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थार की तपती रेत के नीचे दबा है पानी का खजाना, सरहदी गांवों में आज भी 'बेरियां' बुझा रही हैं प्यासभारत
24 जून 2026, 10:50 am (126 दिन पहले)· 4

थार की तपती रेत के नीचे दबा है पानी का खजाना, सरहदी गांवों में आज भी 'बेरियां' बुझा रही हैं प्यास

बाड़मेर के रेगिस्तानी और सीमावर्ती इलाकों में सदियों पुरानी पारंपरिक जल संरचना 'बेरियां' आज भी हजारों लोगों और पशुओं की जीवनरेखा बनी हुई हैं, जहां रेत के नीचे जमा मीठा पानी प्यास बुझाता है।

बाड़मेर के थार रेगिस्तान में जहां नजर जहां तक जाए सिर्फ रेत के टीले दिखते हैं और गर्मियों में पारा 50 डिग्री सेल्सियस के पार चला जाता है, वहीं इसी तपती जमीन के नीचे छिपा पानी का खजाना आज भी हजारों लोगों का गला तर कर रहा है। भारत-पाकिस्तान सीमा से लगे इस जिले के गांवों में सदियों पुरानी जल संरचना 'बेरियां' अब भी लोगों की असली जीवनरेखा हैं।

रेगिस्तान में पानी हमेशा से सोने से भी ज्यादा कीमती रहा है। यही वजह है कि बाड़मेर के कई गांव और ढाणियां आज भी पीने के पानी के लिए बेरियों के भरोसे हैं। दरअसल बेरियां रेगिस्तान में पानी सहेजने की एक अनोखी पारंपरिक तकनीक हैं। बारिश का पानी रेत में रिसते-रिसते जमीन के अंदर इकट्ठा हो जाता है और इसी जमा पानी तक पहुंचने के लिए बेरियां खोदी जाती हैं। खास बात यह है कि रेत यहां एक कुदरती छन्नी का काम करती है, जिससे पानी साफ और मीठा बना रहता है।

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बदलते जमाने में भी कायम है भरोसा

आज भले ही कई इलाकों तक पाइपलाइन और टैंकर से पानी पहुंचने लगा हो, लेकिन सरहद से सटी ढाणियों और दूर-दराज के गांवों में बेरियां आज भी सबसे भरोसेमंद जल स्रोत मानी जाती हैं। ये सिर्फ इंसानों के लिए ही नहीं, बल्कि पशुओं और वन्यजीवों के लिए भी वरदान साबित हो रही हैं। भीषण गर्मी में गाय, भेड़, बकरी, ऊंट और दूसरे जानवर इन्हीं बेरियों से अपनी प्यास बुझाते हैं।

इन इलाकों में आज भी जिंदगी का सहारा हैं बेरियां

बाड़मेर के सीमावर्ती और रेगिस्तानी हिस्सों में आज भी बड़ी तादाद में बेरियां मौजूद हैं। गडरारोड, खलीफे की बावड़ी, तामलोर, हमीरानी, सरगिला, अभे का पार, सज्जन का पार, पनेला, बाखासर और सरहद से लगी कई ढाणियों के ग्रामीण अब भी पीने के पानी के लिए इन्हीं बेरियों पर टिके हुए हैं।

'पहले पूरी जिंदगी इन्हीं के इर्द-गिर्द चलती थी'

हमीरानी के रहने वाले याकूब बताते हैं कि एक दौर ऐसा था जब न नहर थी और न पाइपलाइन, तब पूरा जीवन इन्हीं बेरियों के आसपास घूमता था। वक्त बदला, गांवों तक जलापूर्ति की योजनाएं भी पहुंचीं, फिर भी कई ढाणियों और सीमावर्ती इलाकों में बेरियां ही सबसे भरोसेमंद जल स्रोत बनी हुई हैं। याकूब के मुताबिक, कभी हमीरानी के आसपास के दर्जनों गांवों की प्यास इन्हीं बेरियों से बुझती थी। हालत यह है कि आज भी कई परिवार रोजाना कई किलोमीटर दूर बनी बेरियों से पानी भरकर लाते हैं।

सवाल-जवाब

बेरियां क्या होती हैं?
बेरियां रेगिस्तान में पानी सहेजने की पारंपरिक जल संरचना हैं, जिनमें रेत के जरिए जमीन में रिसकर जमा हुआ बारिश का पानी निकाला जाता है।
बेरियों का पानी साफ और मीठा कैसे रहता है?
रेत एक कुदरती छन्नी की तरह काम करती है, जिससे जमीन में जमा होने वाला पानी साफ और मीठा बना रहता है।
बाड़मेर में गर्मियों में तापमान कितना पहुंच जाता है?
थार रेगिस्तान में गर्मियों के दौरान तापमान 50 डिग्री सेल्सियस के पार चला जाता है।
किन इलाकों में लोग आज भी बेरियों पर निर्भर हैं?
गडरारोड, खलीफे की बावड़ी, तामलोर, हमीरानी, सरगिला, अभे का पार, सज्जन का पार, पनेला, बाखासर और सरहद से लगी कई ढाणियों के ग्रामीण अब भी बेरियों पर निर्भर हैं।
क्या बेरियां सिर्फ इंसानों के काम आती हैं?
नहीं, भीषण गर्मी में गाय, भेड़, बकरी, ऊंट और दूसरे पशु तथा वन्यजीव भी इन्हीं बेरियों से अपनी प्यास बुझाते हैं।
पाइपलाइन और टैंकर आने के बाद भी बेरियां क्यों जरूरी हैं?
सरहद से सटी ढाणियों और दूरदराज के इलाकों में बेरियां आज भी सबसे भरोसेमंद जल स्रोत मानी जाती हैं।
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