पच्चीस दिनों तक चलने वाले संसद के बहुप्रतीक्षित मॉनसून सत्र की शुरुआत अत्यधिक हंगामेदार और निराशाजनक रही है। आधिकारिक कैलेंडर के अनुसार, इस पूरे सत्र के दौरान कुल 19 महत्वपूर्ण बैठकें निर्धारित की गई हैं, जिनमें कई अहम विधायी कार्यों और नीतिगत सुधारों पर चर्चा होनी थी। हालांकि, सत्र के पहले ही दिन जिस तरह का भारी बवाल और शोरगुल देखने को मिला, उसने साफ तौर पर इस बात का ट्रेलर दिखा दिया है कि आने वाले दिनों में संसद के भीतर का राजनीतिक माहौल कितना तनावपूर्ण रहने वाला है। रचनात्मक बहस और संवाद के बजाय, संसद के दोनों सदनों—लोकसभा और राज्यसभा—में शुरुआत से ही विपक्ष ने बेहद आक्रामक रुख अपनाते हुए जोरदार हंगामा किया, जिसने पूरे विधायी कामकाज को पूरी तरह से ठप कर दिया।
अगर पहले दिन की कार्यवाही की टाइमलाइन पर नजर डालें, तो स्थिति की गंभीरता का साफ अंदाजा लगाया जा सकता है। तय कार्यक्रम के अनुसार, सुबह 11 बजे दोनों सदनों की कार्यवाही विधिवत रूप से शुरू की गई। लेकिन निचले सदन यानी लोकसभा में कार्यवाही बमुश्किल 13 मिनट ही चल पाई कि विपक्षी सांसदों के भारी विरोध और नारेबाजी के कारण इसे रोकना पड़ गया। उच्च सदन यानी राज्यसभा में भी हालात कुछ खास अलग नहीं थे, वहां भी मुश्किल से आधा घंटा ही कामकाज हो सका और फिर सदन को स्थगित करने की नौबत आ गई। इसके बाद पूरे दिन भर सदन को फिर से शुरू करने और स्थगित करने का यही निराशाजनक सिलसिला चलता रहा। कार्यवाही को जब दोबारा शुरू करने की कोशिश की गई, तो वह कभी सिर्फ 3 मिनट चल सकी, तो कभी मात्र 2 मिनट। हर बार जैसे ही कामकाज शुरू करने का प्रयास होता, विपक्षी सदस्यों का हंगामा इतना तेज हो जाता कि पीठासीन अधिकारियों को मजबूरन कार्यवाही रोकनी पड़ती।
शांति की सभी अपीलें रहीं बेअसर
सदन में मचे इस भारी बवाल के बीच दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारी लगातार व्यवस्था बनाए रखने की कोशिश करते रहे। लोकसभा में स्पीकर ने बार-बार विपक्षी सांसदों से अपनी निर्धारित सीटों पर लौटने और सदन की कार्यवाही को सुचारू रूप से चलने देने की अपील की। इसी तरह का नजारा राज्यसभा में भी देखने को मिला, जहां सभापति महोदय लगातार सदस्यों से शांति बनाए रखने और लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सम्मान करने का आग्रह करते रहे। लेकिन इन तमाम कोशिशों और अपीलों का हंगामा कर रहे सांसदों पर कोई भी असर नहीं हुआ। दोपहर बाद तो स्थिति तब और ज्यादा नियंत्रण से बाहर हो गई, जब विपक्षी सांसद अपने हाथों में विरोध दर्ज कराने वाले प्लेकार्ड लेकर सदन के भीतर पहुंच गए। उन्हें समझाने-बुझाने की तमाम कूटनीतिक कोशिशें की गईं, लेकिन जब वे किसी भी सूरत में नहीं माने और गतिरोध नहीं टूटा, तो थक-हारकर लोकसभा की कार्यवाही को पूरे दिन के लिए पूरी तरह से स्थगित कर देना पड़ा।
सरकार और विपक्ष के अपने-अपने एजेंडे
सत्र की शुरुआत में ही पैदा हुए इस गतिरोध के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जिस मॉनसून सत्र का आगाज आज हुआ है, उसमें आखिर किन मुद्दों पर काम होना था? दरअसल, सत्ताधारी सरकार इस सत्र के लिए पूरी तैयारी के साथ अपना एक स्पष्ट और अहम एजेंडा लेकर आई थी। मॉनसून सत्र के विधिवत शुरू होने से ठीक पहले, देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मीडिया को संबोधित करते हुए सरकार की प्राथमिकताओं का एक खाका भी पेश किया था। सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं की सूची में फिलहाल नए और संशोधित रूप में परिसीमन बिल के साथ-साथ महिला आरक्षण से जुड़ा अत्यंत महत्वपूर्ण संशोधन बिल मुख्य तौर पर शामिल है। इन दोनों ही विधेयकों को पारित कराने के लिए सदन में एक शांत और निर्बाध चर्चा की सख्त आवश्यकता है।
दूसरी तरफ, विपक्ष भी पूरी तरह से लामबंद होकर और अपने खुद के ज्वलंत मुद्दों की फेहरिस्त के साथ संसद में उतरा था। विपक्ष की तस्वीर भी अपने एजेंडे को लेकर बिल्कुल साफ है। विपक्षी दल चाहते हैं कि देश में हाल ही में हुए तमाम विवादों पर सबसे पहले जवाबदेही तय हो। उनकी सबसे बड़ी मांग यह है कि संसद में बाकी सारे कामकाज रोककर सबसे पहले बहुचर्चित NEET परीक्षा के पेपर लीक मामले पर व्यापक चर्चा की जाए। इसके अलावा, विपक्ष राम मंदिर में आए चढ़ावे की कथित चोरी के संवेदनशील मुद्दे, E-20 पेट्रोल से जुड़ी चिंताओं, आम आदमी की कमर तोड़ रही महंगाई, और देश भर में फैली भयंकर बेरोजगारी जैसे गंभीर मुद्दों पर भी सरकार को घेरने और तुरंत बहस करने की मांग पर अड़ा हुआ है।
चर्चा की शर्तों पर फंसा पेंच
सदन में जारी इस गतिरोध और हंगामे की असल जड़ इसी बात में छिपी है कि आखिर संसद में किसके एजेंडे पर पहले बात होगी। सरकार की तरफ से लगातार यह स्पष्ट किया जा रहा है कि वह विपक्ष द्वारा उठाए गए हर एक मुद्दे पर सकारात्मक और खुली चर्चा करने के लिए पूरी तरह से तैयार है, लेकिन यह सब कुछ संसदीय नियमों, प्रक्रियाओं और तय कार्यक्रम के मुताबिक ही होगा। इसके ठीक विपरीत, विपक्ष इस बात पर अड़ा हुआ है कि उनके द्वारा उठाए गए राष्ट्रीय मुद्दों पर बिना किसी देरी के सबसे पहले चर्चा होनी चाहिए। चर्चा की प्राथमिकता और नियमों को लेकर दोनों पक्षों के बीच पैदा हुआ यही सीधा टकराव इस अभूतपूर्व हंगामे और सदन के ठप होने का मुख्य कारण बना हुआ है।
टैक्सपेयर्स के करोड़ों रुपयों की बर्बादी
सदन में होने वाले इस हंगामे का असर सिर्फ राजनीतिक नहीं है, बल्कि इसका सीधा और बहुत बड़ा आर्थिक नुकसान देश की आम जनता को उठाना पड़ता है। अब यह सवाल उठना लाजमी है कि संसद न चलने की जिम्मेदारी आखिर किस पर तय होनी चाहिए। सरकार इस पूरे गतिरोध के लिए सीधे तौर पर विपक्ष के हंगामे को जिम्मेदार ठहराती है, जबकि विपक्ष का तर्क है कि सदन को सुचारू रूप से चलाना पूरी तरह से सत्ता पक्ष की ही जिम्मेदारी होती है। लेकिन आरोप-प्रत्यारोप की इस राजनीति के बीच असली सवाल यह है कि संसद की कार्यवाही के लिए हर रोज जो करोड़ों रुपये का भारी भरकम खर्च होता है, उसकी इस निर्मम बर्बादी के लिए जवाबदेह कौन है? क्या राजनीतिक हंगामे के नाम पर पब्लिक की गाढ़ी कमाई के पैसे को इस तरह से फूंकना किसी भी लिहाज से जायज ठहराया जा सकता है?
संसद को संचालित करने में आने वाले खर्च के आंकड़े किसी को भी हैरान कर सकते हैं। एक आधिकारिक आकलन के मुताबिक, भारतीय संसद को चलाने में औसतन हर एक मिनट में 2.5 लाख रुपये का भारी खर्च आता है। अगर सदन मात्र एक घंटे तक भी सुचारू रूप से चलता है, तो इसका सीधा खर्च 1.5 करोड़ रुपये तक पहुंच जाता है। इसी औसत को अगर एक पूरे कार्यदिवस के पैमाने पर देखा जाए, जिसमें आमतौर पर 6 घंटे की कार्यवाही निर्धारित होती है, तो एक दिन का कुल खर्च लगभग 9 करोड़ रुपये बैठता है। इसका सीधा सा मतलब यह है कि जब संसद पूरे दिन ठप रहती है और सिर्फ हंगामा होता रहता है, तो हर दिन देश के टैक्सपेयर्स के 9 करोड़ रुपये बिना किसी काम के सीधे स्वाहा हो जाते हैं।
जनता की उम्मीदों पर फिरता पानी
संसद महज राजनेताओं के लिए भाषण देने या राजनीतिक दांव-पेच खेलने की जगह नहीं है, बल्कि यह देश के आम नागरिकों की समस्याओं के समाधान का सबसे बड़ा मंच है। जब देश की संसद काम करती है, तो दिल्ली से मीलों दूर स्थित छोटे-छोटे गांवों, कस्बों और शहरों में रहने वाले आम लोग इस उम्मीद में बैठे रहते हैं कि उनकी आवाज भी सुनी जाएगी। उन्हें पूरी उम्मीद होती है कि उनके द्वारा चुने गए उनके क्षेत्र के सांसद उनके रोजमर्रा की दिक्कतों को इस सर्वोच्च पंचायत में मजबूती से उठाएंगे। किसी दूरदराज के इलाके में पक्की सड़क नहीं है, कहीं पीने के साफ पानी की भारी किल्लत है, तो कहीं इलाज के लिए एक ढंग का अस्पताल तक नहीं है—लोग यही उम्मीद करते हैं कि संसद में इन स्थानीय समस्याओं पर गंभीर चर्चा होगी और सरकार जल्द ही कोई ठोस समाधान निकालेगी। लेकिन हंगामे के कारण जब सदन ही नहीं चलता, तो इन आम लोगों की सारी उम्मीदें धरी की धरी रह जाती हैं।
जवाबदेही के महत्वपूर्ण अवसर हुए खत्म
सदन न चलने का सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि जनहित के तात्कालिक मुद्दे उठाने का मौका छिन जाता है। संसदीय व्यवस्था में ऐसे जरूरी और तत्काल ध्यान खींचने वाले मुद्दे आमतौर पर शून्य काल के दौरान उठाए जाते हैं। शून्य काल की खासियत यह है कि इसके लिए जनता के तात्कालिक मुद्दों पर पहले से बहुत विस्तृत नोटिस देने की जरूरत नहीं होती है; सांसद को बस सुबह 10 बजे तक स्पीकर को इसकी सामान्य सूचना देनी होती है। लेकिन हंगामे की वजह से यह अहम समय भी बर्बाद हो जाता है।
इसके साथ ही प्रश्नकाल भी हंगामे की भेंट चढ़ जाता है, जिसे संसदीय दिन का पहला और सबसे अहम घंटा माना जाता है। इसी प्रश्नकाल में सांसद सीधे तौर पर विभिन्न मंत्रालयों के मंत्रियों से उनके विभागों के कामकाज से जुड़े तीखे सवाल पूछते हैं और मंत्रियों को उनका आधिकारिक जवाब देना पड़ता है। प्रश्नकाल में कई तरह के सवाल पूछे जाते हैं, जैसे कि तारांकित प्रश्न (जिनका सदन में मौखिक जवाब दिया जाता है और उन पर पूरक प्रश्न भी पूछे जा सकते हैं), अतारांकित प्रश्न (जिनका विस्तृत लिखित जवाब पटल पर रखा जाता है), और अल्प सूचना प्रश्न (जो बहुत कम नोटिस पर जनहित में पूछे जाते हैं)। जब संसद चलती ही नहीं है, तो न तो कोई प्रश्नकाल होता है और न ही शून्य काल। जब मुद्दे उठेंगे ही नहीं, तो उनका समाधान भी कभी नहीं निकलेगा, और सरकार की सीधी जवाबदेही भी तय नहीं हो पाएगी।



















