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सुल्तानपुर के केएनआईटी में फखरुद्दीन अली अहमद ने लगाया था यह ऐतिहासिक बरगद, अब पूरे होने जा रहे हैं 50 सालभारत
23 अग॰ 2026, 12:21 pm (2 घंटे पहले)· 2

सुल्तानपुर के केएनआईटी में फखरुद्दीन अली अहमद ने लगाया था यह ऐतिहासिक बरगद, अब पूरे होने जा रहे हैं 50 साल

सुल्तानपुर के कमला नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी परिसर में मौजूद बरगद का विशाल पेड़ इतिहास की गवाही दे रहा है। इसे साल 1976 में देश के तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने अपने हाथों से रोपा था।

सुल्तानपुर जिले में कई ऐसी ऐतिहासिक धरोहरें और पेड़ मौजूद हैं, जिनकी अपनी एक अलग मान्यता और आस्था जुड़ी हुई है, हालांकि कई बार उनके पुख्ता प्रमाण नहीं मिल पाते हैं। लेकिन आज हम आपको एक ऐसे खास वृक्ष के बारे में बता रहे हैं, जिसे किसी आम नागरिक ने नहीं बल्कि देश के सर्वोच्च पद पर बैठे राष्ट्रपति ने खुद लगाया था। यह वाकया साल 1976 का है, जब कमला नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (केएनआईटी) के उद्घाटन का खास अवसर था। उस दौर के केंद्रीय मंत्री बाबू केदारनाथ सिंह के बुलावे पर राष्ट्रपति सुल्तानपुर पहुंचे थे और उन्होंने ही इस पौधे को रोपा था। आज यह बरगद का पेड़ लगभग 50 साल का हो चुका है और इसका आकार बेहद विशाल हो गया है।

राष्ट्रपति के हाथों से रोपा गया था यह बरगद

कमला नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में कार्यरत प्रोफेसर डॉ. सौरभ मणि त्रिपाठी बताते हैं कि सुल्तानपुर में कई ऐसे पुराने पेड़ और स्थल हैं जो सिर्फ पर्यावरण का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि अपने अंदर इतिहास का एक पूरा अध्याय समेटे हुए हैं। इन्हीं में से एक बरगद का यह पेड़ संस्थान के परिसर की शोभा बढ़ा रहा है, जिसे देश के तत्कालीन राष्ट्रपति ने अपने कर-कमलों से लगाया था।

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इतिहास के पन्नों को पलटें तो 28 जुलाई 1976 का दिन सुल्तानपुर के लिए बेहद महत्वपूर्ण था। इसी तारीख को कमला नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के आधिकारिक उद्घाटन समारोह का आयोजन किया गया था। केंद्र सरकार में कद्दावर मंत्री और सुल्तानपुर के दिग्गज नेता बाबू केदारनाथ सिंह के विशेष आमंत्रण पर भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद यहां आए थे। उद्घाटन के इस भव्य कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद और बाबू केएन सिंह ने मिलकर परिसर में इस बरगद के पौधे को रोपा था। उस वक्त शायद ही किसी ने यह कल्पना की होगी कि यह छोटा सा पौधा आने वाले समय में शहर के इतिहास की एक जीवंत निशानी बन जाएगा।

आज भी शान से खड़ा है यह ऐतिहासिक वृक्ष

वक्त बीतता गया और आज यह बरगद का पौधा एक विशाल वटवृक्ष का रूप ले चुका है। यह उस दौर की याद दिलाता है जब देश के प्रथम नागरिक ने सुल्तानपुर की इस पावन धरती पर कदम रखा था। इस पेड़ की जड़ें केवल जमीन के भीतर नहीं फैली हैं, बल्कि वे इस शहर के अतीत और संस्कृति से भी गहराई से जुड़ी हुई हैं। भारतीय संस्कृति में बरगद के पेड़ को लंबी आयु, दृढ़ता और परंपरा का प्रतीक माना जाता है। ऐसे में यह वृक्ष सुल्तानपुर के लिए सिर्फ एक साधारण पौधा नहीं रह गया है, बल्कि 28 जुलाई 1976 की उस ऐतिहासिक और गौरवशाली घटना की एक जीती-जागती याद बन चुका है।

सवाल-जवाब

केएनआईटी परिसर में बरगद का पेड़ किसने लगाया था?
इस बरगद के पेड़ को भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने 28 जुलाई 1976 को लगाया था।
यह बरगद का पेड़ अब कितने साल का हो चुका है?
आज यह बरगद का पेड़ लगभग 50 साल पुराना हो चुका है और इसका आकार काफी बड़ा हो गया है।
राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद सुल्तानपुर किस कार्यक्रम में आए थे?
वे कमला नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के उद्घाटन समारोह में शामिल होने के लिए सुल्तानपुर पहुंचे थे।
राष्ट्रपति को सुल्तानपुर किसने आमंत्रित किया था?
तत्कालीन केंद्रीय मंत्री और सुल्तानपुर के प्रमुख राजनेता बाबू केदारनाथ सिंह के आमंत्रण पर राष्ट्रपति वहां आए थे।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 4

Arjun Mehta@arjun-mehta·21 मिनट पहले

यह खबर तकनीकी संस्थानों और उनके संस्थापकों के राजनीतिक इतिहास के जुड़ाव को बहुत खूबसूरती से सामने लाती है। सत्तर के दशक के मध्य में आपातकाल जैसे संवेदनशील दौर में राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद की यह सुल्तानपुर यात्रा और उनके द्वारा रोपा गया यह वटवृक्ष अब केवल वानस्पतिक धरोहर नहीं, बल्कि भारतीय राजनीतिक इतिहास का एक जीवंत दस्तावेज बन चुका है। संस्थान के स्वर्ण जयंती वर्ष के करीब आने पर इस ऐतिहासिक पहल को याद करना अकादमिक संस्थानों की वैचारिक और ऐतिहासिक जड़ों को समझने का एक बेहतरीन अवसर प्रदान करता है।

Divya Reddy@divya-reddy·21 मिनट पहले

अर्जुन की इस बात को आगे बढ़ाते हुए, आगामी स्वर्ण जयंती वर्ष के अवसर पर इस बरगद के पेड़ को केवल एक वानस्पतिक धरोहर मानने के बजाय परिसर के भीतर एक संरक्षित 'ऐतिहासिक स्थल' के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। उच्च शिक्षण संस्थानों में इस तरह के जीवंत अभिलेख विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए संस्था के स्थापना काल और राजनीतिक-सामाजिक परिवेश को सीधे तौर पर समझने का एक अनूठा माध्यम बनते हैं। ऐसे में संस्थान प्रशासन को इस वटवृक्ष के पास एक सूचना पट्ट स्थापित करना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ आपातकाल के उस दौर और संस्थान की स्थापना के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से भली-भांति परिचित हो सकें।

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 घंटे पहले

यह समाचार पर्यावरणीय इतिहास और सार्वजनिक संपत्ति के संरक्षण के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है। देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद से जुड़े ऐसे ऐतिहासिक स्थलों और प्राकृतिक धरोहरों का दस्तावेजीकरण कानूनी और प्रशासनिक स्तर पर होना चाहिए ताकि भविष्य में अतिक्रमण या तोड़फोड़ से इनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

Ravikash Gupta@ravikash·1 घंटे पहले

यह लेख पर्यावरण और इतिहास के अनूठे संगम को रेखांकित करता है, लेकिन इसे आर्थिक और पर्यटन के नजरिए से भी देखना होगा। इस तरह के ऐतिहासिक वृक्षों को 'हेरिटेज साइट' या ग्रीन एसेट के रूप में विकसित किए जाने से स्थानीय आतिथ्य और शैक्षणिक पर्यटन को बढ़ावा मिल सकता है। केएनआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में यदि इन प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण के लिए विशेष कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) या संस्थागत बजट का प्रावधान किया जाए, तो यह सतत विकास और कैम्पस ग्रीनिंग के एजेंडे को मजबूत करेगा। भविष्य में ऐसे स्थलों की जियो-टैगिंग और डिजिटल मैपिंग से युवाओं और शोधकर्ताओं में इनके प्रति जागरूकता तेजी से बढ़ सकती है।

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