अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) जोधपुर की स्थापना के 14 वर्षों के सफर में पहली बार ऐसा व्यापक गतिरोध देखने को मिला है, जब रेजिडेंट डॉक्टरों ने बड़े पैमाने पर प्रशासनिक नीतियों के खिलाफ कामकाज रोक दिया। प्रथम वर्ष के रेजिडेंट डॉक्टर राजनरेश यादव की अप्रत्याशित मौत के पश्चात उपजा रोष गुरुवार को पूर्ण बहिष्कार में तब्दील हो गया। संस्थान के करीब 450 रेजिडेंट डॉक्टरों ने बाह्य रोगी विभाग (ओपीडी) का काम छोड़कर धरना प्रदर्शन शुरू किया और निदेशक के त्यागपत्र की पुरजोर मांग उठा दी। इस आंदोलन के चलते चिकित्सालय की नियमित स्वास्थ्य सेवाएं चरमरा गईं, जिसका सीधा खामियाजा दूर-दराज से आने वाले मरीजों को भुगतना पड़ा। लगभग 8 हजार मरीजों को परामर्श नहीं मिल सका, जबकि पहले से सूचीबद्ध करीब 80 सर्जिकल प्रक्रियाएं आगे खिसकानी पड़ीं।
सीनियर चिकित्सकों के जिम्मे संभाली गईं जीवनरक्षक सेवाएं
नियमित ओपीडी और निर्धारित ऑपरेशन बंद रहने के बीच अस्पताल में गंभीर रूप से बीमार रोगियों को राहत देने के लिए वरिष्ठ संकाय सदस्यों ने मोर्चा संभाला। ट्रॉमा सेंटर, आपातकालीन वार्ड, सघन चिकित्सा इकाई (आईसीयू) तथा अत्यंत नाजुक मामलों की देखभाल वरिष्ठ चिकित्सकों की देखरेख में चलती रही। हड़ताली चिकित्सकों का मुख्य आक्षेप यह है कि संस्थान में लंबे अरसे से रिक्त पदों और अत्यधिक कार्यभार की गंभीर समस्या बनी हुई है। कनिष्ठ रेजिडेंट डॉक्टरों से कई मौकों पर लगातार 36 घंटे तक कठिन ड्यूटी कराई जाती है। आंदोलनरत चिकित्सकों का कहना है कि वे इन दुष्कर कार्य परिस्थितियों और मानसिक तनाव को लेकर पहले भी प्रशासनिक स्तर पर अपनी शिकायतें दर्ज करा चुके हैं। इंटरनेट मीडिया पर प्रसारित कई वीडियो में भी चिकित्सक अव्यवहारिक कार्य घंटों और प्रशासनिक दबाव पर सवाल उठाते दिखाई दिए हैं।
कैंडल मार्च के बाद भी नहीं बनी सहमति
डॉक्टर राजनरेश यादव मंगलवार के दिन विश्राम कक्ष से जुड़े शौचालय में अचेत अवस्था में पाए गए थे, जहां से एक सिरिंज मिलने का विवरण भी सामने आया। उपचार के दौरान उनकी जान नहीं बचाई जा सकी। हालांकि, उनके निधन का असली कारण अब तक साफ नहीं हो पाया है और पूरे मामले की सच्चाई पोस्टमॉर्टम की अंतिम रिपोर्ट आने पर ही स्पष्ट हो पाएगी। रेजिडेंट डॉक्टरों ने इस प्रकरण की निष्पक्ष एवं पारदर्शी पड़ताल कराने तथा समस्त तथ्यों को सार्वजनिक करने का आग्रह किया है। गुरुवार की सुबह से ही चिकित्सकों ने ओपीडी भवन के समक्ष बैठकर रोष प्रकट किया। शाम ढलते ही उन्होंने एक कैंडल मार्च निकाला, जो एम्स निदेशक डॉ. जीडी पूरी के आधिकारिक निवास तक पहुंचा। प्रदर्शनकारी बाद में पुनः धरना स्थल पर लौट आए। निदेशक ने स्वयं वहां पहुंचकर गतिरोध खत्म करने के लिए चिकित्सकों से संवाद किया, लेकिन रेजिडेंट्स अपनी मांगों से पीछे हटने को तैयार नहीं हुए। इस बीच ग्रीवेंस कमेटी, विभिन्न विभागों के प्रमुखों और अन्य शिक्षकों ने भी काम पर लौटने का अनुरोध किया।
मुआवजे और आधिकारिक मान्यता को लेकर प्रमुख मांगें
आंदोलनरत रेजिडेंट डॉक्टरों ने प्रबंधन के समक्ष एक विस्तृत मांग पत्र पेश किया है। इसमें प्रशासनिक स्तर से सार्वजनिक क्षमा याचना, प्रकरण से जुड़े तथ्यों का पारदर्शी खुलासा, दिवंगत डॉक्टर के परिजनों को 5 करोड़ रुपए की आर्थिक सहायता राशि, आवश्यक बीमा कवर व अन्य संस्थागत लाभ देने के साथ-साथ रेजिडेंट डॉक्टर एसोसिएशन को आधिकारिक मान्यता प्रदान करने की शर्त रखी गई है। उपजे गतिरोध को देखते हुए एम्स प्रबंधन ने आगामी निर्देश आने तक ओपीडी कार्यों को अस्थाई तौर पर स्थगित रखने का निर्णय लिया है। इसके बावजूद प्रसव कक्ष, ब्लड बैंक, आवश्यक नैदानिक जांचें, आपातकालीन सर्जरी तथा आईसीयू की जीवनरक्षक सेवाएं सुचारू रूप से संचालित की जा रही हैं।
आईएमए की चिंता और अन्य संस्थानों से मिला समर्थन
इस दुखद घटनाक्रम पर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने भी गहरा संज्ञान लिया है। संस्था ने रेखांकित किया है कि स्वास्थ्यकर्मियों के लिए कार्यस्थल पर सुरक्षित माहौल, विश्राम के निर्धारित घंटे और मानसिक संबल सुनिश्चित किया जाना बेहद अनिवार्य है। इधर, एम्स भोपाल के रेजिडेंट डॉक्टरों ने भी इस आंदोलन को अपना नैतिक समर्थन देने का ऐलान किया है। हड़ताली डॉक्टरों का स्पष्ट कहना है कि यह प्रतिक्रिया केवल एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बरसों से चली आ रही स्टाफ की भारी कमी, बेहिसाब कार्यभार और अमानवीय शिफ्ट व्यवस्था के खिलाफ फूटा आक्रोश है। प्रशासन और आंदोलनकारियों के मध्य विचार-विमर्श का सिलसिला बना हुआ है, मगर सहमति न बन पाने के कारण चिकित्सा बहिष्कार जारी है।



















