राजस्थान के प्रतापगढ़ जिले से वन सुरक्षा और अवैध खनन माफिया के आतंक से जुड़ी एक बेहद दर्दनाक घटना सामने आई है। छोटी सादड़ी क्षेत्र में सरकारी वन भूमि पर चल रहे अवैध खनन और मिट्टी परिवहन को रोकने के लिए दबिश देने पहुंचे वन विभाग के जांबाज रेंजर प्रताप सिंह चूंडावत की डंपर से कुचलकर जान ले ली गई। 40 वर्षीय प्रताप सिंह अपने परिवार में अकेले कमाने वाले सदस्य थे। हाल ही में उनके सिर से पिता का साया उठा था और अब इस त्रासदी ने उनकी पत्नी और दो मासूम बच्चों को बेसहारा कर दिया है। सरकारी ड्यूटी के दौरान पर्यावरण और वन्यजीवों की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्योछावर करने वाले इस वन अधिकारी को अब राजकीय सम्मान के साथ विदाई दी गई है, वहीं दूसरी तरफ उन्हें शहीद का दर्जा दिए जाने की पुरजोर मांग उठ रही है।
आधी रात की कार्रवाई और 50 मीटर तक घसीटने का खौफनाक मंजर
यह पूरी घटना सोमवार देर रात करीब 11:30 बजे की है। वन विभाग को गुप्त सूचना मिली थी कि छोटी सादड़ी के घाटी वाले बालाजी क्षेत्र स्थित चक सुखड़ वनखंड में माफिया अवैध रूप से जेसीबी लगाकर लाल मिट्टी की खुदाई और अवैध परिवहन कर रहा है। सूचना मिलते ही रेंजर प्रताप सिंह चूंडावत अपनी विभागीय टीम के साथ तुरंत मौके पर पहुंचे। वन कर्मियों की टीम ने वहां पहुंचकर देखा कि एक जेसीबी मशीन, ट्रैक्टर और मिट्टी से लदा हुआ एक डंपर गैरकानूनी काम में जुटे हुए थे।
टीम ने त्वरित कार्रवाई करते हुए अवैध मिट्टी से भरे डंपर को जब्त कर लिया। वन विभाग के कर्मचारी सुरेश मेघवाल को डंपर की निगरानी के लिए केबिन में बैठाया गया, जबकि रेंजर प्रताप सिंह अपनी बुलेट मोटरसाइकिल पर सवार होकर रेंज कार्यालय की ओर आगे-आगे रास्ता दिखाते हुए चल रहे थे। इसी बीच रास्ते में मौका पाकर डंपर चालक ने गाड़ी की रफ्तार अचानक बहुत तेज कर दी। आरोप है कि चालक ने सामने चल रहे रेंजर प्रताप सिंह की बाइक को सीधे पीछे से जोरदार टक्कर मारी और उन्हें बाइक समेत करीब 50 मीटर तक सड़क पर घसीटते हुए ले गया। इस दिल दहला देने वाली वारदात में प्रताप सिंह गंभीर रूप से घायल हो गए। साथी कर्मचारी उन्हें तुरंत नजदीकी अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां डॉक्टरों ने स्वास्थ्य जांच के बाद उन्हें मृत घोषित कर दिया।
फरार चालक की तलाश में तीन पुलिस टीमें और तीन हिरासत में
वारदात को अंजाम देने के बाद डंपर चालक गाड़ी को तेज गति से दौड़ाते हुए अपने गांव के आसपास ले गया, जहां उसने मिट्टी खाली की और वाहन छोड़कर मौके से फरार हो गया। घटना की सूचना मिलते ही पुलिस प्रशासन हरकत में आ गया। पुलिस अधीक्षक विशाल जांगिड़ ने स्पष्ट किया कि मामले की गंभीरता को देखते हुए सभी पहलुओं की बारीकी से पड़ताल की जा रही है। फरार डंपर चालक की गिरफ्तारी के लिए पुलिस की तीन विशेष टीमें गठित की गई हैं, जो संभावित ठिकानों पर लगातार दबिश दे रही हैं।
घटनास्थल से फॉरेंसिक विशेषज्ञों की टीम ने भी वैज्ञानिक साक्ष्य एकत्र किए हैं। पुलिस ने मौके से अवैध खनन में इस्तेमाल की जा रही जेसीबी मशीन और ट्रैक्टर को जब्त कर लिया है। इस मामले में कार्रवाई करते हुए जेसीबी मालिक हरीश ठाकुर समेत तीन संदिग्धों को हिरासत में लेकर पूछताछ की जा रही है। इसके साथ ही जिस व्यक्ति के कहने पर वहां से मिट्टी उठवाई जा रही थी, उससे भी कड़ी पूछताछ चल रही है। पोस्टमार्टम की प्रक्रिया पूरी होने के बाद रेंजर का पार्थिव शरीर उनके गृह गांव के परिजनों को सौंप दिया गया।
वन्यजीव संरक्षण में बनाई थी खास पहचान, तैराकी और निशानेबाजी में थे माहिर
प्रताप सिंह चूंडावत मूल रूप से चित्तौड़गढ़ जिले के मेड़ी के अमराणा गांव के रहने वाले थे। करीब दो वर्ष पहले ही उनकी पोस्टिंग छोटी सादड़ी वन क्षेत्र में हुई थी। इन दो सालों के छोटे से कार्यकाल में उन्होंने अवैध गतिविधियों पर रोक लगाने के साथ-साथ वन्यजीवों के संरक्षण में अपनी एक विशिष्ट पहचान कायम कर ली थी। इलाके में जब भी बाघ, तेंदुआ, अजगर या मगरमच्छ जैसे खूंखार वन्यजीव आबादी वाले क्षेत्रों में घुस आते थे, प्रताप सिंह आगे रहकर रेस्क्यू ऑपरेशन का नेतृत्व करते थे।
वे केवल एक कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी ही नहीं थे, बल्कि एक बेहतरीन निशानेबाज और कुशल तैराक भी माने जाते थे। उनके इसी असाधारण समर्पण और उत्कृष्ट कार्यशैली को देखते हुए वन विभाग द्वारा स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर उनका नाम राज्य स्तरीय पुरस्कार के लिए प्रस्तावित किए जाने की जानकारी भी सामने आई थी। उनके इस तरह अचानक चले जाने से पूरे वन विभाग में गहरा शोक व्याप्त है।
परिवार पर टूटा दुखों का पहाड़ और शहीद के दर्जे की मांग
प्रताप सिंह के असामयिक निधन से उनके परिवार की रीढ़ टूट गई है। कुछ ही समय पहले उनके पिता का देहांत हुआ था, जिसके गहरे सदमे से परिवार अभी उबर भी नहीं पाया था कि अब परिवार के इकलौते कमाने वाले मुखिया का साया भी छिन गया। उनके पीछे परिवार में पत्नी आशा कुंवर, 13 वर्ष की बेटी गुंजन और 8 वर्ष का मासूम बेटा अनिरुद्ध रह गए हैं। राजकीय सम्मान के साथ उनके पैतृक गांव में उनका अंतिम संस्कार किया गया, जहां पूरा गांव और वन कर्मी गमगीन नजर आए।
इस शहादत के बाद जनमानस और जनप्रतिनिधियों में भारी आक्रोश है। चित्तौड़गढ़ सांसद सीपी जोशी ने गहरा शोक व्यक्त करते हुए दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई करने और प्रताप सिंह को आधिकारिक रूप से शहीद का दर्जा देने की मांग उठाई है। अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट (एडीएम) विजयेश पंड्या ने बताया कि रेंजर को शहीद का दर्जा दिलाने की मांग का प्रस्ताव तैयार कर राज्य सरकार को भेजा जा रहा है। वहीं जिला वन अधिकारी (डीएफओ) सुरेश अग्रवाल ने भी पुष्टि की कि विभाग की तरफ से औपचारिक पत्रावली राज्य सरकार को भेजी जाएगी। विभिन्न सामाजिक संगठन भी इस मांग के समर्थन में आगे आए हैं।
संसाधनों की भारी कमी और फील्ड स्टाफ की सुरक्षा पर गंभीर सवाल
यह दुखद घटना केवल एक वन अधिकारी की जान जाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सिस्टम की उन कमियों को भी उजागर करती है जिनके बीच फील्ड कर्मी काम करने को मजबूर हैं। प्रतापगढ़ जिले में लगभग 1319 वर्ग किलोमीटर का विशाल वन क्षेत्र फैला हुआ है। लेकिन प्रशासनिक स्तर पर लंबे समय से अधिकारियों और कर्मचारियों के कई पद रिक्त पड़े हैं। फील्ड में तैनात कर्मचारियों के पास गश्त और कार्रवाई के लिए पर्याप्त सरकारी वाहन तक उपलब्ध नहीं हैं।
सांप पकड़ने या वन्यजीवों का रेस्क्यू करने जैसे जोखिम भरे अभियानों के लिए भी कर्मियों को अक्सर अपनी निजी गाड़ियों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। इस सीमित संसाधन व्यवस्था के चलते खतरनाक खनन माफिया के सामने वन कर्मियों की जान हमेशा जोखिम में बनी रहती है।
गौरतलब है कि यह कोई पहली घटना नहीं थी। जुलाई 2025 में भी आरामपुरा वन क्षेत्र के भीतर अवैध बजरी खनन को रोकने गई वन विभाग की टीम पर खनन माफिया ने वाहन चढ़ाकर कुचलने का प्रयास किया था। उस जानलेवा हमले के बाद भी सीमावर्ती इलाकों में बजरी और लाल मिट्टी का अवैध कारोबार थमा नहीं। अब इस नई वारदात के बाद यह सवाल बेहद अहम हो गया है कि सरकार अवैध खनन पर प्रभावी अंकुश लगाने और अग्रिम पंक्ति के वनकर्मियों को सुरक्षा उपकरण व कानूनी कवच उपलब्ध कराने के लिए क्या ठोस कदम उठाती है।


















