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सहारनपुर की कान्हा उपवन गौशाला ने गोबर से बनाए इको-फ्रेंडली तिरंगा बैच, स्वतंत्रता दिवस पर 5000 की भारी मांगउत्तर प्रदेश
14 अग॰ 2026, 11:09 pm (29 दिन पहले)· 4

सहारनपुर की कान्हा उपवन गौशाला ने गोबर से बनाए इको-फ्रेंडली तिरंगा बैच, स्वतंत्रता दिवस पर 5000 की भारी मांग

सहारनपुर स्थित मां शाकंभरी कान्हा उपवन गौशाला में गाय के गोबर से 100 प्रतिशत बायोडिग्रेडेबल तिरंगा बैच तैयार किए जा रहे हैं, जो उपयोग के बाद मिट्टी में घुलकर पौधों के लिए जैविक खाद बन जाते हैं।

स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर देश भर में देशभक्ति का माहौल रहता है और नागरिक अपनी छाती पर तिरंगा चेस्ट बैच लगाकर 15 अगस्त का पर्व बड़े उत्साह के साथ मनाते हैं। हालांकि, समारोह संपन्न होने के उपरांत प्लास्टिक से बने ये चेस्ट बैच अक्सर सड़कों, कचरे के ढेरों और नालियों में बिखरे पड़े दिखाई देते हैं। इससे न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है, बल्कि राष्ट्रध्वज के मान-सम्मान पर भी आंच आती है। इस गंभीर समस्या का समाधान निकालते हुए उत्तर प्रदेश के सहारनपुर स्थित मां शाकंभरी कान्हा उपवन गौशाला ने गाय के शुद्ध गोबर से बने बायोडिग्रेडेबल तिरंगा बैच तैयार करने की एक नई पहल की है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की पसंदीदा मानी जाने वाली इस गौशाला में बने ये बैच पर्यावरण संरक्षण और देशभक्ति का अनूठा उदाहरण पेश कर रहे हैं।

मिट्टी में मिलते ही जैविक खाद बन जाएगा यह अनोखा बैच

गोबर से तैयार किए गए इस तिरंगा चेस्ट बैच की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह पूरी तरह से बायोडिग्रेडेबल है। राष्ट्रीय पर्व का कार्यक्रम समाप्त होने के बाद लोगों को इसे सड़कों या कचरे में फेंकने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। नागरिक इस बैच को अपने घर के बगीचे, गमलों अथवा पौधों की क्यारियों में रख सकते हैं। पानी और मिट्टी के संपर्क में आने पर यह बैच कुछ ही समय में पूरी तरह घुलकर पौधों के लिए उच्च गुणवत्ता वाली ऑर्गेनिक फर्टिलाइजर यानी जैविक खाद के रूप में बदल जाता है। इस नवाचार के माध्यम से प्लास्टिक प्रदूषण को नियंत्रित करने में मदद मिल रही है और साथ ही राष्ट्रीय ध्वज का गरिमापूर्ण सम्मान भी सुरक्षित रहता है।

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तीन साल पहले पायलट प्रोजेक्ट से हुई थी शुरुआत, इस बार 5000 की डिमांड

पशु चिकित्सा एवं कल्याण अधिकारी डॉ. संदीप मिश्रा के अनुसार, गौशाला में राष्ट्रवाद और पर्यावरण संरक्षण को जोड़ने का यह प्रयास पिछले तीन वर्षों से लगातार चलाया जा रहा है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2024 में इस नवाचार को एक पायलट प्रोजेक्ट के रूप में प्रारंभ किया गया था, जिसके अंतर्गत पहले साल 1000 तिरंगा चेस्ट बैच बनाए गए थे। जनता की ओर से मिली शानदार प्रतिक्रिया को देखते हुए पिछले वर्ष इसकी मांग बढ़कर 3000 हो गई। वहीं इस वर्ष 15 अगस्त के स्वतंत्रता दिवस समारोह के लिए मांग इतनी अधिक बढ़ गई है कि लगभग 5000 तिरंगा चेस्ट बैच तैयार किए जा रहे हैं।

अमेज़न और फ्लिपकार्ट पर भी उपलब्ध, ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों जगह बिक्री

यह गोबर से निर्मित तिरंगा बैच देखने में काफी सुंदर, कलात्मक और उच्च फिनिशिंग वाला है। इसे इस तरह तैयार किया गया है कि इसका मूल्य अत्यंत किफायती रहे और आम नागरिक इसे सुलभता से खरीद सकें। स्थानीय बाजारों में बिक्री के साथ-साथ इस बैच की मांग देश के विभिन्न हिस्सों से आ रही है। नागरिकों की सुविधा के लिए इसे ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म जैसे अमेज़न और फ्लिपकार्ट पर भी बिक्री के लिए उपलब्ध कराया गया है, जिससे लोग इसे सीधे अपने घर मंगवा सकते हैं।

वर्ल्ड रिकॉर्ड और GMP सर्टिफिकेट पाने वाली देश की पहली गौशाला

नगर निगम सहारनपुर द्वारा संचालित मां शाकंभरी कान्हा उपवन गौशाला में वर्तमान समय में 547 गोवंश की देखभाल और संरक्षण किया जा रहा है। यह गौशाला अपने उत्कृष्ट प्रबंधन और नवाचारों के लिए राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति अर्जित कर चुकी है। यह दुनिया की एकमात्र ऐसी गौशाला है जिसके नाम वर्ल्ड रिकॉर्ड दर्ज है। इसके अतिरिक्त, भारत में पहली बार किसी गौशाला को गुड मैन्युफैक्चरिंग प्रैक्टिसेज यानी GMP का प्रमाण पत्र प्रदान किया गया है। यह संस्थान ISO सर्टिफाइड होने के साथ-साथ इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स की तरफ से IBR अचीवर अवार्ड से भी सम्मानित हो चुका है।

गोबर और गोमूत्र से 20 से अधिक उत्पाद, प्रदेश की नंबर 1 आत्मनिर्भर गौशाला

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्वयं इस गौशाला का निरीक्षण कर चुके हैं और यहां के स्वावलंबी मॉडल तथा निर्मित उत्पादों की खुलकर प्रशंसा कर चुके हैं। कान्हा उपवन गौशाला में गाय के गोबर और गोमूत्र की सहायता से 20 से अधिक प्रकार के उत्पाद बनाए जाते हैं, जिनमें धूपबत्ती, कलात्मक मूर्तियां, पूजन दीये, जैविक खाद और प्राकृतिक कीटनाशक शामिल हैं। इन उत्पादों की बिक्री से प्राप्त होने वाली आय से गौशाला का दैनिक संचालन और रखरखाव का खर्च पूरा किया जाता है। इसी मॉडल के बल पर यह संस्थान उत्तर प्रदेश की नंबर 1 आत्मनिर्भर गौशाला बनकर उभरा है।

सवाल-जवाब

गोबर से बना यह तिरंगा बैच कहां तैयार किया जा रहा है?
यह तिरंगा चेस्ट बैच उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में नगर निगम द्वारा संचालित मां शाकंभरी कान्हा उपवन गौशाला में तैयार किया जा रहा है।
उपयोग के बाद इस बायोडिग्रेडेबल तिरंगा बैच का क्या करना चाहिए?
समारोह के बाद इसे फेंके बिना घर के गमलों या बगीचे की मिट्टी में रख दें, जहां पानी के संपर्क में आते ही यह घुलकर पौधों के लिए जैविक खाद बन जाता है।
इस वर्ष कितने तिरंगा चेस्ट बैच बनाए जा रहे हैं?
इस वर्ष 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस के लिए लगभग 5000 तिरंगा चेस्ट बैच तैयार किए जा रहे हैं।
क्या यह तिरंगा बैच ऑनलाइन उपलब्ध है?
हां, स्थानीय बिक्री के साथ-साथ यह बैच अमेज़न और फ्लिपकार्ट जैसे ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर भी उपलब्ध कराया गया है।
मां शाकंभरी कान्हा उपवन गौशाला को कौन-कौन से पुरस्कार मिले हैं?
इस गौशाला के नाम वर्ल्ड रिकॉर्ड दर्ज है और यह GMP प्रमाण पत्र पाने वाली देश की पहली गौशाला है, जिसे ISO और IBR अचीवर अवार्ड भी मिला है।
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टिप्पणियाँ 5

Pooja Bhatt@pooja-bhatt·28 दिन पहले

सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरण के दृष्टिकोण से यह पहल एक महत्वपूर्ण कदम है। पारंपरिक प्लास्टिक और सिंथेटिक रंगों से बने बैचों का कचरा अक्सर मिट्टी और जल स्रोतों को दूषित करता है, जिससे सूक्ष्म प्लास्टिक जनस्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बनता है। इसके विपरीत, गोबर आधारित बायोडिग्रेडेबल उत्पाद न केवल कचरे को कम करते हैं, बल्कि मिट्टी की सेहत सुधारकर पारिस्थितिक संतुलन को भी बढ़ावा देते हैं। यदि इस तरह के नवाचारों को बड़े पैमाने पर स्वास्थ्य और स्वच्छता अभियानों से जोड़ा जाए, तो यह पर्यावरण जनित बीमारियों को रोकने में सहायक हो सकता है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·28 दिन पहले

सहारनपुर की गौशाला का यह नवाचार केवल एक उत्पाद नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय अर्थव्यवस्था को जोड़ने का प्रभावी मॉडल है। पायलट प्रोजेक्ट से शुरू होकर 5000 की मांग तक पहुँचना यह दर्शाता है कि टिकाऊ नीतियों और जन-सहयोग से ग्रामीण आर्थिकी को कैसे सुदृढ़ किया जा सकता है। ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स के जरिए राष्ट्रीय बाजार में इसकी पहुँच सरकारी प्राथमिकताओं के धरातल पर उतरने का प्रमाण है।

Ravikash Gupta@ravikash·28 दिन पहले

सहारनपुर की गौशाला के इस गोबर-निर्मित तिरंगा बैच मॉडल का अमेज़न और फ्लिपकार्ट जैसे ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स पर विस्तार यह रेखांकित करता है कि कैसे पारंपरिक ग्रामीण संसाधनों को डिजिटल अर्थव्यवस्था से जोड़ा जा रहा है। मात्र तीन वर्षों में पायलट प्रोजेक्ट से पाँच हजार की माँग तक का यह सफर इस बात का संकेत है कि हरित उत्पादों और सस्टेनेबल बिजनेस मॉडल्स के लिए एक बड़ा राष्ट्रीय बाज़ार तेज़ी से विकसित हो रहा है, जो भविष्य में ग्रामीण स्तर पर सूक्ष्म उद्यमों के लिए वित्तीय स्थिरता के नए रास्ते खोल सकता है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·28 दिन पहले

सहारनपुर की गौशाला का यह नवाचार पर्यावरण संरक्षण और कानून-व्यवस्था के दायरे में एक सराहनीय कदम है। अक्सर राष्ट्रीय पर्वों के बाद प्लास्टिक के कचरे के प्रबंधन में स्थानीय प्रशासन को कठिनाई होती है, जिससे सार्वजनिक सुरक्षा और स्वच्छता नियमों पर भी प्रभाव पड़ता है। गोबर से बने इन बायोडिग्रेडेबल बैचों से न केवल अपशिष्ट नियंत्रण में मदद मिलेगी, बल्कि कचरे में राष्ट्रीय ध्वज के अपमान की अनजाने में होने वाली घटनाओं पर भी प्रभावी रोक लगेगी।

Rohan Verma@rohan-verma·28 दिन पहले

यह पहल दर्शाती है कि कैसे पारंपरिक गौशालाएं ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सतत विकास का केंद्र बन सकती हैं। अमेज़न और फ्लिपकार्ट जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से स्थानीय स्तर पर तैयार इन उत्पादों की राष्ट्रीय पहुंच से आजीविका के नए अवसर पैदा हो रहे हैं। भविष्य में इस मॉडल को उत्तर प्रदेश के अन्य जिलों में भी लागू किया जाना चाहिए ताकि ग्रामीण रोजगार को बढ़ावा मिले और प्लास्टिक प्रदूषण के खिलाफ राज्यव्यापी अभियान को मजबूती मिल सके।

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