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त्योहारी सीजन में जमुई के झाझा बस स्टैंड पर खादी मेला, 300 रुपये से लेकर तसर सिल्क के परिधानों की भारी रेंज उपलब्धझारखंड
21 सित॰ 2026, 4:14 pm (4 दिन पहले)· 1

त्योहारी सीजन में जमुई के झाझा बस स्टैंड पर खादी मेला, 300 रुपये से लेकर तसर सिल्क के परिधानों की भारी रेंज उपलब्ध

जमुई जिला मुख्यालय स्थित झाझा बस स्टैंड के समीप रांची से आए बुनकरों ने खादी कपड़ों का विशेष स्टॉल लगाया है, जहाँ त्योहारी छूट के तहत 300 रुपये से 30 हजार रुपये तक के वस्त्र बेचे जा रहे हैं।

त्योहारी सीजन के दस्तक देते ही बाजारों में नए परिधानों की खरीदारी को लेकर रौनक बढ़ गई है। इस बार बिहार के जमुई जिले में स्थानीय खरीदारों के लिए पारंपरिक और आधुनिक पहनावे का एक विशेष बाजार सजाया गया है। जमुई जिला मुख्यालय में स्थित झाझा बस स्टैंड के निकट लगे इस विशेष खादी स्टॉल पर आम लोगों के बजट को ध्यान में रखते हुए परिधानों की विस्तृत श्रृंखला प्रस्तुत की गई है। इस केंद्र पर युवतियों के लिए रंग-बिरंगे सूट मात्र 300 रुपये की शुरुआती कीमत पर उपलब्ध कराए गए हैं, जबकि पुरुषों के लिए विभिन्न शैलियों के शर्ट 350 रुपये में मिल रहे हैं। इसके अतिरिक्त इस बिक्री केंद्र पर 300 रुपये से लेकर 30 हजार रुपये मूल्य तक के कई पारंपरिक और प्रीमियम वस्त्र रखे गए हैं, जिनमें प्रसिद्ध कटिया और तसर सिल्क से बने कपड़े मुख्य आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं।

रांची से जमुई पहुंचा स्वदेशी परिधानों का भंडार

झाझा बस स्टैंड के पास सजे इस खादी बिक्री केंद्र को झारखंड की राजधानी रांची से आए दल द्वारा संचालित किया जा रहा है। स्टॉल के संचालक भीम सिंह के अनुसार, वे और उनकी टीम बीते एक माह से लगातार जमुई के विभिन्न इलाकों में ऐसे बिक्री केंद्र लगा रहे हैं। जिले के अलग-अलग प्रमुख स्थानों पर बारी-बारी से स्टॉल लगाकर वे स्थानीय नागरिकों तक सीधे बुनकरों के तैयार कपड़े पहुंचा रहे हैं। इस केंद्र की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यहाँ बाजार के सामान्य दामों की तुलना में बेहद किफायती दरों पर स्वदेशी वस्त्र बेचे जा रहे हैं। पुरुषों के पहनावे की बात करें तो यहाँ लड़कों के लिए हाफ शर्ट मात्र 300 रुपये में उपलब्ध कराई जा रही है, जबकि पूरी आस्तीन वाली फुल शर्ट की कीमत 350 रुपये तय की गई है।

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सूट पीस से लेकर पारंपरिक शॉल और कंबलों की विशाल श्रृंखला

महिलाओं और युवतियों के लिए भी इस खादी केंद्र पर कई आकर्षक विकल्प तैयार किए गए हैं। स्टॉल पर 350 रुपये में सूट का कपड़ा मिल रहा है, जिसे लोग अपनी पसंद के अनुसार सिलवा सकते हैं। भीम सिंह ने स्पष्ट किया कि ये सभी उत्पाद पूरी तरह स्वदेशी कारीगरी से तैयार किए गए हैं। आमतौर पर खुले बाजार में इन प्राकृतिक रेशों और प्रामाणिक खादी के कपड़ों की कीमतें काफी अधिक होती हैं, परंतु वर्तमान त्योहारी रियायतों के कारण ग्राहकों को यह सामान सीधे कम कीमत पर मुहैया कराया जा रहा है। प्रीमियम कपड़ों के शौकीनों के लिए यहाँ विशेष रूप से तैयार कटिया सिल्क और तसर सिल्क की समृद्ध किस्में रखी गई हैं। इसके अलावा दैनिक और पारंपरिक उपयोग में आने वाली वस्तुएं जैसे गमछा, धोती, पगड़ी, शॉल तथा आने वाली सर्दियों की तैयारी के लिए कंबल भी यहाँ उचित दामों पर बिक्री के लिए रखे गए हैं।

दशहरा बाद तक शहर के विभिन्न चौराहों पर लगेगा स्टॉल

संचालक भीम सिंह ने बताया कि वे करीब 1 महीने से जमुई में लगातार सक्रिय हैं और शहर के अलग-अलग प्रमुख चौराहों पर घूम-घूम कर स्टॉल लगा रहे हैं। आने वाले प्रमुख पर्व-त्योहारों को देखते हुए ग्राहकों को 10 से 15 प्रतिशत तक की विशेष छूट भी दी जा रही है। उन्होंने जानकारी दी कि त्योहारों का यह दौर चलने तक और विशेष रूप से दशहरा के बाद तक उनका यह बिक्री अभियान जमुई में निरंतर जारी रहेगा। वर्तमान में मुख्य केंद्र झाझा बस स्टैंड के पास संचालित हो रहा है, लेकिन आने वाले दिनों में इसे शहर के अन्य महत्वपूर्ण चौक-चौराहों पर भी स्थानांतरित किया जाएगा ताकि अधिक से अधिक लोग स्वदेशी, फैशनेबल और किफायती कपड़ों की खरीदारी कर सकें।

सवाल-जवाब

जमुई में यह खादी स्टॉल वर्तमान में किस जगह पर संचालित हो रहा है?
यह स्टॉल जमुई जिला मुख्यालय स्थित झाझा बस स्टैंड के पास लगाया गया है।
इस खादी बिक्री केंद्र पर कपड़ों की शुरुआती कीमत क्या है?
यहाँ लड़कों के हाफ शर्ट और लड़कियों के सूट की शुरुआती कीमत 300 रुपये से शुरू होती है।
स्टॉल पर अधिकतम कितने मूल्य तक के वस्त्र उपलब्ध हैं?
इस बिक्री केंद्र पर 300 रुपये से लेकर 30 हजार रुपये तक के विभिन्न वस्त्र उपलब्ध हैं।
इस स्टॉल पर किस विशेष प्रकार के सिल्क के कपड़े मिल रहे हैं?
यहाँ विशेष रूप से तैयार कटिया सिल्क और तसर सिल्क के परिधान उपलब्ध कराए गए हैं।
त्योहारों के अवसर पर ग्राहकों को कितनी छूट दी जा रही है?
त्योहारी सीजन को देखते हुए कपड़ों पर 10 से 15 प्रतिशत तक की छूट प्रदान की जा रही है।
जमुई में यह बिक्री केंद्र कब तक खुला रहेगा?
स्टॉल संचालक के अनुसार यह बिक्री अभियान दशहरा पर्व के बाद तक जारी रहेगा।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Ayesha Siddiqui@ayesha-siddiqui·3 दिन पहले

त्योहारी सीजन में ऐसे ग्रामीण और अर्ध-शहरी बाजारों में सीधे बुनकरों द्वारा स्टॉल लगाने की यह पहल हस्तशिल्प और खादी क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने में बेहद महत्वपूर्ण है। बिचौलियों के हटने से कारीगरों को उनकी मेहनत का उचित मूल्य मिलता है और स्थानीय स्तर पर उपभोक्ता खर्च को भी बढ़ावा मिलता है, जो क्षेत्रीय आर्थिक विकास के लिए एक सकारात्मक संकेत है।

Ravikash Gupta@ravikash·3 दिन पहले

जमुई के इस खादी मेले से यह स्पष्ट होता है कि त्योहारी सीजन में स्थानीय स्तर पर असंगठित खुदरा बाजार और स्वदेशी वस्त्रों की मांग तेजी से बढ़ रही है। रांची के बुनकरों द्वारा बिचौलियों को दरकिनार कर सीधे स्टॉल लगाने के इस मॉडल से ग्रामीण और अर्ध-शहरी अर्थव्यवस्था में नकदी का प्रवाह बेहतर होता है। यदि ऐसे आयोजनों को डिजिटल भुगतान और इन्वेंट्री मैनेजमेंट तकनीक से जोड़ा जाए, तो पारंपरिक हथकरघा उद्योग को आधुनिक वित्तीय बाजारों में एक दीर्घकालिक निवेश अवसर के रूप में स्थापित किया जा सकता है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·3 दिन पहले

रविकाश जी का यह विश्लेषण बिल्कुल सटीक है कि बिचौलियों के हटने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नकदी प्रवाह बेहतर होता है। एक राजनीतिक संवाददाता के रूप में मेरा मानना है कि सरकारी नीतियों और एमएसएमई योजनाओं के तहत यदि ऐसे अस्थायी मेलों को स्थायी बाजार तक पहुंच मिले, तो बुनकरों की आय में भारी उछाल आ सकता है। जमुई जैसे अर्ध-शहरी क्षेत्रों में हथकरघा उत्पादों की यह सीधी बिक्री स्वदेशी और रोजगार सृजन की दिशा में एक सशक्त प्रशासनिक मॉडल प्रस्तुत करती है।

Rohan Verma@rohan-verma·3 दिन पहले

त्योहारी सीजन में जमुई के झाझा बस स्टैंड के पास रांची के बुनकरों द्वारा लगाया गया यह खादी मेला सीधे तौर पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था और हस्तकरघा उद्योग को मजबूती दे रहा है। 300 रुपये से लेकर 30,000 रुपये तक की विस्तृत रेंज और तसर सिल्क की उपलब्धता यह दर्शाती है कि ऐसे अस्थायी बाजार स्थानीय उपभोक्ताओं को किफायती दामों पर गुणवत्तापूर्ण स्वदेशी विकल्प उपलब्ध कराने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। दशहरा तक विभिन्न चौराहों पर लगने वाले ये स्टॉल पारंपरिक कारीगरों को बिचौलियों के बिना सीधा बाजार मुहैया कराते हैं।

Karan Malhotra@karan-malhotra·3 दिन पहले

यह आर्थिक गतिविधि ग्रामीण और अर्ध-शहरी बाजारों में स्थानीय स्तर पर रोजगार और नकदी प्रवाह को बढ़ावा देती है। त्योहारी सीजन में इस प्रकार के अस्थायी स्टॉल लगने से न केवल बुनकरों को बिचौलियों से मुक्ति मिलती है, बल्कि उपभोक्ताओं को भी उचित मूल्य पर प्रामाणिक उत्पाद मिलते हैं। कानून-व्यवस्था और स्थानीय प्रशासन के दृष्टिकोण से भी यह महत्वपूर्ण है कि भीड़भाड़ वाले बस स्टैंड जैसे सार्वजनिक स्थलों पर ऐसे आयोजनों के दौरान यातायात और सुरक्षा प्रबंध सुचारू रहें ताकि किसी प्रकार की अव्यवस्था न फैले।

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