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शिमला के सरकारी डेंटल कॉलेज में एमडीएस डॉक्टरों का फूटा गुस्सा, स्टाइपेंड और हॉस्टल की मांग को लेकर दी ओपीडी बंद करने की चेतावनीहिमाचल प्रदेश
3 नव॰ 2026, 9:43 pm (3 दिन पहले)· 0

शिमला के सरकारी डेंटल कॉलेज में एमडीएस डॉक्टरों का फूटा गुस्सा, स्टाइपेंड और हॉस्टल की मांग को लेकर दी ओपीडी बंद करने की चेतावनी

शिमला के राजकीय दंत महाविद्यालय में तीन महीने से मानदेय न मिलने और मरीजों के लिए जेब से सामान खरीदने पर रेजिडेंट डॉक्टरों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है। डॉक्टरों ने मांगें पूरी न होने पर ओपीडी सेवाएं पूरी तरह ठप करने का अल्टीमेटम दिया है।

हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला स्थित राजकीय दंत महाविद्यालय एवं अस्पताल में स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर रहे एमडीएस रेजिडेंट डॉक्टरों का सब्र आखिरकार टूट गया है। संस्थान परिसर में एकत्रित होकर डॉक्टरों ने बकाया स्टाइपेंड, रहने के लिए हॉस्टल की अनुपलब्धता और अस्पताल में उपचार सामग्री की भारी कमी के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों का स्पष्ट कहना है कि लगातार तीन महीनों से उन्हें मानदेय जारी नहीं किया गया है, जिसके चलते रोजमर्रा के खर्च चलाने के साथ-साथ अस्पताल में आने वाले मरीजों के दंत उपचार के लिए आवश्यक उपकरण और सामग्री भी उन्हें अपनी जेब से खरीदनी पड़ रही है।

'नो स्टाइपेंड, नो वर्क' के नारों से गूंजा कॉलेज परिसर

विरोध जताने के लिए कैंपस में जुटे डॉक्टरों ने व्यवस्था के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। प्रदर्शन के दौरान 'नो स्टाइपेंड, नो वर्क' और 'ना बहाने, ना इनकार, हमें चाहिए अपना अधिकार' जैसे नारे गूंजते रहे। डॉक्टरों ने बताया कि नेशनल डेंटल कमीशन (एनडीसी) के स्पष्ट नियमों के मुताबिक सभी रेजिडेंट डॉक्टरों को हर माह के पहले हफ्ते में मानदेय का भुगतान हो जाना चाहिए। इसके विपरीत, शिमला के इस सरकारी कॉलेज में हर बार दो से तीन महीने की भारी देरी के बाद ही स्टाइपेंड जारी होता है। डॉ. प्रणव ने अपनी परेशानी साझा करते हुए बताया कि वे एमडीएस के तीसरे वर्ष में हैं, लेकिन आज भी अपने हक के पैसे मांगने के लिए उन्हें लगातार प्रशासनिक दफ्तरों की चौखट लांघनी पड़ती है। जब भी वे हिसाब विभाग में जाते हैं, उन्हें कोई निश्चित तारीख बताने के बजाय केवल एक टेबल से दूसरी टेबल तक दौड़ाया जाता है।

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1998 से संचालित संस्थान में आज तक नहीं बना हॉस्टल

वित्तीय संकट के अलावा रेजिडेंट डॉक्टरों ने आवास से जुड़ी गंभीर समस्याओं को भी उजागर किया। डॉ. हृदेश कुमार दीक्षित ने जानकारी दी कि यह डेंटल कॉलेज वर्ष 1998 में स्थापित हुआ था, लेकिन लगभग ढाई दशक बीत जाने के बावजूद आज तक यहां रेजिडेंट डॉक्टरों के लिए आधिकारिक हॉस्टल की व्यवस्था नहीं की जा सकी है। हॉस्टल न होने के कारण डॉक्टरों को मजबूरी में संजौली और उसके नजदीकी इलाकों में महंगे कमरों का किराया देकर रहना पड़ता है। कुछ डॉक्टरों को जंगल से सटे सुदूर क्षेत्रों में शरण लेनी पड़ी है, जहां सुरक्षा के भारी जोखिम बने रहते हैं। हाल ही में जंगल किनारे रहने वाले एक रेजिडेंट डॉक्टर पर बंदरों के हिंसक हमले की घटना भी सामने आ चुकी है, जिससे डॉक्टरों की व्यक्तिगत सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।

मरीजों के इलाज का सामान अपनी जेब से खरीदने की मजबूरी और हड़ताल का अल्टीमेटम

अस्पताल की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए डॉ. तनुजा ठाकुर ने बताया कि विभाग में मरीजों के बेसिक इलाज के लिए जरूरी सामग्री तक उपलब्ध नहीं कराई जाती। ऐसे में मरीजों की तकलीफ दूर करने के लिए डॉक्टरों को खुद बाजार जाकर अपनी जेब से चिकित्सा सामग्री खरीदनी पड़ती है। एक तरफ तीन महीने से स्टाइपेंड रुका हुआ है, दूसरी ओर कमरे का किराया और मरीजों का सामान खरीदने का दोहरा वित्तीय बोझ उन्हें पूरी तरह तोड़ रहा है। डॉक्टरों ने अपनी समस्याओं को लेकर कॉलेज के प्रिंसिपल को औपचारिक पत्र सौंप दिया है और दो टूक चेतावनी दी है कि यदि जल्द से जल्द उनकी समस्याओं का निवारण नहीं किया गया, तो वे ओपीडी सेवाएं ठप कर पूर्ण हड़ताल पर चले जाएंगे। इस पूरे मामले पर कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. योगेश भारद्वाज ने भरोसा दिलाया है कि एमडीएस रेजिडेंट डॉक्टरों के लंबित मानदेय को जारी करने की प्रक्रिया तेज कर दी गई है और संबंधित फाइलों पर उनके हस्ताक्षर होते ही भुगतान कर दिया जाएगा।

सवाल-जवाब

शिमला के सरकारी डेंटल कॉलेज में डॉक्टर विरोध प्रदर्शन क्यों कर रहे हैं?
एमडीएस रेजिडेंट डॉक्टरों को पिछले तीन महीने से स्टाइपेंड नहीं मिला है और अस्पताल में मरीजों के इलाज के लिए जरूरी सामान उन्हें अपनी जेब से खरीदना पड़ रहा है।
रेजिडेंट डॉक्टरों के मानदेय को लेकर नेशनल डेंटल कमीशन के क्या नियम हैं?
एनडीसी के नियमों के अनुसार रेजिडेंट डॉक्टरों का स्टाइपेंड हर महीने के पहले सप्ताह में मिल जाना चाहिए।
डॉक्टरों को रहने के लिए क्या समस्याएं आ रही हैं?
कॉलेज में 1998 से आज तक डॉक्टरों के लिए हॉस्टल सुविधा नहीं है, जिससे उन्हें संजौली और आसपास के क्षेत्रों में किराये पर रहना पड़ता है जहां हाल ही में एक डॉक्टर पर बंदरों का हमला भी हुआ था।
यदि डॉक्टरों की मांगें पूरी नहीं हुईं तो क्या कदम उठाया जाएगा?
डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगें तुरंत पूरी नहीं की गईं तो वे अस्पताल की ओपीडी सेवाएं बंद करके हड़ताल पर चले जाएंगे।
कॉलेज के प्रिंसिपल ने इस पूरे मामले पर क्या आश्वासन दिया है?
प्रिंसिपल डॉ. योगेश भारद्वाज ने कहा है कि लंबित स्टाइपेंड जारी करने की प्रक्रिया चल रही है और आवश्यक फाइलों पर हस्ताक्षर होने के बाद इसे जल्द जारी कर दिया जाएगा।
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टिप्पणियाँ 5

Laxmi Gupta@laxmi-gupta·2 दिन पहले

इन डॉक्टरों को तीन महीने से पैसे नहीं मिले और ऊपर से अपनी जेब से सामान खरीदना पड़ रहा है, ऐसे में ये लोग कैसे काम चला रहे होंगे?

Arjun Mehta@arjun-mehta·2 दिन पहले

तीन महीने से डॉक्टरों को पैसे नहीं मिले और वे खुद जेब से मरीजों के इलाज का सामान खरीद रहे हैं, तो अस्पताल प्रशासन आखिर किस बात की तनख्वाह ले रहा है?

Ravikash Gupta@ravikash·2 दिन पहले

अजय भाई, सही कहा आपने! जब मैनेजमेंट अपनी जेब से खर्च नहीं करता, तो डॉक्टरों पर बोझ डालना आसान हो जाता है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·2 दिन पहले

डॉक्टरों को खुद अपनी जेब से मरीजों के इलाज का सामान खरीदना पड़ रहा है और तीन महीने से सैलरी भी नहीं मिली है, ऐसे में ओपीडी बंद करने की चेतावनी देना बिलकुल स्वाभाविक है।

Rohan Verma@rohan-verma·2 दिन पहले

करण भाई, बात बिल्कुल सही है। जब डॉक्टर खुद पैसे लगाकर इलाज करेंगे और महीनेभर पारिश्रमिक भी नहीं मिलेगा, तो गुस्सा फूटेगा ही।

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