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रोहसी बुजुर्ग के स्वतंत्रता सेनानी रामनाथ सिंह का त्याग, अंग्रेजों के जुल्म से गंवाई रोशनी पर नहीं माना हारभारत
14 अग॰ 2026, 7:02 pm (48 दिन पहले)· 1

रोहसी बुजुर्ग के स्वतंत्रता सेनानी रामनाथ सिंह का त्याग, अंग्रेजों के जुल्म से गंवाई रोशनी पर नहीं माना हार

अमेठी के रोहसी बुजुर्ग गांव निवासी स्वतंत्रता सेनानी रामनाथ सिंह ने ब्रिटिश हुकूमत की कठोर यातनाएं झेलते हुए अपनी दोनों आंखें गंवा दी थीं, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी।

उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले में गौरीगंज तहसील के रोहसी बुजुर्ग गांव के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामनाथ सिंह की देशप्रेम की कहानी आज भी लोगों के दिलों में देशभक्ति का जज्बा पैदा करती है। देश को अंग्रेजों की गुलामी की बेड़ियों से आजाद कराने के लिए उन्होंने न केवल अपने व्यक्तिगत सुख का त्याग किया, बल्कि ब्रिटिश हुकूमत के अमानवीय अत्याचारों को भी हंसते-हंसते सहन किया। उनके परिजनों और गांव के निवासियों के लिए वे आज भी एक महान प्रेरणा स्रोत बने हुए हैं। रामनाथ सिंह के बलिदान की गाथा यह दर्शाती है कि स्वतंत्रता की कीमत कितनी बड़ी थी और किस तरह वीर सपूतों ने अपनी शारीरिक क्षमताओं की आहुति देकर राष्ट्र की सेवा की थी। आज भी उनके परिवार के सदस्य उनकी स्मृतियों को साझा करते हुए गर्व महसूस करते हैं।

कम उम्र में गृहत्याग और स्वतंत्रता आंदोलन में प्रवेश

रामनाथ सिंह का जन्म अमेठी जिले के रोहसी बुजुर्ग गांव में हुआ था। छोटी सी उम्र से ही उनके मन में देश को आजाद कराने की तीव्र इच्छा उत्पन्न हो गई थी। उन्होंने बहुत ही कम आयु में अपने परिवार और व्यक्तिगत जीवन की सुख-सुविधाओं को पीछे छोड़ दिया और खुद को पूरी तरह से स्वतंत्रता संग्राम के लिए समर्पित कर दिया। ब्रिटिश शासन की पुलिस लगातार उनके घर पर छापेमारी करती थी और उनके परिजनों को डराती-धमकाती थी ताकि रामनाथ सिंह अपने रास्ते से भटक जाएं। हालांकि, औपनिवेशिक अधिकारियों के दबाव और उत्पीड़न का उन पर कोई असर नहीं पड़ा और वे अपने लक्ष्य पर अडिग रहे।

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1932 में पहली बार कारावास और परिजनों की मिन्नतें

देश की आजादी की लड़ाई में सक्रिय भूमिका निभाते हुए रामनाथ सिंह पहली बार वर्ष 1932 में जेल भेजे गए। जब वे जेल से बाहर आए, तो उनके परिवार के सदस्यों ने अत्यधिक चिंतित होकर उनसे आंदोलन छोड़ने और सामान्य पारिवारिक जिम्मेदारियां संभालने का बार-बार अनुरोध किया। रिश्तेदारों ने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन उन्होंने किसी की बात नहीं मानी और अपना पूरा जीवन भारत माता के चरणों में समर्पित करने का निर्णय लिया। वे जहां भी जाते, वहां के स्थानीय लोगों को संगठित करते थे। ब्रिटिश पुलिस उन परिवारों को भी प्रताड़ित करती थी जो रामनाथ सिंह को शरण देते थे, लेकिन इसके बावजूद देश के प्रति उनकी निष्ठा कभी डगमगाई नहीं।

अमानवीय यातनाएं और दोनों आंखों की रोशनी का जाना

रामनाथ सिंह के पौत्र सत्यदेव सिंह और गब्बर सिंह ने अपने दादा की आपबीती साझा करते हुए बताया कि वे एक निडर क्रांतिकारी थे जिन्होंने कभी ब्रिटिश हुकूमत के सामने घुटने नहीं टेके। औपनिवेशिक पुलिस ने उन्हें कई बार गिरफ्तार किया, कठोर शारीरिक दंड दिए और जेल की कालकोठरी में बंद रखा। यातनाओं के इसी दौर के दौरान उनकी आंखों की दृष्टि पर गंभीर प्रभाव पड़ा। डॉक्टरों ने उन्हें घर के अंदर रहने और आराम करने की सख्त चिकित्सा सलाह दी थी, लेकिन उन्होंने अपनी शारीरिक स्थिति की परवाह किए बिना क्रांतिकारी गतिविधियों को जारी रखा। अपनी इसी जिद और अदम्य साहस के कारण अंततः उन्होंने अपनी दोनों आंखों की रोशनी पूरी तरह से खो दी, लेकिन उनका हौसला अंत तक कायम रहा।

गांव का ऐतिहासिक 'एक रोटी' जनजागरण अभियान

जब ब्रिटिश हुकूमत ने रामनाथ सिंह और रोहसी बुजुर्ग गांव के अन्य ग्रामीणों को अत्यधिक प्रताड़ित करना शुरू कर दिया, तब उन्होंने आंदोलन को जारी रखने के लिए एक अनोखा और रचनात्मक तरीका निकाला। वे गांव के प्रत्येक घर से केवल एक रोटी मांगकर एकत्र करते थे। इसके बाद वे गांव के बीचों-बीच बने सार्वजनिक चबूतरे पर बैठकर सहजता से वह भोजन करते थे। इसी चबूतरे पर बैठकर वे एकत्र हुए ग्रामीणों को अंग्रेजों के खिलाफ खड़े होने, देशभक्ति की भावना अपनाने और आजादी की लड़ाई में योगदान देने के लिए प्रेरित करते थे। उनका यह व्यावहारिक दृष्टिकोण गांव के लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय हुआ।

1972 का ताम्र पत्र सम्मान और परिजनों की मांग

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में रामनाथ सिंह के अमूल्य योगदान और अप्रतिम बहादुरी की सराहना करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी ने उन्हें सम्मानित किया था। वर्ष 1972 में देश के 25वें स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर उन्हें सरकार की ओर से आधिकारिक ताम्र पत्र प्रदान किया गया था। वर्तमान समय में उनकी स्मृति में गांव में एक स्मारक द्वार बनाया गया है। हालांकि, उनके पौत्र गब्बर सिंह और सत्यदेव सिंह का कहना है कि सरकार को इस स्मारक द्वार को उनके मुख्य द्वार पर स्थापित करना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियां उनके बलिदान से सही सीख ले सकें और उनके योगदान को उचित सम्मान मिल सके।

सवाल-जवाब

रामनाथ सिंह कौन थे?
रामनाथ सिंह उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले की गौरीगंज तहसील स्थित रोहसी बुजुर्ग गांव के एक महान स्वतंत्रता सेनानी थे।
रामनाथ सिंह पहली बार जेल कब गए थे?
रामनाथ सिंह देश की आजादी की लड़ाई के दौरान पहली बार वर्ष 1932 में जेल गए थे।
अंग्रेजों की यातनाओं का रामनाथ सिंह पर क्या प्रभाव पड़ा?
अंग्रेजों की कठोर प्रताड़ना और घर से बाहर न निकलने की डॉक्टरी सलाह के बावजूद आंदोलन जारी रखने के कारण उन्होंने अपनी दोनों आंखों की रोशनी खो दी थी।
रामनाथ सिंह के पोते कौन हैं और उन्होंने क्या बताया?
रामनाथ सिंह के पौत्र सत्यदेव सिंह और गब्बर सिंह हैं, जिन्होंने बताया कि उनके दादा ने देश हित में अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया था।
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने रामनाथ सिंह को कब सम्मानित किया था?
तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी ने वर्ष 1972 में 25वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर उन्हें ताम्र पत्र देकर सम्मानित किया था।
रामनाथ सिंह का 'एक रोटी' मांगने का तरीका क्या था?
अंग्रेजों द्वारा ग्रामीणों को परेशान करने पर वे हर घर से एक रोटी मांगते थे और गांव के चबूतरे पर बैठकर खाते हुए लोगों को जागरूक करते थे।
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