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संग्रामपुर क्षेत्र में दो शताब्दियों से खड़ा ठेंगहा ईंट पुल, जानिए अमेठी के इस ऐतिहासिक स्थल की अनकही दास्तानभारत
29 जुल॰ 2026, 9:40 am (45 दिन पहले)· 0

संग्रामपुर क्षेत्र में दो शताब्दियों से खड़ा ठेंगहा ईंट पुल, जानिए अमेठी के इस ऐतिहासिक स्थल की अनकही दास्तान

प्रतापगढ़ और अमेठी मार्ग पर स्थित 1820 ईस्वी का ऐतिहासिक ठेंगहा पुल और 1845 ईस्वी का राजा का बांध इस क्षेत्र की प्राचीन वास्तुकला तथा जल प्रबंधन व्यवस्था का बेजोड़ उदाहरण हैं।

उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले में संग्रामपुर क्षेत्र के ठेंगहा में स्थित ईंटों से बना ऐतिहासिक पुल पिछले दो सौ से अधिक वर्षों से अपनी प्राचीन वास्तुकला और समृद्ध इतिहास की गवाही दे रहा है। प्रतापगढ़ और अमेठी को आपस में जोड़ने वाले मुख्य मार्ग पर स्थित यह स्थान न केवल अपनी निर्माण शैली बल्कि अपने पौराणिक और सामाजिक महत्व के लिए भी जाना जाता है। इस स्थल का निर्माण ब्रिटिश काल के दौरान कराया गया था और आज भी यह क्षेत्र की एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक धरोहर माना जाता है।

1820 ईस्वी में हुआ था ठेंगहा पुल का निर्माण

नाजिम गुलाम हुसैन ने सन् 1820 ईस्वी में ठेंगहा नदी पर इस ऐतिहासिक ईंट के पुल का निर्माण करवाया था। इस पुल के निचले हिस्से से मालती नदी प्रवाहित होती है। जल संरचनाओं के दृष्टिकोण से यह क्षेत्र अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। ठेंगहा नदी का मुख्य उद्गम स्थल परगना जामो के अंतर्गत आने वाला मछियाँव ताल है। प्राचीन काल से ही इस नदी प्रणाली ने स्थानीय क्षेत्र में जल प्रबंधन और आवागमन को सुगम बनाने में अहम भूमिका निभाई है।

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बाढ़ नियंत्रण के लिए खुदवाया गया था राजा का बांध

अमेठी रियासत के राजा विशेषरबक्स सिंह ने सन् 1845 ईस्वी में अपने राज्य को भीषण बाढ़ के प्रकोप से बचाने के लिए एक दूरदर्शी कदम उठाया था। उन्होंने राज्य की विभिन्न झीलों से जल निकासी सुनिश्चित करने के लिए एक विशाल और चौड़ा नाला खुदवाया था। स्थानीय जनमानस में इस नाले को आज भी 'राजा का बांध' के नाम से जाना जाता है। यह जलधारा आगे जाकर चमरौड़ा नदी में मिलकर उसकी एक प्रमुख सहायक नदी बन गई और भादर के समीप से बहने लगी। हाल के समय में जल प्रवाह को बेहतर बनाए रखने के लिए इसकी दोबारा खुदाई भी कराई गई है।

लाल बाबा मंदिर की स्थापना और पुल की मान्यताएं

इस ऐतिहासिक स्थल के संबंध में स्थानीय इतिहासकार और प्रवक्ता डॉ. अर्जुन पांडे बताते हैं कि इस स्थान की प्रसिद्धि के पीछे एक अनूठी मान्यता जुड़ी हुई है। प्राचीन समय में जब भी इस पुल का निर्माण किया जाता था, तो यह बार-बार ढह जाता था। लगातार हो रहे हादसों के बाद स्थानीय लोगों को कुछ धार्मिक संकेत मिले। इसके उपरांत वहां विधिवत पूजा-पाठ का आयोजन किया गया और लाल बाबा का मंदिर स्थापित किया गया। मंदिर निर्माण के बाद से यह पुल पूरी तरह सुरक्षित रहा और यह स्थान दूर-दूर तक प्रसिद्ध हो गया।

प्राचीन वास्तुकला और मानव सभ्यता का अटूट संबंध

अमेठी में केवल ठेंगहा पुल ही नहीं, बल्कि उस दौर की कई अन्य ऐतिहासिक इमारतें आज भी सुरक्षित मौजूद हैं। इनमें राजा का भव्य राजमहल, प्राचीन वास्तुकला का बेहतरीन उदाहरण बावली का कुआं और नवग्रह सागर जैसे जल निकाय शामिल हैं। इतिहासकार और प्रवक्ता डॉ. अर्जुन पांडे का मानना है कि इतिहास और भूगोल दोनों ही विषयों में जल की महत्ता सर्वोपरि रही है। प्राचीन सर्वेक्षणों से यह स्पष्ट होता है कि विश्व की अधिकांश मानव सभ्यताएं नदियों, नालों और झीलों के किनारे ही विकसित हुई हैं, और अमेठी की ये धरोहरें उसी समृद्ध परंपरा की प्रतीक हैं।

सवाल-जवाब

ठेंगहा पुल का निर्माण कब और किसने करवाया था?
ठेंगहा पुल का निर्माण सन् 1820 ईस्वी में नाजिम गुलाम हुसैन ने करवाया था।
ठेंगहा पुल के नीचे से कौन सी नदी गुजरती है और ठेंगहा नदी का उद्गम कहाँ है?
ठेंगहा पुल के नीचे से मालती नदी गुजरती है, जबकि ठेंगहा नदी का उद्गम स्थल परगना जामो का मछियाँव ताल है।
'राजा का बांध' किसने और क्यों बनवाया था?
सन् 1845 ईस्वी में अमेठी के राजा विशेषरबक्स सिंह ने राज्य की झीलों से बाढ़ के पानी की निकासी के लिए यह चौड़ा नाला खुदवाया था, जिसे 'राजा का बांध' कहा गया।
लाल बाबा मंदिर की स्थापना क्यों की गई थी?
बार-बार पुल गिरने के बाद मिले धार्मिक संकेतों के आधार पर पूजा-पाठ कराकर लाल बाबा मंदिर की स्थापना की गई थी, जिसके बाद पुल स्थायी रूप से टिका रहा।
अमेठी में ठेंगहा पुल के अलावा कौन सी अन्य ऐतिहासिक धरोहरें मौजूद हैं?
अमेठी में राजा का राजमहल, बावली का कुआं और नवग्रह सागर जैसी कई अन्य प्राचीन धरोहरें आज भी मौजूद हैं।
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