भारत के इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम को लेकर विवाद अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। देश ने 2025 में ही पेट्रोल में 20% इथेनॉल मिलाने का लक्ष्य हासिल कर लिया, जो तय समय से पांच साल पहले था, और 1 अप्रैल से देशभर में तेल कंपनियां E20 पेट्रोल बेच रही हैं। अब सरकार 2030 तक इसे बढ़ाकर 30% तक ले जाना चाहती है। लेकिन इस बीच यह बहस तेज हो गई है कि इसका असर गाड़ियों, आम लोगों की जेब और उस फैसले पर कितना पड़ रहा है जिसे बिना खुली चर्चा के लागू किया गया, वहीं कई लोग इस मामले में ब्राजील के लंबे इथेनॉल अनुभव को मिसाल के तौर पर पेश कर रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई और 'प्रयोग' वाले शब्द पर घमासान
मंगलवार को सुनवाई के दौरान सरकार की तरफ से सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि पेट्रोल में 20% इथेनॉल मिलाने का कार्यक्रम अभी भी एक चल रहा प्रयोग है और अगले साल तक इसका असली असर साफ हो जाएगा। लेकिन बाद में कानून और न्याय मंत्रालय ने इन खबरों को खारिज कर दिया और कहा कि सरकार ने अदालत के सामने E20 कार्यक्रम को 'प्रयोग' नहीं बताया था, और इससे उलट कोई भी बात सरकार की तरफ से दिए गए बयानों को सही तरीके से नहीं दिखाती।
यह पूरा मामला भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड यानी बीपीसीएल की एक याचिका से जुड़ा है, जिसमें कर्नाटक हाईकोर्ट के एक आदेश को चुनौती दी गई थी। यह आदेश 2025-26 सप्लाई ईयर के लिए इथेनॉल आवंटन से जुड़ा था। 23 जून के अपने आदेश में हाईकोर्ट ने तेल विपणन कंपनियों यानी बीपीसीएल, हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड और इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन को निर्देश दिया था कि टेंडर प्रक्रिया पूरी होने से पहले एक डिस्टिलरी की उस मांग पर विचार करें जिसमें उसने अपना इथेनॉल आवंटन बढ़ाने की गुजारिश की थी। बीपीसीएल ने अदालत को बताया कि इस आदेश का असर सरकार के 20% इथेनॉल मिश्रण लक्ष्य पर व्यापक स्तर पर पड़ सकता है।
केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने कहा कि इथेनॉल आवंटन की पूरी प्रक्रिया अक्टूबर 2025 में ही पूरी हो चुकी है और सप्लाई कॉन्ट्रैक्ट भी फाइनल हो गए हैं, और अगर किसी एक आवंटन को दोबारा खोला गया तो इससे पूरे राष्ट्रीय कार्यक्रम में गड़बड़ी आ सकती है। उन्होंने कहा, "इथेनॉल सप्लाई कॉन्ट्रैक्ट अक्टूबर 2025 में ही फाइनल हो चुके हैं। ऐसी याचिकाएं कई हाईकोर्ट में लंबित हैं। इसका असर राष्ट्रीय नीति पर पड़ेगा।" उन्होंने आगे कहा, "सरकार 20% इथेनॉल मिश्रण के साथ प्रयोग करने की कोशिश कर रही है। इसके नतीजे अगले साल तक हमारे पास होंगे।"
वेंकटरमणी ने दलील दी कि अगर एक सप्लायर के आवंटन में बदलाव की इजाजत दी गई तो इससे बाकी कंपनियां भी ऐसी ही मांग उठाने लगेंगी, जिससे कई मुकदमे खड़े हो जाएंगे और पूरी सप्लाई चेन प्रभावित होगी। उन्होंने बताया कि बीपीसीएल, जो इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल कार्यक्रम का समन्वय करती है, को टेंडर प्रक्रिया के बाद करीब 1,759 करोड़ लीटर की कुल सप्लाई ऑफर मिली हैं। उन्होंने ट्रांसफर पिटीशन दाखिल करने की इजाजत मांगी और कहा कि यह मामला अक्टूबर से पहले सुलझाना जरूरी है, क्योंकि उसी महीने इथेनॉल सप्लाई कॉन्ट्रैक्ट रिन्यूअल के लिए आने वाले हैं। उन्होंने कहा, "अगर मैं डिविजन बेंच के पास जाता हूं और फिर दूसरे हाईकोर्ट भी जाना पड़े, तो इसमें देरी हो जाएगी।" सुनवाई के तुरंत बाद अटॉर्नी जनरल ने साफ किया कि "20% इथेनॉल का मिश्रण एक नीतिगत फैसला है जिसके बदलने की संभावना नहीं है" और "कंपनियों को कितना इथेनॉल उपलब्ध कराया जाता है, यह मांग और दूसरे कारकों के आधार पर ऊपर-नीचे हो सकता है।"
बोनट के नीचे असल में क्या हो रहा है
केंद्रीय मंत्री गडकरी का यह बयान कि "दुनिया में कहीं भी किसी गाड़ी को E20 से दिक्कत नहीं हुई है", सिर्फ भ्रामक नहीं बल्कि वैज्ञानिक रूप से गलत भी है। खुद भारतीय मानक ब्यूरो यानी बीआईएस ने कहा है, "मौजूदा पेट्रोल गाड़ियां या E20 के लिए बनी गाड़ियां E20 से ऊपर के इथेनॉल मिश्रण के लिए उपयुक्त नहीं हैं। समय के साथ माइलेज घटने, परफॉर्मेंस और ड्राइविंग में दिक्कत, फ्यूल सिस्टम के पुर्जों और मटीरियल के खराब होने जैसी समस्याएं आ सकती हैं, जिससे लीकेज और दूसरी खराबियां हो सकती हैं।" पिछले 15 सालों में बिकी करीब 80% गाड़ियां मूल रूप से E5 या E10 पेट्रोल के लिए ही बनाई गई थीं, जबकि नई गाड़ियां ही E20 तक झेल पाती हैं।
इथेनॉल एक सॉल्वेंट है और नमी सोखने वाला पदार्थ भी। आपकी गाड़ी एक तय सीमा से ज्यादा इथेनॉल के लिए बनी ही नहीं है। सबसे पहले असर पड़ता है रबर सील और फ्यूल लाइन पर। सामान्य एनबीआर रबर E10 से ऊपर के इथेनॉल के संपर्क में आने पर फूल जाता है, फटने लगता है और लीक करने लगता है। E20 इस प्रक्रिया को तेज कर देता है, जिससे इसकी सामान्य 8 से 10 साल की उम्र घटकर सिर्फ 3 से 5 साल रह जाती है। अगर आपकी गाड़ी अप्रैल 2023 से पहले वाली बीएस6 फेज 1 या उससे पुरानी है, तो यह नुकसान अभी, धीरे-धीरे आपकी गाड़ी में हो रहा है।
फ्यूल पंप भी इसका शिकार बनता है। इथेनॉल में पेट्रोल के मुकाबले चिकनाहट कम होती है, और फ्यूल पंप चलते समय खुद पेट्रोल को ही लुब्रिकेंट की तरह इस्तेमाल करता है। कम चिकनाहट मतलब अंदरूनी पुर्जों की तेज घिसाई, और इसे बदलवाने का खर्च आता है 15,000 से 35,000 रुपये। फ्यूल इंजेक्टर पर भी असर पड़ता है, क्योंकि इथेनॉल का सॉल्वेंट गुण पुराने इंजेक्टरों के अंदर जमा वार्निश को उखाड़ देता है, जिससे स्प्रे नोजल बंद हो जाता है। इसकी सफाई पर 2,000 से 4,000 रुपये और हर इंजेक्टर बदलवाने पर 3,500 से 6,000 रुपये तक खर्च आ सकता है।
इंजन का ईसीयू और फ्यूल ट्रिम भी प्रभावित होते हैं। ईसीयू इथेनॉल के जलने से निकलने वाली अतिरिक्त ऑक्सीजन को पकड़ लेता है, समझ बैठता है कि मिश्रण पतला है, और फ्यूल इंजेक्शन को स्थायी रूप से बढ़ा देता है। इसे 'लॉन्ग टर्म फ्यूल ट्रिम करप्शन' कहा जाता है। अगले 6 से 12 महीनों में इंजेक्टर ज्यादा काम करते हैं, कार्बन जमा होता चला जाता है और इंजन ठीक से काम नहीं कर पाता। यह नुकसान नाटकीय नहीं, बल्कि बेहद खामोश तरीके से होता है। सिलेंडर की दीवारों और पिस्टन रिंग पर भी असर पड़ता है, क्योंकि अधूरी दहन प्रक्रिया के दौरान बिना जला इथेनॉल सिलेंडर की दीवारों से ऑयल की परत धो डालता है, जिसे 'फ्यूल डाइल्यूशन' कहते हैं। इससे पिस्टन रिंग की घिसाई 2 से 4 साल में तेज हो जाती है, और जब तक असर महसूस होता है यानी पावर घटना और तेल की खपत बढ़ना, तब तक नुकसान हो चुका होता है। इंजन ओवरहॉल का खर्च 80,000 से 1,50,000 रुपये तक पहुंच सकता है।
गडकरी यह कह पाते हैं कि "मुझे एक भी खराब गाड़ी दिखाइए", इसकी वजह यही है कि यह नुकसान धीरे-धीरे, कई पुर्जों में बंटकर और लंबे समय में होता है। कोई एक बड़ा नाटकीय हादसा नहीं होता, बस एक इंजन धीरे-धीरे बिगड़ता रहता है, जिसे वर्कशॉप वाले "सामान्य टूट-फूट" कह देते हैं।
हर बार टंकी भरवाने पर छिपी हुई लागत
इथेनॉल की ऊर्जा घनत्व पेट्रोल से करीब 30% कम होती है। मतलब जब आप 20% इथेनॉल मिला पेट्रोल खरीदते हैं, तो हर लीटर में शुद्ध पेट्रोल के मुकाबले कम ऊर्जा होती है। सभी गाड़ियों में माइलेज में 2 से 5% की गिरावट की पुष्टि हो चुकी है। मिसाल के तौर पर, अगर कोई आई20 मालिक महीने में 1,000 किलोमीटर चलाता है और उसकी गाड़ी 10 किलोमीटर प्रति लीटर देती है, तो वह महीने में 100 लीटर पेट्रोल इस्तेमाल करता है। 3% माइलेज घटने पर हर महीने 3 लीटर अतिरिक्त पेट्रोल जलता है, यानी महीने में 300 से 330 रुपये और साल में 3,600 से 4,000 रुपये अतिरिक्त खर्च, सिर्फ इथेनॉल की वजह से।
असली चौंकाने वाली बात यह है कि इथेनॉल बनाने की लागत करीब 45 से 60 रुपये प्रति लीटर आती है, जबकि पेट्रोल बनाने में सिर्फ 40 रुपये प्रति लीटर का खर्च आता है। यानी इथेनॉल बनाना पेट्रोल से महंगा है, फिर भी आपके ईंधन में मिले इथेनॉल पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क पेट्रोल की दर से वसूला जाता है, न कि इथेनॉल की 5% जीएसटी दर से। इस फर्क की कमाई सरकार की जेब में जाती है। आप पूरी पेट्रोल कीमत चुकाते हैं, जबकि मिलता है कम ऊर्जा वाला ईंधन। जब इथेनॉल मिलाया गया, तब न तो पेट्रोल के दाम घटाए गए, न ही माइलेज घटने की भरपाई का कोई प्रावधान किया गया। आपको चुपचाप उतने ही पैसों में कम मिलने लगा। इस पूरे मसले पर सीधी मांग यही है कि या तो पेट्रोल की पंप कीमत को 20% इथेनॉल के अनुपात में घटाया जाए, या फिर यूरोप की तरह पंपों पर E5 या E10 का विकल्प भी दिया जाए। इसके अलावा कुछ भी उपभोक्ता के शोषण जैसा ही है।
ऐसी नीति जिसमें जनता की राय शामिल नहीं हुई
यह नीति बिना किसी सार्वजनिक चर्चा और वाहन इंजीनियरिंग से जुड़ी स्वतंत्र संस्थाओं की समीक्षा के लागू की गई। सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स यानी सियाम ने कम्पैटिबिलिटी को लेकर औपचारिक चिंताएं जताई थीं, लेकिन उन्हें दरकिनार कर दिया गया। E20 लागू करने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर एक जनहित याचिका को राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर खारिज कर दिया गया, यानी ऐसा वर्गीकरण जिसने इस नीति को अदालत में चुनौती देने लायक ही नहीं छोड़ा।
इस पूरे मामले में आर्थिक बोझ पूरी तरह उपभोक्ता पर पड़ता है, चाहे वह कम माइलेज हो, पुर्जों की जल्दी घिसाई हो, वारंटी खत्म होना हो, या फिर बिना किसी मुआवजे के यह सब सहना हो। जबकि इसका आर्थिक फायदा इथेनॉल उत्पादकों, शुगर मिलों और तेल विपणन कंपनियों तक पहुंचता है। जब इस नीति को आगे बढ़ाने वाले मंत्री दस्तावेजी इंजीनियरिंग चिंताओं का जवाब "मुझे एक खराब गाड़ी दिखाइए" कहकर देते हैं, और आईआईटी या एआरएआई से स्वतंत्र तकनीकी अध्ययन कराने की जगह इसे टाल देते हैं, तो यह साफ बता देता है कि यहां असल में किसके हितों की रक्षा हो रही है।
इसी बीच यह भी सामने आया है कि गडकरी के छोटे बेटे सारंग को कथित तौर पर एक ऐसी कंपनी से जोड़ा गया है जिसने आलोचकों के मुताबिक "बेहद कम कीमत" पर करोड़ों की संपत्ति खरीदी। यह कहना ठीक नहीं होगा कि इसमें भ्रष्टाचार है, लेकिन जब इस नीति को आगे बढ़ाने वाले केंद्रीय मंत्री के परिवार के सदस्यों को उसी नीति से सीधा फायदा मिलता दिख रहा हो, और जब हर चिंता को "पेड लॉबी कैंपेन" कहकर खारिज कर दिया जाए, तो यह भरोसा जगाने वाली बात नहीं लगती।
परेशान उपभोक्ता के तौर पर क्या किया जा सकता है
सिर्फ ऑनलाइन शिकायत करना काफी नहीं है। असल दबाव बनाने के लिए कुछ ठोस कदम उठाए जा सकते हैं। सबसे पहला कदम है अपने सांसद से सीधा संपर्क करना। इसके लिए लोकसभा की वेबसाइट पर अपने क्षेत्र के सांसद को ढूंढा जा सकता है और उन्हें पत्र या ईमेल भेजकर E20 और E30 गाड़ियों की कम्पैटिबिलिटी को लेकर चिंता जताई जा सकती है, साथ ही संसद में इस पर सवाल उठाने की मांग की जा सकती है। सांसदों को संविधान से यह अधिकार मिला है कि वे संसद में सवाल पूछ सकें, इसलिए उन्हें इस अधिकार का इस्तेमाल करने के लिए कहा जाना चाहिए, ताकि मंत्री को सदन के भीतर जवाब देना पड़े, न कि प्रेस बयानों में जहां वे बिना चुनौती के "मुझे एक खराब गाड़ी दिखाइए" जैसी बात कहकर निकल जाएं।
दूसरा तरीका है आरटीआई दाखिल करना। आरटीआई ऑनलाइन के जरिए पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय से E30 गाड़ियों की कम्पैटिबिलिटी को लेकर स्वतंत्र इंजीनियरिंग मूल्यांकन रिपोर्ट मांगी जा सकती है। खासतौर पर यह पूछा जा सकता है कि किस एजेंसी ने बीएस4 और बीएस6 फेज 1 गाड़ियों पर E20 और E30 के असर की जांच की, और उसके नतीजे क्या रहे। अगर ऐसा कोई अध्ययन मौजूद ही नहीं है, तो यह अपने आप में जवाब बन जाता है।
हो सकता है इससे कुछ न बदले, क्योंकि भारत में नीतियां जनहित से नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति, औद्योगिक मुनाफे और मंत्रियों की मनमानी से तय होती हैं। और आम जनता बस इस सफर में शामिल भर रहती है, चाहे उनकी गाड़ियों का इंजन इसे झेल पाए या नहीं।
सरकार का पक्ष
इस सुनवाई से करीब एक हफ्ते पहले ही केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्रालय ने कहा था कि इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम "सुरक्षित, उपभोक्ता के अनुकूल और आर्थिक रूप से फायदेमंद" है, और इस चिंता को खारिज किया था कि E20 ईंधन से गाड़ियों का बीमा कवरेज प्रभावित हो सकता है। 24 जून के अपने बयान में मंत्रालय ने कहा कि यह दावा कि E20 ईंधन से बीमा पॉलिसी अमान्य हो सकती है, हितधारकों के साथ जांचा गया और यह गलत पाया गया। मंत्रालय ने यह भी कहा, "इथेनॉल मिश्रण दुनियाभर में स्वीकृत प्रक्रिया है और अमेरिका, ब्राजील और जापान समेत कई देशों में सफलतापूर्वक लागू की जा चुकी है।"
मंत्रालय के मुताबिक इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम की वजह से भारत ने कच्चे तेल के आयात में कमी लाकर विदेशी मुद्रा में 1.4 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की बचत की है। मंत्रालय ने कहा, "इथेनॉल मिश्रण भारत की ऊर्जा सुरक्षा बढ़ाने, कार्बन उत्सर्जन घटाने और स्वच्छ परिवहन की दिशा में भारत के बदलाव को आगे ले जाने में अहम भूमिका निभाता है।" मंत्रालय ने दोहराया कि यह कार्यक्रम आगे भी "सुरक्षित, पारदर्शी और उपभोक्ता केंद्रित तरीके" से चलाया जाता रहेगा, जो वैज्ञानिक प्रमाणों और हितधारकों के साथ बातचीत पर आधारित होगा।













