शहरी यातायात में ईंधन की खपत और जहरीले धुएं पर लगाम लगाने के लिए अक्सर साझा वाहनों के इस्तेमाल पर जोर दिया जाता है। काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर के एक नए शोध पत्र में यह तथ्य सामने आया है कि यदि समूह बीस की अर्थव्यवस्थाओं में लोग अपनी दैनिक आवाजाही के तौर-तरीके सुधार लें, तो दुनिया भर में भारी पैमाने पर वित्तीय और पर्यावरणीय राहत मिल सकती है। इलेक्ट्रिक वाहनों के विस्तार के समानांतर ही साझा गाड़ियों, सार्वजनिक बसों और घर व दफ्तर के मिले-जुले कार्य मॉडल से साल 2050 तक सालाना 408 से 538 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड की कटौती मुमकिन है। यह वार्षिक कमी वर्ष 2024 के दौरान दक्षिण अफ्रीका से निकले कुल कार्बन प्रदूषण के बराबर बैठती है।
जीवनशैली में सुधार और वैश्विक अर्थव्यवस्था
यह विश्लेषण भारत द्वारा कॉप-26 के मंच पर पेश किए गए मिशन लाइफ की रूपरेखा पर तैयार किया गया है, जिसका मूल मंत्र रोजमर्रा के व्यक्तिगत फैसलों में पर्यावरण-अनुकूल और टिकाऊ विकल्पों को प्राथमिकता देना है। शोधकर्ताओं ने एक परिदृश्य गढ़ा कि यदि समूह बीस के सदस्य देश इन व्यवहारगत बदलावों को सामूहिक रूप से अपनाते हैं, तो उसका असर किस रूप में सामने आएगा। आंकड़ों की पड़ताल से साफ होता है कि साझा सफर, मिश्रित कामकाज और बसों की सवारी से मिलने वाले फायदे हर मुल्क में एक जैसे नहीं होंगे। जिन मुल्कों में निजी गाड़ियां बहुतायत में हैं और लोग लंबी दूरी तय करते हैं, वहां इसका लाभ सबसे व्यापक दिखेगा।
समग्र कार्बन कटौती का अस्सी से अठासी फीसदी हिस्सा संपन्न मुल्कों और चीन के हिस्से में जाएगा। अगर केवल संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय संघ के पंद्रह प्रमुख देशों को देखा जाए, तो इस पूरी बचत में उनकी हिस्सेदारी इकसठ से तरेसठ प्रतिशत होगी। आबादी के लिहाज से देखें तो यह फासला और गहरा हो जाता है। एक औसत अमेरिकी नागरिक द्वारा की जाने वाली संभावित कार्बन बचत भारत के एक आम नागरिक की तुलना में छप्पन गुना अधिक आंकी गई है। इससे जाहिर होता है कि वैश्विक स्तर पर भारतीय नागरिकों का मौजूदा व्यक्तिगत उत्सर्जन स्तर पहले से ही बहुत सीमित है।
उत्पादन के बजाय उपभोग पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत
काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर के वरिष्ठ फेलो डॉ. वैभव चतुर्वेदी ने अध्ययन के नतीजों पर रोशनी डालते हुए रेखांकित किया कि मिशन लाइफ की मूल भावना जलवायु प्रयासों को केवल उत्पादन केंद्रित न रखकर जिम्मेदार उपभोग से जोड़ने की रही है। उन्होंने कहा, "परिवहन व्यवहार में बदलाव का सबसे बड़ा फायदा उन अर्थव्यवस्थाओं को मिल सकता है, जहां पर उत्सर्जन सबसे ज्यादा है और जहां पर आवागमन सबसे ज्यादा कारों से ही हो रहा है।" उनके अनुसार, यह पहल बेहतर कार्यस्थलों, समझदार नगर नियोजन और पेट्रोलियम उत्पादों पर निर्भरता कम करने के लिए एक वैश्विक खाका खींचती है।
पेट्रोलियम आयात और अरबों डॉलर की संभावित बचत
ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करने के नजरिए से भी यह बदलाव खासा अहम साबित हो सकता है। सर्वाधिक पेट्रोलियम फूंकने वाले मुल्कों को ही इस नीति से सबसे बड़ा मौद्रिक लाभ मिलेगा, क्योंकि विशालकाय वाहन बेड़े और लंबी यात्राएं उन्हें ईंधन का सबसे बड़ा उपभोक्ता बनाती हैं। वर्ष 2025 से 2050 के दौरान दैनिक आदतों में परिवर्तन लाकर करीब 2,715 मिलियन टन तेल की खपत टाली जा सकती है। यह परिमाण वर्ष 2024 की कुल अंतरराष्ट्रीय तेल मांग के उनसठ प्रतिशत के समतुल्य है। अप्रैल 2026 में दर्ज तेल दरों के आकलन के अनुसार, इस बची हुई ऊर्जा का मौद्रिक मूल्य लगभग 2.3 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर बैठता है।
केवल साझा कार प्रणाली के जरिए ही समूह बीस की अर्थव्यवस्थाएं वर्ष 2050 तक हर साल करीब 90 बिलियन अमेरिकी डॉलर के तेल खर्च में कटौती कर सकती हैं। इतना ही नहीं, निजी कारों को आपस में साझा करने भर से वर्ष 2050 में इन देशों के यात्री परिवहन से पैदा होने वाले प्रदूषण में सालाना बीस फीसदी तक की गिरावट दर्ज की जा सकती है। मौजूदा भू-राजनीतिक उथल-पुथल के दौर में, जब कच्चे तेल के भाव में लगातार अस्थिरता बनी रहती है, संवेदनशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए यह नीतिगत ढाल का काम कर सकती है।
भारतीय संदर्भ में सीमित प्रभाव का कारण
अध्ययन के मुताबिक, गाड़ियों को साझा करना अकेला ऐसा साधन है जो हर साल 236 से 411 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड को वातावरण में जाने से रोक सकता है। फिर भी, इस संभावित लाभ का बानवे प्रतिशत तक हिस्सा अमीर देशों और चीन की झोली में ही सिमटा रहेगा। इसकी मुख्य वजह यह है कि वहां प्रति परिवार कारों की संख्या अत्यधिक है, सार्वजनिक साधनों पर निर्भरता बहुत कम है और एक गाड़ी में आमतौर पर केवल एक ही व्यक्ति सफर करता है।
इसके विपरीत, भारत में इस तरह के उपायों से कार्बन में भारी उछाल भरी बचत नहीं दिखेगी। भारतीय समाज में निजी चौपहिया वाहनों पर निर्भरता अपेक्षाकृत बहुत कम है, और जब गाड़ियां सड़कों पर निकलती भी हैं तो उनमें आमतौर पर परिवार या कई लोग एक साथ सवार होते हैं। संस्था की कार्यक्रम सहयोगी रोहिणी दीक्षित ने स्पष्ट किया कि भौगोलिक परिस्थितियां उत्सर्जन बचत के नतीजों को पूरी तरह बदल देती हैं। उन्होंने कहा, "विकसित देशों और चीन में कुल बचत की संभावना सबसे अधिक है, क्योंकि उनकी आवागमन व्यवस्था कारों पर अधिक निर्भर है, जबकि भारत की प्रति व्यक्ति उत्सर्जन बचत संभावना बहुत कम है।"
दीक्षित का मानना है कि विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के पास यह एक सुनहरा अवसर है कि वे पश्चिमी देशों की तरह अपनी व्यवस्था को निजी चौपहिया वाहनों पर पूरी तरह आश्रित न होने दें, बल्कि शुरुआत से ही कुशल सार्वजनिक परिवहन नेटवर्क को तरजीह दें।



















