छत्तीसगढ़ के सरगुजा अंचल में खेती किसानी के तौर तरीकों में एक बड़ा बदलाव देखा जा रहा है। परंपरागत फसलों के सीमित लाभ से आगे बढ़कर अब स्थानीय किसान उच्च मूल्य वाली फल फसलों की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं। इस क्षेत्र के वातावरण और मिट्टी में व्यावसायिक फलों के उत्पादन की व्यापक गुंजाइश बन रही है। इसी कड़ी में स्ट्रॉबेरी की खेती किसानों के लिए लाभ का एक मजबूत जरिया बनकर उभरी है। सही समय पर रोपाई, खेत की सही बनावट और पोषण प्रबंधन से किसान कम जमीन में भी बेहतर कमाई की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
अक्टूबर की शुरुआत में रोपाई से मिलता है सबसे ज्यादा फायदा
स्ट्रॉबेरी के पौधों को लगाने के लिए सितंबर का अंतिम सप्ताह और अक्टूबर का पहला पखवाड़ा बेहद अनुकूल माना जाता है। कृषि एक्सपर्ट राकेश राजवाड़े के अनुसार 1 अक्टूबर से 5 अक्टूबर के बीच का समय खेत में पौधे लगाने के लिए सबसे उपयुक्त माना गया है। यदि इस निर्धारित समय पर किसान रोपाई पूरी कर लेते हैं, तो पौधे तेजी से जड़ें पकड़ते हैं और रोपाई के करीब 45 दिन बाद शुरुआती फल मिलने का सिलसिला शुरू हो जाता है। सही समय पर की गई शुरुआत फसल को ठंड के मौसम का पूरा फायदा दिलाती है, जिससे आगे चलकर पैदावार की गुणवत्ता भी काफी बेहतर रहती है।
पौधों की संख्या और पैदावार का सटीक आकलन
एक एकड़ खेत में स्ट्रॉबेरी की योजनाबद्ध तरीके से बागवानी की जाए तो लगभग 5 हजार पौधे लगाए जा सकते हैं। उत्पादन के गणित को समझें तो सामान्य परिस्थितियों में प्रति पौधा औसतन 500 ग्राम यानी आधा किलो फल आसानी से दे देता है। यदि मिट्टी की उर्वरता, मौसम और देखभाल अत्यधिक अनुकूल रहे तो यही पैदावार 500 ग्राम से बढ़कर 750 ग्राम प्रति पौधा तक पहुंच सकती है। इस तरह 5 हजार पौधों से किसान औसतन 2500 किलोग्राम फल प्राप्त करने का अनुमान लगा सकते हैं। यह मात्रा सीमित रकबे में फल उत्पादन के लिहाज से काफी उत्साहजनक मानी जाती है।
लागत और पांच लाख रुपये की सकल बिक्री का समीकरण
बाजार में स्ट्रॉबेरी के शुरुआती आगमन के दौरान फलों के दाम काफी ऊंचे बने रहते हैं। यदि औसत थोक भाव 200 रुपये प्रति किलोग्राम भी मिल जाता है, तो 2500 किलो की कुल पैदावार से लगभग 5 लाख रुपये तक की सकल बिक्री संभव है। हालांकि शुद्ध मुनाफा बाजार की बदलती दरों, उपज की गुणवत्ता और कुल कृषि व्यय पर तय होता है। एक एकड़ में पौध खरीद, प्लास्टिक मल्चिंग, जैविक खाद, रासायनिक पोषक तत्व और सिंचाई की व्यवस्था करने में करीब 1 लाख रुपये से 1.5 लाख रुपये तक का कुल खर्च आता है। ऐसे में खर्च घटाने के बाद भी किसान एक एकड़ में आकर्षक शुद्ध आमदनी हासिल करने में सफल हो सकते हैं।
खेत की तैयारी, मेड़ और प्लास्टिक मल्चिंग का महत्व
स्ट्रॉबेरी की फसल जमीन पर आलू बोने के तौर तरीकों से काफी मिलती जुलती है, लेकिन इसमें क्यारियों और मेड़ का सही आकार देना अनिवार्य होता है। फसल को जमीन की नमी से बचाने और खरपतवार रोकने के लिए प्लास्टिक मल्चिंग का उपयोग सबसे जरूरी कदम है। खेत तैयार करते समय मेड़ से मेड़ की दूरी करीब 90 सेंटीमीटर से 120 सेंटीमीटर रखनी चाहिए। इसके साथ ही एक ही कतार में पौधे से पौधे के बीच 30 सेंटीमीटर से 45 सेंटीमीटर की जगह छोड़ना आवश्यक होता है। यह व्यवस्था सिंचाई प्रबंधन को सुगम बनाती है और पौधों को धूप तथा हवा का पूरा संतुलन मिलता है।
पोषण प्रबंधन में वर्मी कंपोस्ट और संतुलित खाद
पौधों के समुचित विकास और रसदार फलों की निरंतर पैदावार के लिए संतुलित पोषण की जरूरत होती है। मिट्टी की जांच के आधार पर सड़ी हुई गोबर की खाद और वर्मी कंपोस्ट का प्रयोग बुनियादी तौर पर किया जाता है। इसके अलावा मिट्टी की स्थिति को देखते हुए बोन मील और एनपीके जैसे जरूरी रासायनिक पोषक तत्वों का संतुलित प्रबंधन आवश्यक होता है। पोषण का यह संतुलन पौधों की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है और फलों के आकार व स्वाद को बेहतर बनाए रखने में मदद करता है।
विंटर डाउन किस्म और सिलफिली क्षेत्र का अनुभव
सफल बागवानी में किस्म का चयन सबसे अहम कड़ी माना जाता है। सरगुजा की जलवायु को देखते हुए विंटर डाउन किस्म को काफी मुफीद पाया गया है। इस किस्म के पौधे स्थानीय ठंड को सहन करने में सक्षम होते हैं और लगातार फल देने की क्षमता रखते हैं। सरगुजा जिले के सिलफिली इलाके में किसान इस किस्म की स्ट्रॉबेरी की खेती बड़े पैमाने पर कर रहे हैं, जहां के परिणाम अन्य किसानों के लिए भी प्रेरणादायक साबित हो रहे हैं।
मार्च और अप्रैल तक जारी रहता है फलों का उत्पादन
अक्टूबर की शुरुआत में लगे पौधों से नवंबर के दूसरे पखवाड़े अथवा दिसंबर के पहले सप्ताह तक फल पकने लगते हैं। इसके बाद अनुकूल मौसम बने रहने पर यह उत्पादन मार्च और अप्रैल महीने तक लगातार चलता रहता है। स्ट्रॉबेरी के पके फलों को एक दिन के अंतराल पर सावधानी से तोड़ना पड़ता है। चूंकि यह फल जल्दी खराब होने वाला होता है, इसलिए किसानों को तुड़ाई से पहले ही स्थानीय बाजारों या फल मंडियों तक माल पहुंचाने की परिवहन व्यवस्था पहले से तय रखनी होती है।


















