अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और वैश्विक शक्ति संतुलन के संदर्भ में भारत में रूस के राजदूत डेनिस अलीपोव ने स्पष्ट किया है कि भारत का एक वैश्विक महाशक्ति के रूप में स्थापित होना और चीन के अंतरराष्ट्रीय प्रभाव का विस्तार होना एक ऐसा ऐतिहासिक घटनाक्रम है जिसे अब कोई ताकत पीछे नहीं धकेल सकती। एक उच्चस्तरीय रक्षा सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए उन्होंने रेखांकित किया कि एशिया की इन दोनों दिग्गज आर्थिक और रणनीतिक ताकतों का उदय पूरी दुनिया के लिए अपरिहार्य हो चुका है। डेनिस अलीपोव के अनुसार बदलती वैश्विक परिस्थितियों के बीच दोनों एशियाई महाशक्तियों का प्रभाव अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लगातार गहराता जा रहा है।
भारत और रूस के बीच रणनीतिक साझेदारी का नया चरण
रूसी राजदूत ने अपने संबोधन में नई दिल्ली और मॉस्को के बीच दशकों से कायम रणनीतिक रिश्तों के इतिहास और उनकी मजबूती पर विशेष प्रकाश डाला। उन्होंने रेखांकित किया कि मौजूदा दौर में दोनों साझीदार देशों को अपने द्विपक्षीय व्यापार और वित्तीय लेनदेन के तौर-तरीकों में व्यापक विविधता लाने पर काम करना होगा। अलीपोव ने कहा कि दोनों पक्षों को केवल पारंपरिक सेक्टर्स तक सीमित रहने के बजाय नए औद्योगिक और आर्थिक क्षेत्रों में सहयोग के रास्ते तलाशने चाहिए। यह कूटनीतिक रुख ऐसे समय में सामने आया है जब पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों और भू-राजनीतिक दबावों के बीच भारत और रूस अपनी रणनीतिक साझेदारी को एक आधुनिक स्वरूप देने में जुटे हैं।
रक्षा निर्माण और आत्मनिर्भरता के लक्ष्यों पर गहन मंथन
जिस रक्षा सम्मेलन में रूसी राजदूत ने अपने विचार रखे, उसमें प्रमुख नीति-निर्माता, राजनयिक, सैन्य अधिकारी, रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ और रक्षा उपकरण बनाने वाली अग्रणी कंपनियों के प्रतिनिधि शामिल हुए। इस मंच पर भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा, रक्षा निर्माण में आत्मनिर्भरता और आधुनिक रणनीतिक क्षमताओं के विस्तार से जुड़े अहम मुद्दों पर विचार-विमर्श किया गया। सम्मेलन का मुख्य विषय भारत को दुनिया के एक प्रमुख रक्षा निर्माण साझीदार के रूप में स्थापित करने, आत्मनिर्भरता से लेकर वैश्विक नेतृत्व तक के सफर को तय करने, एयरोस्पेस तकनीक को विस्तार देने, साइबर सुरक्षा और गैर-पारंपरिक युद्ध-पद्धतियों से निपटने के तंत्र को मजबूत करने पर केंद्रित रहा।
ब्रिक्स मंच और डॉलर के विकल्पों पर दृष्टिकोण
डेनिस अलीपोव ने वैश्विक व्यापार प्रणाली में अमेरिकी डॉलर पर अत्यधिक निर्भरता को लेकर भी अपनी राय स्पष्ट की। उन्होंने तर्क प्रस्तुत किया कि भारत और ब्रिक्स देशों का आर्थिक विकास लंबे समय तक केवल डॉलर की व्यवस्था पर आश्रित नहीं रह सकता। इसके लिए वैकल्पिक वित्तीय प्रणालियों और व्यापारिक तंत्रों का निर्माण बेहद जरूरी हो चुका है। राजदूत ने स्पष्ट करते हुए कहा, “भारत और ब्रिक्स देशों की ग्रोथ पूरी तरह से अमेरिकी डॉलर पर निर्भर नहीं हो सकती। हमें विकल्पों की जरूरत है।”
उन्होंने साथ ही यह बात भी साफ की कि ब्रिक्स संगठन के भीतर चल रही बातचीत का उद्देश्य डॉलर को पूरी तरह उखाड़ फेंकना या समाप्त करना नहीं है। इसका प्राथमिक लक्ष्य लेन-देन, वित्तीय सहयोग, सीमा-पार निवेश और वाणिज्यिक गतिविधियों के लिए व्यवहार्य विकल्प तैयार करना है। अलीपोव ने कहा, “हमने ब्रिक्स के भीतर डॉलर को बदलने के लिए नहीं, बल्कि लेन-देन, व्यापार, सहयोग और फाइनेंस के लिए विकल्पों पर चर्चा की।”
द्विपक्षीय व्यापार में 96 प्रतिशत लेनदेन स्थानीय मुद्राओं में
रूस और भारत के बीच आपसी कारोबार के वित्तीय ढांचे की जानकारी देते हुए अलीपोव ने बताया कि दोनों देशों ने पहले से ही अपनी-अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं में भुगतान का एक पुख्ता द्विपक्षीय तंत्र विकसित कर लिया है। उन्होंने दावा किया कि दोनों देशों के बीच होने वाला कुल द्विपक्षीय व्यापार लगभग पूरी तरह से स्थानीय मुद्राओं के जरिए संचालित हो रहा है। अलीपोव ने कहा, “द्विपक्षीय स्तर पर, हम अपने लगभग 96 प्रतिशत लेन-देन के लिए अपनी-अपनी करेंसी का इस्तेमाल करते हैं।” इस व्यवस्था ने तीसरे देशों की वित्तीय संस्थाओं पर निर्भरता को काफी हद तक कम कर दिया है।
पश्चिमी प्रतिबंधों पर रूस का कड़ा रुख
अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ओ. ग्राहम द्वारा प्रस्तावित रूस और ईरान पर प्रतिबंध लगाने वाले 2026 के कानून से जुड़े सवाल पर अलीपोव ने सख्त प्रतिक्रिया दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि पश्चिम द्वारा लगाए जाने वाले अतिरिक्त प्रतिबंधों से रूस के बुनियादी उद्देश्यों और नीतियों में कोई बदलाव नहीं आने वाला है। राजदूत ने कहा, “रूस पर पहले से ही 30,000 से ज़्यादा प्रतिबंध लगे हुए हैं, इसलिए एक और प्रतिबंध लगने या न लगने से कोई खास फ़र्क नहीं पड़ता, और अमेरिका यह बात जानता है। इन प्रतिबंधों से हमारा मकसद किसी भी तरह नहीं बदलेगा, और अमेरिका यह भी जानता है।”
इसके बावजूद उन्होंने स्वीकार किया कि ऐसे वित्तीय और कूटनीतिक दबावों का प्रभाव भारत जैसे साझीदार देशों पर अवश्य पड़ता है। अलीपोव का अनुमान है कि वाशिंगटन की ओर से इस तरह के दबाव, नए प्रतिबंधात्मक नियम और कानूनी प्रावधान भविष्य में भी जारी रहेंगे। उन्होंने कहा, “भारत के लिए इससे फ़र्क पड़ता है। मुझे यकीन है कि इस तरह का दबाव और नए कानून या प्रतिबंध आगे भी जारी रहेंगे।”
व्यापार असंतुलन दूर करने के लिए भारतीय निर्यात में बढ़ोतरी की मांग
रूसी राजदूत ने दोनों देशों के बीच मौजूद भारी व्यापार असंतुलन का भी उल्लेख किया और कहा कि मॉस्को भारत से होने वाले आयातों में विविधता देखना चाहता है। वर्तमान समय में ऊर्जा और कच्चे माल के आयात के कारण व्यापार का संतुलन रूस के पक्ष में झुका हुआ है, जिसे संतुलित करना दोनों सरकारों की प्राथमिकता है। उन्होंने कहा, “हम भारत से आम, टेक्सटाइल, इंडस्ट्रियल इक्विपमेंट और कई तरह के सामान का एक्सपोर्ट बढ़ाने पर विचार कर रहे हैं।”
अलीपोव ने आगे जोर देते हुए कहा, “हमें रूस को भारत का एक्सपोर्ट बढ़ाना होगा क्योंकि व्यापार में बहुत ज़्यादा असंतुलन है और हम इसे ठीक करने की कोशिश कर रहे हैं। अब हम अपनी आर्थिक बातचीत में भारत के ज़्यादा तरह के एक्सपोर्ट को शामिल कर रहे हैं।” रूस चाहता है कि भारतीय कृषि उत्पाद, वस्त्र उद्योग और इंजीनियरिंग उपकरण रूसी बाजारों में बड़े पैमाने पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराएं ताकि द्विपक्षीय वाणिज्य अधिक संतुलित और टिकाऊ बन सके।






















