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रांची के किसान दीपेश ने भिंडी बेचकर छापे दो लाख रुपये, अब पत्तागोभी और फूलगोभी की फसल से बंपर मुनाफे की तैयारीझारखंड
18 सित॰ 2026, 7:02 pm (7 दिन पहले)· 0

रांची के किसान दीपेश ने भिंडी बेचकर छापे दो लाख रुपये, अब पत्तागोभी और फूलगोभी की फसल से बंपर मुनाफे की तैयारी

रांची के प्रगतिशील किसान दीपेश ने एक एकड़ में भिंडी की खेती कर दो लाख रुपये की कमाई की है। अब वह ठंड के मौसम में पत्तागोभी और फूलगोभी की फसल से अपनी आय को और बढ़ाने की तैयारी कर रहे हैं।

रांची के रहने वाले किसान दीपेश ने खेती के क्षेत्र में अपनी मेहनत से एक नया मुकाम हासिल किया है। उन्होंने हाल ही में समाप्त हुए सीजन के दौरान एक एकड़ जमीन पर भिंडी की फसल उगाई थी, जिससे उन्हें दो लाख रुपये की शुद्ध आय प्राप्त हुई। उनकी इस फसल की गुणवत्ता इतनी बेहतरीन थी कि खेत में आज भी हरी-भरी भिंडियां देखी जा सकती हैं, जो उनकी उन्नत कृषि तकनीकों का प्रमाण देती हैं।

सब्जी उत्पादन का नया प्लान

भिंडी की शानदार सफलता के बाद अब दीपेश ने ठंडे मौसम की फसलों पर अपना ध्यान केंद्रित कर लिया है। वह आगामी सीजन में एक एकड़ के भूखंड पर पत्तागोभी और फूलगोभी उगाने की पुख्ता योजना बना रहे हैं। उनका पूरा विश्वास है कि यदि पिछली बार की तरह इन सर्दियों की सब्जियों की गुणवत्ता भी उच्च स्तर की रही, तो उन्हें बाजार में बंपर मुनाफा कमाने से कोई नहीं रोक सकेगा।

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जैविक खाद और मिट्टी की तैयारी का सीक्रेट

सफलता के पीछे के मंत्र को साझा करते हुए दीपेश का कहना है कि किसी भी फसल की बंपर पैदावार के लिए खेत की मिट्टी का उपजाऊ और सेहतमंद होना सबसे ज्यादा जरूरी है। अपनी फसलों के लिए वह बाजार की महंगी खादों पर निर्भर रहने के बजाय खुद ही जैविक खाद तैयार करते हैं। उनके पास लगभग 10 साल पुराना सड़ा हुआ गोबर का खाद उपलब्ध रहता है, जिसका वह खेतों में नियमित रूप से उपयोग करते हैं।

उनके अपने घर पर गाय और भैंस होने की वजह से उन्हें उच्च गुणवत्ता वाला गोबर आसानी से मिल जाता है। खेती का नया चक्र शुरू होने से ठीक पहले वह खेत में 7 साल पुराना खाद मिलाते हैं। इसके साथ ही मिट्टी की सेहत सुधारने के लिए उसमें उचित मात्रा में चूना और पोटाश भी मिलाया जाता है। खासकर पोटाश का इस्तेमाल करने से पत्तागोभी जैसी फसलें बेहद चिकनी और चमकदार बनती हैं, जिससे ग्राहकों को आकर्षित करना और बाजार में उनकी अच्छी कीमत वसूलना आसान हो जाता है।

नीम और लहसुन का अनोखा फॉर्मूला

फसलों को कीटों और बीमारियों से सुरक्षित रखने के लिए दीपेश पूरी तरह प्राकृतिक और घरेलू तरीकों पर भरोसा करते हैं। वह बाजार के रासायनिक कीटनाशकों के विकल्प के तौर पर नीम और लहसुन से तैयार किए गए विशेष घोल का इस्तेमाल करते हैं। इस देसी नुस्खे को बनाने के लिए वह नीम की ताजी पत्तियों और लहसुन की कलियों को 5 लीटर पानी में करीब 10 से 12 दिनों के लिए भिगोकर छोड़ देते हैं। तैयार होने के बाद इस प्रभावी घोल को पौधों की जड़ों में डाला जाता है, जिससे कीटों का हमला स्वतः रुक जाता है।

कड़ी मेहनत और नियमित देखरेख

सिर्फ खाद और पानी ही नहीं बल्कि दीपेश अपनी फसल की सफलता का श्रेय अपनी कड़ी मेहनत को भी देते हैं। वह हर रोज अपने खेतों में 4 से 5 घंटे का लंबा समय बिताते हैं और एक-एक पौधे का बहुत ही बारीकी से निरीक्षण करते हैं। हालांकि जरूरत पड़ने पर वह बाजार में मिलने वाले कीटनाशकों का भी उपयोग कर लेते हैं, लेकिन कीट नियंत्रण के लिए उनका यह नीम और लहसुन वाला घोल सबसे अचूक और प्रभावी माध्यम साबित हुआ है।

सवाल-जवाब

किसान दीपेश ने किस फसल से दो लाख रुपये कमाए?
किसान दीपेश ने एक एकड़ जमीन पर भिंडी की खेती करके दो लाख रुपये की आय प्राप्त की है।
दीपेश भिंडी के बाद अब कौन सी सब्जियां उगाने की योजना बना रहे हैं?
भिंडी की फसल के बाद वह ठंड के मौसम में एक एकड़ जमीन पर पत्तागोभी और फूलगोभी उगाने की तैयारी कर रहे हैं।
खेती के लिए वह किस प्रकार की खाद का इस्तेमाल करते हैं?
वह अपने खेतों में लगभग 7 से 10 साल पुराना सड़ा हुआ गोबर का खाद इस्तेमाल करते हैं जिसे वह खुद तैयार करते हैं।
कीटों से बचाव के लिए वह क्या उपाय करते हैं?
कीटों से बचाव के लिए वह नीम की पत्तियों और लहसुन की कलियों को 10 से 12 दिनों तक पानी में भिगोकर तैयार किए गए घोल का उपयोग करते हैं।
वह रोजाना खेत में कितना समय बिताते हैं?
वह हर दिन अपने खेतों में 4 से 5 घंटे बिताकर पौधों का बारीकी से निरीक्षण करते हैं।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Laxmi Gupta@laxmi-gupta·6 दिन पहले

अंक ज्योतिष और प्राकृतिक ऊर्जा के दृष्टिकोण से, किसान दीपेश द्वारा मिट्टी की तैयारी और नीम-लहसुन के जैविक प्रयोग में जो निरंतरता दिखती है, वह भूमि के मूलांक को बल देती है। 10 साल पुरानी गोबर खाद का उपयोग और रोज़ाना 4-5 घंटे का श्रम ग्रहों की सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करता है। यदि वह अपनी आगामी पत्तागोभी और फूलगोभी की बुवाई के लिए किसी शुभ अंक या तिथि का चयन करें, तो उनकी यह मेहनत और अधिक स्थायी तथा बड़ा वित्तीय लाभ दे सकती है।

Ravikash Gupta@ravikash·6 दिन पहले

झारखंड के कृषि क्षेत्र में ऐसे प्रगतिशील किसानों की सफलता इस बात का स्पष्ट संकेत है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था अब पारंपरिक तरीकों से आगे बढ़कर लागत-प्रभावी और टिकाऊ कृषि की ओर रुख कर रही है। जिस प्रकार दीपेश ने अपनी डेयरी यूनिट से मिलने वाले पुराने गोबर और नीम-लहसुन जैसे घरेलू जैविक उपायों का उपयोग कर इनपुट लागत को न्यूनतम रखा है, वह एग्री-स्टार्टअप और आधुनिक ग्रामीण आजीविका के लिए एक बेहतरीन व्यावहारिक मॉडल पेश करता है। आने वाले समय में यदि ऐसे किसानों को डिजिटल सप्लाई चेन और डायरेक्ट-टू-मार्केट डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का सीधा लाभ मिलने लगे, तो उनकी शुद्ध आय में कई गुना वृद्धि हो सकती है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·6 दिन पहले

झारखंड जैसे राज्यों में कृषि आय बढ़ाने के लिए केवल उत्पादन बढ़ाना काफी नहीं है, बल्कि आपूर्ति श्रृंखला और शीत भंडारण का प्रबंधन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जब तक किसानों को बिचौलियों से मुक्ति दिलाकर सीधे उपभोक्ताओं या बड़े बाजारों तक पहुँच नहीं मिलती, तब तक बंपਰ पैदावार का पूरा आर्थिक लाभ उन्हें नहीं मिल पाएगा। नीतिगत स्तर पर कृषि विपणन सुधारों और स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना से ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था को वास्तविक मजबूती मिलेगी।

Karan Malhotra@karan-malhotra·6 दिन पहले

यह खबर दर्शाती है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कृषि नवाचार और जैविक तरीकों का उपयोग किस प्रकार आपराधिक तत्वों द्वारा मिलावट या अवैध खाद-कीटनाशकों के बाजार पर लगाम लगा सकता है। जब किसान नीम, लहसुन और पुरानी गोबर की खाद जैसे घरेलू संसाधनों पर निर्भर होते हैं, तो वे नकली और खतरनाक रासायनिक पोंगापंथियों के चंगुल से बचते हैं, जिससे ग्रामीण इलाकों में आर्थिक अपराधों और धोखाधड़ी की गुंजाइश भी कम होती है।

Rohan Verma@rohan-verma·6 दिन पहले

करन मल्होत्रा के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए यह रेखांकित करना महत्वपूर्ण है कि झारखंड जैसे क्षेत्रों में ऐसी स्थानीय कृषि पद्धतियाँ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के साथ आपूर्ति श्रृंखला को पारदर्शी बनाती हैं। जब किसान पारंपरिक ज्ञान और जैविक इनपुट अपनाते हैं, तो यह न केवल लागत को कम करता है बल्कि ग्रामीण स्तर पर बाजार के शोषण और बिचौलियों के प्रभाव को भी प्रभावी ढंग से सीमित करता है।

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