संगठन 3S एंड आवर हेल्थ सोसाइटी द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता का कहना है कि भारत में मिलने वाले पैकेज्ड फूड पर पोषण संबंधी जानकारी इतनी जटिल या छोटे अक्षरों में लिखी होती है कि आम उपभोक्ता उसे समझ नहीं पाता। इसलिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनाई जाने वाली फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग प्रणाली को भारत में भी लागू किया जाना चाहिए। एफएसएसएआई ने अपने पिछले हलफनामे में स्वीकार किया था कि ऐसी चेतावनी व्यवस्था वैश्विक प्रथाओं के अनुकूल है और इससे उपभोक्ताओं को आसान भाषा में पोषण की जानकारी मिलती है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसके क्रियान्वयन की रफ्तार बेहद धीमी रही है।

दो सप्ताह का अल्टीमेटम: अवहेलना पर सुप्रीम कोर्ट खुद जारी करेगा निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर गहरा असंतोष व्यक्त किया कि लंबे समय से चल रही इस प्रक्रिया में अब तक कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है। पीठ ने केंद्र सरकार और एफएसएसएआई को अपनी अंतिम नीति और निर्णय को रिकॉर्ड पर लाने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि निर्धारित समयसीमा के भीतर नियामक और सरकार अपना रुख साफ नहीं करते हैं, तो अगली सुनवाई में शीर्ष अदालत स्वयं इस विषय पर अंतिम फैसला और बाध्यकारी दिशा-निर्देश सुना देगी।

सवाल-जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने एफएसएसएआई और केंद्र सरकार को क्यों फटकार लगाई?
पैकेज्ड फूड पर चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट की अधिकता के लिए फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबल लागू करने में हो रही देरी के कारण कोर्ट ने फटकार लगाई।
यह मामला किस याचिका से जुड़ा हुआ है?
यह मामला केरल स्थित एनजीओ 3S एंड आवर हेल्थ सोसाइटी द्वारा दायर याचिका पर आधारित है, जिसमें पैकेज्ड फूड पर स्पष्ट पोषण संबंधी चेतावनी की मांग की गई है।
सरकार ने अदालत में पारंपरिक खाद्य उद्योग के पक्ष में क्या दलील दी?
सरकार की ओर से कहा गया कि देश में करीब एक-तिहाई उद्यम पारंपरिक खाद्य पदार्थों से जुड़े हैं और सख्त नियमों से नमकीन जैसी पारंपरिक चीजें भी अस्वास्थ्यकर श्रेणी में आ सकती हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम फैसला पेश करने के लिए कितना समय दिया है?
अदालत ने केंद्र सरकार और एफएसएसएआई को अपनी अंतिम नीति और निर्णय रिकॉर्ड पर रखने के लिए दो हफ्ते का समय दिया है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Carlos Mendoza@carlos-mendoza·2 दिन पहले

यह मामला अमेरिका में ओबेसिटी महामारी और एफडीए (FDA) द्वारा खाद्य सुरक्षा और स्पष्ट लेबलिंग के लिए कड़े नियम लागू करने की बहसों जैसा ही है। जब सुप्रीम कोर्ट जनस्वास्थ्य और बच्चों की आदतों को लेकर नियामक संस्थाओं पर इस तरह दबाव बनाता है, तो यह वैश्विक स्तर पर खाद्य उद्योग के कॉरपोरेट लॉबिंग और प्रशासनिक इच्छाशक्ति के बीच चल रहे संघर्ष को उजागर करता है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि अदालत की यह दो हफ्ते की समयसीमा नीतिगत बदलाव लाती है या नीति निर्माताओं को कोई नया कानूनी रास्ता ढूंढना पड़ता है।

Ravikash Gupta@ravikash·2 दिन पहले

सर्वोच्च न्यायालय की यह सख्ती दर्शाती है कि जनस्वास्थ्य और नियामक अनुपालन अब कॉर्पोरेट और लघु उद्योग के दबाव से ऊपर रखे जा रहे हैं। यदि एफएसएसएआई दो सप्ताह में फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग पर कड़ा रुख स्पष्ट करता है, तो इससे देश के एफएमसीजी और पैकेज्ड फूड सेक्टर में बड़ा बदलाव आ सकता है। निवेशकों और कंपनियों को अपनी उत्पाद श्रृंखला और पोषण संबंधी मापदंडों में तत्काल सुधार करना होगा, क्योंकि आने वाले समय में बाजार में पारदर्शिता और उपभोक्ता अधिकारों की अनदेखी भारी पड़ सकती है।

Michael Anderson@michael-anderson·2 दिन पहले

यह न्यायिक सख्ती अमेरिकी खाद्य और दवा नियामक नीतियों की याद दिलाती है, जहाँ बच्चों के स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए चेतावनी लेबल को अनिवार्य किया गया है। भारत में भी यदि दो सप्ताह की इस मोहलत के बाद कड़े नियम लागू होते हैं, तो यह वैश्विक खाद्य निगमों और घरेलू एफएमसीजी कंपनियों के लिए अपने पोषण मानकों में बड़े बदलाव का एक निर्णायक मोड़ साबित होगा।

Karan Malhotra@karan-malhotra·2 दिन पहले

अदालत की यह सख्ती दिखाती है कि जनस्वास्थ्य और नियामक तंत्र की विफलता अब न्यायपालिका के सीधे दायरे में आ चुकी है। कानूनी और नीतिगत मोर्चे पर, एफएसएसएआई और केंद्र सरकार के लिए दो हफ्ते का यह अल्टीमेटम केवल एक डेडलाइन नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने का बड़ा मोड़ है। यदि सरकार इस अवधि में स्पष्ट हलफनामा नहीं देती है, तो न्यायालय स्वतः संज्ञान लेते हुए सीधे कड़े दिशा-निर्देश या नीतिगत आदेश जारी कर सकता है, जिसका असर पूरे खाद्य उद्योग पर पड़ेगा।

Arjun Mehta@arjun-mehta·2 दिन पहले

यह स्पष्ट है कि यह मामला केवल खाद्य लेबलिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नीति निर्माण में उद्योग के प्रभाव और लोक स्वास्थ्य की प्राथमिकताओं के बीच के टकराव को उजागर करता है। दो सप्ताह का यह समय यह तय करेगा कि कार्यपालिका जनस्वास्थ्य को प्राथमिकता देती है या व्यावसायिक दबावों के आगे झुकती है। यदि अदालत को हस्तक्षेप करना पड़ा, तो यह सरकार की नीतिगत विफलता का स्पष्ट प्रमाण होगा, जिसका प्रभाव आगामी विधायी और प्रशासनिक दृष्टिकोण पर भी पड़ेगा।

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