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फुटपाथ पर चलना अब नागरिकों का मौलिक अधिकार, सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में अवैध पार्किंग और हादसों पर जताई गंभीर चिंतादिल्ली
27 जून 2026, 10:47 pm (33 दिन पहले)· 3

फुटपाथ पर चलना अब नागरिकों का मौलिक अधिकार, सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में अवैध पार्किंग और हादसों पर जताई गंभीर चिंता

सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में फुटपाथ पर चलने को नागरिकों का मौलिक अधिकार घोषित किया है। वहीं, दिल्ली के आंकड़ों के अनुसार शहर की 44 प्रतिशत सड़कों पर फुटपाथ ही नहीं हैं और 2025 में 649 पैदल यात्रियों की सड़क हादसों में जान जा चुकी है।

दिल्ली की चमचमाती और व्यस्त सड़कों पर प्रतिदिन लाखों लोग अपने गंतव्य तक पहुंचने के लिए पैदल सफर करते हैं। लेकिन इन राहगीरों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या महानगर की सड़कों पर उनके सुरक्षित चलने के लिए वाकई कोई जगह बची है? वास्तविकता यह है कि जहां पैदल यात्रियों के लिए फुटपाथ होने चाहिए थे, वहां आज बड़ी-बड़ी गाड़ियां पार्क खड़ी हैं, रेहड़ी-पटरी वालों ने डेरा जमा रखा है या फिर कई जगहों पर फुटपाथ का नामोनिशान ही मिट चुका है। ऐसे संकटपूर्ण माहौल में आम जनता अपनी जान जोखिम में डालकर मुख्य सड़कों पर वाहनों के बीच से होकर गुजरने को मजबूर है। पैदल यात्रियों के इस गंभीर संकट पर अब देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि फुटपाथों पर सुरक्षित चलना कोई सरकारी खैरात या अतिरिक्त सुविधा नहीं है, बल्कि यह देश के प्रत्येक नागरिक का एक मौलिक अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि पैदल चलने वालों का अधिकार सड़क पर दौड़ने वाले मोटर वाहनों की तुलना में कहीं अधिक महत्वपूर्ण और ऊपर है। हालांकि, इस ऐतिहासिक आदेश के बाद भी दिल्ली की जमीनी हकीकत पर सवाल बने हुए हैं कि क्या वाकई आम लोगों को उनका यह संवैधानिक अधिकार मिल पाएगा या फिर फुटपाथ इसी तरह अवैध कब्जों और पार्किंग की बलि चढ़ते रहेंगे।

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला और संवैधानिक आधार

देश की शीर्ष अदालत ने फुटपाथों पर पैदल चलने के अधिकार को नागरिकों के मूल अधिकारों की श्रेणी में रखा है। जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस ए. एस. चंदूरकर की खंडपीठ ने यह ऐतिहासिक फैसला एक मोटर दुर्घटना मुआवजे से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान सुनाया। यह मामला एक पांच वर्षीय मासूम बच्चे की सड़क दुर्घटना में हुई दुखद मौत से संबंधित था। इस मामले की बारीकियों पर गौर करते हुए अदालत ने कहा कि नागरिकों के लिए तय किए गए फुटपाथों पर बिना किसी बाधा के सुरक्षित चलने का अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(डी) के तहत देश भर में स्वतंत्र रूप से आवागमन करने की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार का ही एक अनिवार्य हिस्सा है। अदालत ने अपने फैसले में इस बात पर विशेष जोर दिया कि जब भी सड़क और फुटपाथ के उपयोग की बात आएगी, तो पैदल यात्रियों के अधिकारों को वाहनों की तुलना में हमेशा प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

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फुटपाथों पर अतिक्रमण और पेड पार्किंग का खेल

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने दिल्ली जैसे बड़े शहरों के बुनियादी ढांचे पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। आज दिल्ली के अधिकांश इलाकों में फुटपाथ या तो पूरी तरह क्षतिग्रस्त हैं, उन पर अतिक्रमण हो चुका है या वे पूरी तरह गायब हो चुके हैं। ऐसी स्थिति में राहगीरों के लिए बेहद सीमित जगह बची है। इस गंभीर स्थिति पर बात करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक के. सिंह ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट का यह हालिया निर्णय पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित स्थानों को बहाल करने और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है। यह फैसला सरकारी और प्रशासनिक अधिकारियों को उनके संवैधानिक कर्तव्यों की याद दिलाता है और उन पर इस स्थिति को सुधारने की जिम्मेदारी तय करता है।

अशोक के. सिंह ने एक इंटरव्यू में अपनी बात रखते हुए कहा कि कोर्ट के इस आदेश से आम जनता के बीच पैदल चलने वालों के अधिकारों को लेकर बड़े पैमाने पर जागरूकता बढ़ेगी। इससे प्रशासन पर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई को तेजी से और कड़ाई से लागू करने का दबाव बढ़ेगा। साथ ही, यह स्पष्ट संदेश जाएगा कि सार्वजनिक स्थलों को सुरक्षित रखना और नागरिकों के लिए सुगम आवागमन सुनिश्चित करना पूरी तरह से सरकारी एजेंसियों का संवैधानिक दायित्व है। उन्होंने दिल्ली के मौजूदा हालातों पर चिंता व्यक्त करते हुए आरोप लगाया कि यह समस्या मुख्य रूप से दिल्ली नगर निगम यानी दिल्ली नगर निगम के क्षेत्रों और नयी दिल्ली नगरपालिका परिषद के क्षेत्रों में बहुत अधिक विकट रूप ले चुकी है। उनके अनुसार, दिल्ली के कई प्रमुख इलाकों में MCD और NDMC दोनों ने ही फुटपाथों को पार्किंग स्थलों में तब्दील कर दिया है। इन फुटपाथों पर गाड़ियां कतारबद्ध तरीके से खड़ी कर दी जाती हैं, जिससे पैदल चलने वाले लोगों के लिए गुजरने का कोई रास्ता नहीं बचता।

फुटपाथों को किराए पर देने का आरोप और चालान के आंकड़े

दिल्ली में फुटपाथों की स्थिति केवल अवैध पार्किंग तक ही सीमित नहीं है, बल्कि आरोप तो यहां तक हैं कि इन्हें व्यवस्थित तरीके से व्यावसायिक रूप दे दिया गया है। वरिष्ठ अधिवक्ता ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि ऐसा लगता है मानो इन फुटपाथों को पार्किंग के कारोबार के लिए बकायदा पट्टे पर दे दिया गया है। यदि आप दिल्ली की किसी भी सड़क किनारे फुटपाथ पर अपनी गाड़ी रोकते हैं, तो कुछ ही पलों में कोई व्यक्ति आपके पास आएगा और आपके हाथ में पार्किंग की पर्ची थमा देगा। आश्चर्य की बात यह है कि ये पर्चियां अक्सर NDMC और अन्य संबंधित निकायों द्वारा स्वीकृत पार्किंग व्यवस्था के तहत ही जारी की जाती हैं। यानी फुटपाथों पर खड़ी गाड़ियों से मोटी पार्किंग फीस वसूलने के लिए बकायदा संचालकों को सरकारी लाइसेंस बांटे गए हैं।

सड़कों और फुटपाथों पर गलत तरीके से गाड़ियां खड़ी करने का यह मुद्दा दिल्ली की यातायात व्यवस्था के लिए एक बड़ी सिरदर्दी बन चुका है। आधिकारिक सरकारी आंकड़ों पर नजर डालें तो इस साल जनवरी से मार्च के बीच के केवल तीन महीनों के भीतर दिल्ली यातायात पुलिस ने गलत दिशा में, असुरक्षित या रास्ता अवरुद्ध करने वाली पार्किंग के खिलाफ सख्त कार्रवाई करते हुए कुल 4,30,202 चालान जारी किए। यह आंकड़ा दर्शाता है कि दिल्ली में यातायात नियमों का उल्लंघन करने का यह सबसे आम और गंभीर रूप बन चुका है, जिससे रोजाना सड़कों पर चलने वाले आम राहगीरों का जीवन प्रभावित हो रहा है।

त्रस्त जनता की आपबीती: हादसों के बीच जीने को मजबूर राहगीर

प्रशासनिक लापरवाही और फुटपाथों पर बढ़ते कब्जों का खामियाजा दिल्ली के आम निवासियों को भुगतना पड़ रहा है। दिल्ली के रहने वाले रोशन कुमार ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि इस अव्यवस्था के कारण रोजमर्रा की जिंदगी में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। सरकार ने पहले भी कई बार इस दिशा में बड़ी कार्रवाई करने के दावे किए थे, लेकिन समय बीतने के साथ यह समस्या सुलझने के बजाय और अधिक गंभीर होती दिखाई दे रही है। सड़कों पर अब लोगों के पैदल चलने के लिए रत्ती भर भी जगह नहीं बची है। रोशन कुमार ने अपने साथ हुई एक हालिया घटना का जिक्र करते हुए बताया कि कुछ ही दिन पहले जब वे अपने छोटे बच्चे के साथ सड़क किनारे टहल रहे थे, तब एक सड़क हादसे में वे दोनों बाल-बाल बचे। उन्होंने बेहद निराश होकर कहा कि पैदल चलने वालों के लिए अब कोई सुरक्षित कोना नहीं बचा है क्योंकि पूरी सार्वजनिक जगह पर अनधिकृत कब्जा हो चुका है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि आम जनता के लिए इस मनमानी और अतिक्रमण के खिलाफ आवाज उठाना या इस समस्या के समाधान के लिए सही अधिकारियों से संपर्क करना भी एक अत्यंत जटिल कार्य बन चुका है।

इसी तरह दिल्ली के एक अन्य निवासी संजय कुमार ने भी इस अव्यवस्था पर गहरा रोष व्यक्त किया। संजय कुमार का कहना है कि प्रशासन के इस लचर रवैये का सबसे ज्यादा नुकसान सिर्फ और सिर्फ सड़क पर चलने वाले आम राहगीरों को ही उठाना पड़ रहा है। फुटपाथों पर इस तरह की आधिकारिक या अनधिकृत पार्किंग की पूरी व्यवस्था ही बुनियादी रूप से गलत और जनविरोधी है। सड़कों पर वाहनों की लंबी-लंबी कतारें और फुटपाथों पर खड़ी गाड़ियां साफ तौर पर दिखाती हैं कि किस तरह बिना किसी वाजिब कारण के पैदल यात्रियों की जगह को हड़प लिया गया है। संजय कुमार ने कड़वी सच्चाई बयां करते हुए कहा कि दिल्ली के कई घने इलाकों में तो अब यह पहचानना भी मुश्किल हो जाता है कि फुटपाथ आखिर कहां थे, क्योंकि वे पूरी तरह से गायब हो चुके हैं।

शोध और आंकड़ों में छिपी दिल्ली की भयानक हकीकत

फुटपाथों के गायब होने और पैदल यात्रियों के असुरक्षित होने की यह बात केवल मौखिक शिकायतों तक सीमित नहीं है, बल्कि विभिन्न वैज्ञानिक शोध और सरकारी आंकड़े भी इस भयावह स्थिति पर मुहर लगाते हैं। आईआईटी दिल्ली के ट्रांसपोर्टेशन रिसर्च एंड इंजरी प्रिवेंशन सेंटर ने यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के साथ मिलकर दिल्ली की सड़कों का एक विस्तृत और गहन अध्ययन किया। इस शोध के जो निष्कर्ष सामने आए, वे बेहद चौंकाने वाले और डराने वाले हैं। इस अध्ययन के अनुसार, दिल्ली की लगभग 44 प्रतिशत सड़कों पर पैदल यात्रियों के चलने के लिए फुटपाथ मौजूद ही नहीं हैं। बिना फुटपाथ की इन सड़कों पर लोग सीधे भारी वाहनों के बीच चलने को विवश हैं।

इस बुनियादी कमी का परिणाम बेहद जानलेवा साबित हो रहा है। दिल्ली पुलिस द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक, साल 2025 में हुए विभिन्न सड़क हादसों में कुल 649 पैदल यात्रियों को अपनी जान गंवानी पड़ी, जबकि इसी दौरान 1,738 पैदल चलने वाले लोग गंभीर रूप से घायल हुए। आंकड़ों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि पैदल यात्रियों की मौत के मामलों में सबसे ज्यादा जिम्मेदार निजी कारें रहीं, जिनकी टक्कर से 92 लोगों की मौत हुई। इसके बाद दोपहिया वाहनों की वजह से 75 राहगीरों की जान गई और भारी मालवाहक वाहनों की चपेट में आने से 43 पैदल यात्री काल के गाल में समा गए। इसके अलावा, आईआईटी दिल्ली के इसी शोध में यह भी रेखांकित किया गया कि साल 2022 के दौरान दिल्ली में कुल 1,461 घातक सड़क दुर्घटनाएं दर्ज की गई थीं, जिनमें से आश्चर्यजनक रूप से 43 प्रतिशत मृतक केवल पैदल चलने वाले राहगीर थे। ये आंकड़े साफ तौर पर दर्शा रहे हैं कि दिल्ली की सड़कों पर पैदल चलना किसी बड़े खतरे से खाली नहीं है और प्रशासन को इस दिशा में तुरंत ठोस कदम उठाने की सख्त आवश्यकता है।

सवाल-जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने फुटपाथ पर चलने को लेकर क्या ऐतिहासिक फैसला दिया है?
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि निर्धारित फुटपाथों पर सुरक्षित चलना नागरिकों का एक मौलिक अधिकार है, जो संविधान के अनुच्छेद 19(1)(डी) और अनुच्छेद 21 के तहत आता है, और यह अधिकार वाहनों से ऊपर है।
यह फैसला किस मुकदमे की सुनवाई के दौरान आया?
यह फैसला एक मोटर दुर्घटना मुआवजे से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान आया, जिसमें एक 5 वर्षीय बच्चे की सड़क दुर्घटना में दुखद मौत हो गई थी।
दिल्ली की सड़कों पर फुटपाथों की उपलब्धता को लेकर आईआईटी दिल्ली के शोध में क्या सामने आया है?
आईआईटी दिल्ली और यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के संयुक्त अध्ययन के अनुसार, दिल्ली की लगभग 44 प्रतिशत सड़कों पर पैदल यात्रियों के लिए फुटपाथ ही नहीं हैं।
साल 2025 में दिल्ली में कितने पैदल यात्रियों की सड़क हादसों में जान गई?
दिल्ली पुलिस के आंकड़ों के अनुसार, साल 2025 में 649 पैदल यात्रियों की मौत हुई और 1,738 घायल हुए, जिनमें से सबसे ज्यादा मौतें निजी कारों की टक्कर से हुईं।
दिल्ली में अवैध पार्किंग के खिलाफ यातायात पुलिस ने कितने चालान जारी किए हैं?
इस साल जनवरी से मार्च के बीच दिल्ली यातायात पुलिस ने रास्ता रोकने वाली और गलत पार्किंग के लिए 4,30,202 चालान जारी किए हैं।
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