देश की शीर्ष अदालत ने नेशनल कमीशन फॉर शेड्यूल्ड कास्ट्स की शक्तियों के संबंध में एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी व्याख्या प्रस्तुत की है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि आयोग की भूमिका मुख्य रूप से सलाह देने और सिफारिशें करने तक ही सीमित है। यह निकाय किसी भी प्रकार का न्यायिक फैसला या बाध्यकारी आदेश जारी नहीं कर सकता। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि आयोग अपने संवैधानिक दायित्वों के तहत केंद्र या राज्य सरकारों को केवल अपनी सिफारिशें भेज सकता है, लेकिन इसके निर्देश प्रशासनिक या कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होते।
संवैधानिक निकायों की भूमिका और कानूनी सीमाएं
सुनवाई के दौरान पीठ ने रेखांकित किया कि विधायिका द्वारा आयोग के लिए तय किया गया ढांचा पूरी तरह से परामर्शदात्री है। संविधान के अनुच्छेद 338A और अनुच्छेद 338B के तहत गठित संस्थाएं सामाजिक कल्याण को बढ़ावा देने वाले संवैधानिक निकाय हैं। इसके बावजूद, कानून निर्माताओं ने इन्हें न्यायिक फैसले सुनाने की शक्ति प्रदान नहीं की है। अदालत का मानना है कि इन निकायों का उद्देश्य अदालतों या न्यायिक न्यायाधिकरणों के कामकाज को अपने हाथ में लेना नहीं है। नौकरी अथवा सेवा से जुड़े मामलों में आयोग द्वारा दिए गए किसी भी निर्देश को बाध्यकारी आदेश के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
शिकायतों की जांच और साक्ष्य की सीमाएं
अदालत ने उस संवैधानिक प्रावधान का विस्तृत विश्लेषण किया जिसके तहत आयोग को अनुसूचित जातियों के अधिकारों और सुरक्षा उपायों के उल्लंघन से संबंधित शिकायतों की जांच करने का अधिकार मिला हुआ है। पीठ ने स्पष्ट किया कि हालांकि आयोग को आधिकारिक दस्तावेज तलब करने, समन जारी करने और साक्ष्य एकत्र करने की शक्तियां प्राप्त हैं, परंतु एकत्र किए गए साक्ष्यों के आधार पर निर्णय सुनाने अथवा आदेश लागू कराने की शक्ति उसके पास नहीं है। आयोग किसी मामले में तथ्यात्मक निष्कर्ष दर्ज कर सकता है और तत्पश्चात संबंधित केंद्र या राज्य सरकार को उस पर आवश्यक कार्रवाई करने का सुझाव दे सकता है।
अन्य आयोगों पर प्रभाव और प्रवर्तन संबंधी दलील खारिज
आयोग की ओर से तर्क दिया गया था कि संविधान में प्रयुक्त सुरक्षा उपाय शब्द का तात्पर्य अधिकारों के प्रवर्तन से है। सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि अनुच्छेद की स्पष्ट शब्दावली के आधार पर ऐसा अर्थ निकालना संभव नहीं है। अदालत ने कहा कि आयोग किसी भी स्थिति में अदालत या न्यायिक ट्रिब्यूनल का स्थान नहीं ले सकता और न ही पक्षों के कानूनी अधिकारों का निर्धारण कर सकता है। यह न्यायिक व्यवस्था महिलाओं, अल्पसंख्यकों और अन्य पिछड़े वर्गों के कल्याण के लिए गठित विभिन्न संवैधानिक और वैधानिक निकायों पर भी समान रूप से लागू होती है।



















