देश की सबसे बड़ी अदालत में वैवाहिक बलात्कार से जुड़े बेहद संवेदनशील और पेचीदा कानूनी सवालों पर नए सिरे से बहस तेज हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि वह इस महत्वपूर्ण विषय पर विस्तार से सुनवाई करेगा और याचिकाओं को अंतिम सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कर दिया गया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ इस पूरे मामले की कमान संभाल रही है, जिसमें यह तय किया जाना है कि क्या शादी के बंधन में बंधे होने के बावजूद किसी महिला की मर्जी के बिना बनाए गए शारीरिक संबंध को अपराध माना जा सकता है या नहीं। इस कानूनी कवायद का दायरा केवल इस बात तक सीमित नहीं है कि वैवाहिक बलात्कार को अपराध के दायरे में लाया जाए या नहीं, बल्कि इसके साथ कई अन्य जटिल सवाल भी अदालत के सामने खड़े हो गए हैं।
सुनवाई के दौरान सबसे बड़ा और असमंजस पैदा करने वाला सवाल यह उठा है कि जब तक सर्वोच्च अदालत मौजूदा वैवाहिक बलात्कार अपवाद की संवैधानिक वैधता पर कोई अंतिम निर्णय नहीं सुना देती, तब तक क्या किसी पति के खिलाफ पत्नी द्वारा लगाए गए बलात्कार के आरोपों के आधार पर मुकदमा चलाया जा सकता है या नहीं। इस एक ही सवाल ने कानूनी गलियारों में बहस को बेहद गंभीर मोड़ दे दिया है। भारतीय दंड संहिता यानी IPC की धारा 375 में बलात्कार को परिभाषित करते समय एक स्पष्ट अपवाद जोड़ा गया था, जिसे अब खुली अदालत में चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि सात फेरे लेने या शादी के बंधन में बंधने मात्र से किसी भी महिला की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और उसकी सहमति का मौलिक अधिकार स्वतः समाप्त नहीं हो जाता है। दूसरी तरफ केंद्र सरकार का रुख यह रहा है कि इस तरह के कृत्यों को वैवाहिक दायरे के भीतर सीधे तौर पर अपराध घोषित करने से सामाजिक ताने-बाने और मौजूदा कानूनी व्यवस्था पर दूरगामी और गंभीर असर पड़ सकते हैं, इसलिए इस पर कोई भी बड़ा फैसला संसद के जरिए व्यापक सामाजिक विमर्श के बाद ही लिया जाना चाहिए।
धारा 376 और वैवाहिक अपवाद का आपसी टकराव
इस पूरे कानूनी विवाद की जड़ में भारतीय दंड संहिता की धारा 376 है, जिसके तहत सामान्य परिस्थितियों में बलात्कार के दोषियों को सजा दिए जाने का प्रावधान तय किया गया है। लेकिन जब कानून की धारा 375 खुद ही किसी विशेष परिस्थिति या रिश्ते को इस परिभाषा से बाहर रखती है, तो यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि उस अपवाद के प्रभावी रहते हुए उसी कृत्य के लिए किसी व्यक्ति पर धारा 376 के तहत आपराधिक मुकदमा कैसे चलाया जा सकता है। इसी कानूनी असमंजस को लेकर सुप्रीम कोर्ट में तीखी बहस देखने को मिली। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने एक महत्वपूर्ण बिंदु उठाया और पूछा कि जब तक अदालत वैवाहिक बलात्कार अपवाद की संवैधानिक वैधता को लेकर कोई फैसला नहीं दे देती, तब तक क्या उसके दायरे में आने वाले किसी कृत्य के आधार पर पति के खिलाफ ट्रायल चलाना कानूनी रूप से संभव है या नहीं।
धारा 377 और वैवाहिक संबंधों की सीमाएं
विवाद के दायरे को और बढ़ाते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के सामने एक और पेचीदा सवाल रखा। उन्होंने जानना चाहा कि यदि कोई पति अपनी पत्नी के साथ ऐसा आचरण करता है जिसे IPC की धारा 377 के तहत परिभाषित किया गया है, तो क्या उस स्थिति में उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। इस पर सॉलिसिटर जनरल ने नकारात्मक जवाब देते हुए अदालत के पुराने निष्कर्षों का हवाला दिया, जिनमें यह माना गया था कि पति-पत्नी के निजी संबंधों के भीतर होने वाले शारीरिक कृत्यों को सामान्यतः अप्राकृतिक नहीं ठहराया जा सकता। इस जवाब ने इस बात को और अधिक उलझा दिया कि आखिर विवाह जैसे पवित्र रिश्ते के भीतर कौन सी सीमाएं लांघने पर कृत्य को अपराध माना जाएगा और कहां तक कानून हस्तक्षेप नहीं करेगा।
पीड़ित की परिभाषा और अदालती समीक्षा के बिंदु
कार्यवाही के दौरान यह सवाल भी सामने आया कि इस पूरे कानूनी संघर्ष में वास्तव में ‘पीड़ित’ किसे माना जाना चाहिए। इस पर न्यायमूर्ति बागची ने याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी कर रही वरिष्ठ अधिवक्ता एनएस नप्पिनई के तर्कों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि विवाह के दौरान बिना रजामंदी के यौन हिंसा की शिकार होने वाली महिला ही पीड़ित है। यानी मुख्य विवाद इस बात पर टिक जाता है कि क्या केवल विवाह का वैध रिश्ता होने भर से किसी महिला की ना रजामंदी को नजरअंदाज किया जा सकता है और उस कृत्य को कानून की पकड़ से बाहर रखा जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने अब अपने सामने रखे गए इस पूरे विवाद को दो मुख्य हिस्सों में बांट दिया है, जिन पर विस्तृत मंथन होना है। पहला सवाल यह है कि क्या मौजूदा अपवाद के कानून में बने रहने के दौरान भी किसी पति के खिलाफ वैवाहिक बलात्कार का मुकदमा चलाया जा सकता है। दूसरा सवाल यह है कि क्या यह वैवाहिक बलात्कार अपवाद खुद अपने आप में संवैधानिक रूप से वैध है या इसे अंवैधानिक करार देकर समाप्त किया जाना चाहिए।
कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले से होगी शुरुआत
इस बहुप्रतीक्षित अंतिम सुनवाई की शुरुआत उस विशिष्ट मामले से होगी जो कर्नाटक हाईकोर्ट के एक पुराने आदेश के खिलाफ शीर्ष अदालत तक पहुंचा है। उस मामले में अदालत ने एक पत्नी की ओर से अपने पति पर लगाए गए जबरन शारीरिक संबंध बनाने के आरोपों के तहत IPC की धारा 376 के अंतर्गत मुकदमा चलाए जाने को सही ठहराया था और याचिका खारिज कर दी थी। अब यही निचली अदालत और हाईकोर्ट का फैसला सर्वोच्च अदालत की बड़ी बेंच के सामने विचार के अधीन है। इस चरण में पत्नी पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह अपना पक्ष रखेंगी और यह दलील देंगी कि कानून में मौजूद अपवाद के बावजूद किन कानूनी सिद्धांतों के आधार पर कुछ विशेष परिस्थितियों में पति को मुकदमे का सामना करना पड़ सकता है। इस तरह एक तरफ जहां महिला की शारीरिक स्वायत्तता और सहमति के अधिकार को सर्वोपरि रखने की मांग है, वहीं दूसरी तरफ मौजूदा दंड संहिताओं के दायरे और उसकी संवैधानिक व्याख्या का कड़ा कानूनी पहरा है, जिसके बीच सुप्रीम कोर्ट को एक ऐतिहासिक संतुलन बिठाना होगा।





















