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सात दशकों से शराब की एक बूंद नहीं बिकी, सूर्यापेट के बंदापालेम ने पेश की अनोखी नजीरतेलंगाना
24 सित॰ 2026, 4:51 pm (7 दिन पहले)· 1

सात दशकों से शराब की एक बूंद नहीं बिकी, सूर्यापेट के बंदापालेम ने पेश की अनोखी नजीर

तेलंगाना के सूर्यापेट स्थित बंदापालेम गांव में पिछले 70 वर्षों से सख्त शराबबंदी लागू है, जहां कड़े सामाजिक नियमों और एकजुटता के दम पर घरेलू हिंसा और झगड़ों पर पूरी तरह लगाम लगी हुई है।

सामूहिक इच्छाशक्ति और सामाजिक अनुशासन किसी भी ग्रामीण परिवेश की सूरत कैसे बदल सकते हैं, इसका सशक्त प्रमाण तेलंगाना के सूर्यापेट जिले का बंदापालेम गांव प्रस्तुत कर रहा है। इस बस्ती में पिछले 70 सालों से शराब की बिक्री और सेवन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा हुआ है। सात दशकों से चली आ रही इस अटूट परंपरा के चलते गांव में न तो घरेलू हिंसा की घटनाएं सामने आती हैं और न ही परिवारों या पड़ोसियों के बीच बेवजह विवाद होते हैं, जिसके कारण यह क्षेत्र पूरे देश के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण बन गया है।

कड़े सामाजिक कायदे और पूर्वजों की दूरदर्शी सीख

बंदापालेम की आबादी में मुख्य रूप से छोटे किसान और खेतिहर मजदूर शामिल हैं। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि यह व्यवस्था किसी सरकारी आदेश के बजाय उनके पुरखों के समय से चली आ रही सहमति पर टिकी है। ग्रामीणों ने दशकों पहले ही इस बात को भलीभांति पहचान लिया था कि नशे की लत न केवल गाढ़े पसीने की कमाई को लील जाती है, बल्कि सुखी परिवारों को तबाह कर गांव का सामाजिक ताना-बाना और शांति भी नष्ट कर देती है। इसी समझ को आधार बनाकर ग्रामीणों ने एकजुट होकर शराब को हमेशा के लिए बाहर रखने का संकल्प लिया।

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माफिया के प्रयासों पर महिलाओं का तीखा प्रहार

इस कड़े फैसले को बनाए रखने का सफर आसान नहीं रहा। समय-समय पर बाहरी तत्वों और अवैध शराब माफिया ने गांव में ठेके खोलने, भंडारण केंद्र स्थापित करने या कच्ची शराब की भट्ठियां लगाने के प्रयास किए। हालांकि, हर बार पूरे गांव ने एक आवाज में इन कोशिशों को नाकाम कर दिया। विशेष रूप से गांव की महिलाओं ने इस अभियान में सबसे आगे आकर मोर्चा संभाला। महिलाओं ने अवैध शराब की भट्ठियों और बर्तनों को मौके पर ही तोड़ दिया और धंधा करने वालों को गांव की परिधि से खदेड़ बाहर किया।

पंचायत के कड़े दंड और सीमा पर पहरा

गांव की पंचायत ने इस व्यवस्था को कायम रखने के लिए बेहद सख्त कानूनी और सामाजिक नियम बनाए हैं। यदि गांव का कोई भी स्थानीय निवासी शराब का सेवन करते अथवा उसे बेचते हुए पकड़ा जाता है, तो उस पर भारी आर्थिक जुर्माना लगाया जाता है। इसके अलावा, गांव की सीमा को लेकर भी सख्त प्रावधान है। अगर कोई व्यक्ति बाहर के किसी कस्बे या दूसरे गांव से शराब पीकर लौटता है, तो उसे गांव की सीमा के भीतर घुसने की अनुमति तक नहीं दी जाती है।

आर्थिक स्थिरता और विवादमुक्त वातावरण

इस सामूहिक संयम और निगरानी का नतीजा है कि बंदापालेम में कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस को दखल देने की नौबत ही नहीं आती। शराब की फिजूलखर्ची से बचने वाला धन ग्रामीण अपने बच्चों की उच्च शिक्षा, स्वास्थ्य और घरेलू जरूरतों पर लगा रहे हैं, जिससे छोटे किसानों और मजदूरों की आर्थिक स्थिति पहले से कहीं अधिक सुदृढ़ हुई है। यह मॉडल दर्शाता है कि यदि ग्रामीण समाज आपस में दृढ़ संकल्प कर ले, तो बिना किसी बाहरी दबाव के एक शांत, सुरक्षित और नशामुक्त समाज स्थापित किया जा सकता है।

सवाल-जवाब

बंदापालेम गांव किस जिले और राज्य में स्थित है?
बंदापालेम गांव तेलंगाना के सूर्यापेट जिले में स्थित है।
इस गांव में कितने वर्षों से शराबबंदी लागू है?
इस गांव में पिछले 70 वर्षों (लगभग सात दशकों) से सख्त शराबबंदी लागू है।
गांव के लोग मुख्य रूप से क्या काम करते हैं?
बंदापालेम के अधिकांश निवासी छोटे किसान और खेतिहर मजदूर हैं।
शराब पीने या बेचने पर पंचायत क्या कार्रवाई करती है?
यदि कोई व्यक्ति शराब पीते या बेचते पकड़ा जाता है तो पंचायत उस पर भारी आर्थिक जुर्माना लगाती है।
यदि कोई बाहर से शराब पीकर आता है तो क्या नियम है?
अगर कोई व्यक्ति किसी दूसरे कस्बे या गांव से शराब पीकर आता है, तो उसे बंदापालेम की सीमा में प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी जाती है।
इस शराबबंदी का गांव की आर्थिक स्थिति पर क्या असर पड़ा?
शराब पर खर्च होने वाले पैसे की बचत से ग्रामीण अपने बच्चों की शिक्षा और बुनियादी जरूरतों को पूरा कर रहे हैं, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Sandeep Yadav@sandeep-yadav·6 दिन पहले

सत्तर साल से एक बूंद शराब न बिकना वाकई बड़ी बात है। सोच रहा हूं कि आज की पीढ़ी जब बाहर पढ़ने या काम के लिए जाती है, तब भी क्या इस नियम को ऐसे ही मानती होगी?

Arjun Mehta@arjun-mehta·6 दिन पहले

सरकारी शराब नीति और ठेकों पर रोज़ होने वाली बहस के बीच ऐसा गांव देखना वाकई सुकून देता है जहां लोगों ने खुद मिलकर बिना किसी कानून के यह फैसला लिया। जब समाज खुद ठान ले तो पुलिस और अदालतों की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।

Sophie Laurent@sophie-laurent·6 दिन पहले

अर्जुन, बिल्कुल सही कहा आपने। यूरोप में भी कई छोटे समुदाय स्थानीय स्तर पर ऐसे नियम बनाते हैं जहाँ पुलिस की ज़रूरत नहीं पड़ती।

Karan Malhotra@karan-malhotra·6 दिन पहले

तेलंगाना के इस गांव की बात सुनकर मुझे अपने पुराने दिनों का एक मामला याद आ गया जब एक दूसरे इलाके में महिलाओं ने ऐसी ही भट्ठियों के खिलाफ मोर्चा संभाला था। जब लोग खुद तय कर लें कि नशा नहीं चाहिए, तो पुलिस और कानून की जरूरत ही नहीं पड़ती।

Ravikash Gupta@ravikash·6 दिन पहले

करण जी, आपकी बात बिल्कुल सही है। जब मैं कुछ साल पहले रिपोर्टिंग के सिलसिले में एक ग्रामीण इलाके में गया था, तो वहां भी महिलाओं ने खुद ही अवैध शराब के ठेके बंद करवाए थे।

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