भारत जब 1947 में आज़ाद हुआ, उसके सात साल बाद तक भी पश्चिमी तट का एक छोटा सा इलाका पुर्तगाली शासन के अधीन रहा। यह इलाका था दादरा और नगर हवेली, जहां 2 अगस्त 1954 को लंबे संघर्ष के बाद आखिरकार पुर्तगालियों का कब्जा खत्म हुआ।
भारत आज़ाद हुआ, फिर भी क्यों गुलाम रहा यह इलाका
1947 में अंग्रेजों से आज़ादी मिलने के साथ ही भारत के ज्यादातर हिस्से एक झंडे के नीचे आ गए, लेकिन गोवा, दमन, दीव के साथ दादरा और नगर हवेली पर पुर्तगाल का शासन बना रहा। यह क्षेत्र पुर्तगाली उपनिवेश का हिस्सा था और आज़ाद भारत की सीमाओं के भीतर होते हुए भी विदेशी सत्ता के अधीन था।
आदिवासियों और स्वयंसेवकों ने मिलकर उठाया मोर्चा
दादरा और नगर हवेली को मुक्त कराने की मुहिम में स्थानीय आदिवासी समुदाय सबसे आगे थे। उनके साथ आज़ाद गोवा आंदोलन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और आजाद गोमंतक दल ने मिलकर इस संघर्ष को आगे बढ़ाया। इन सभी ने संगठित होकर पुर्तगाली प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोला और आखिरकार विदेशी सत्ता को यहां से हटा दिया।
इसी दौर में गोमांतक सेना ने पुर्तगाली झंडा उतारकर वहां तिरंगा फहराया, जो इस मुक्ति संघर्ष का एक बड़ा प्रतीकात्मक पल था। पुणे के वकील रानडे ने भी गोवा क्रांति में अहम भूमिका निभाई थी, जिसका असर आसपास के पुर्तगाली उपनिवेशों की मुक्ति की लड़ाई पर भी पड़ा।
एक दिन के लिए बना प्रशासन प्रमुख
दादरा और नगर हवेली को भारत से जोड़ने की कोशिशों के बीच एक स्थानीय व्यक्ति महज एक दिन के लिए इस इलाके के प्रशासन प्रमुख की भूमिका में आया, जिसे उस दौर में यहां का 'एक दिन का पीएम' भी कहा गया। यह मुक्ति संघर्ष के दौर की उन दिलचस्प घटनाओं में से एक है, जो कम चर्चित रही।
सात साल तक जनता ने खुद संभाला शासन
2 अगस्त 1954 को पुर्तगाली शासन खत्म होने के बाद दादरा और नगर हवेली फौरन भारत में शामिल नहीं हुआ। इसके बजाय अगले सात साल तक यहां 'वरिष्ठ पंचायत' नाम की व्यवस्था के जरिए स्थानीय जनता ने खुद ही अपना शासन चलाया। यह अपने आप में एक अनोखा दौर था, जब एक स्वतंत्र इलाका न तो पुर्तगाल के अधीन था और न ही औपचारिक रूप से भारत का हिस्सा।
11 अगस्त 1961 को बना भारत का आधिकारिक हिस्सा
सात साल की इस स्वशासन व्यवस्था के बाद 11 अगस्त 1961 को दादरा और नगर हवेली आधिकारिक तौर पर भारत में शामिल कर लिया गया। इसके साथ ही यह इलाका पूरी तरह भारतीय संघ का हिस्सा बन गया और वरिष्ठ पंचायत के जरिए चल रही अस्थायी व्यवस्था खत्म हो गई।



















